गोपाल राम गहमरी समारोह --१२
सोमवार मंगलवार --हमारा दिन हमारी मर्जी
समर्पण --अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव एवं मंच संचालक श्री राम जायसवाल
वो आयेगा
हमारा जीवन खुशहाल बनायेगा
अजीब है जीवन हमारा
खुशहाल वो बनायेगा
आप सभी रचनाकार एवं माननीय अध्यक्ष महोदय को हार्दिक बधाई एवं आभार
सोमवार मंगलवार --हमारा दिन हमारी मर्जी
समर्पण --अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव एवं मंच संचालक श्री राम जायसवाल
वो आयेगा
हमारा जीवन खुशहाल बनायेगा
अजीब है जीवन हमारा
खुशहाल वो बनायेगा
रमन कुमार झा
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-12
सोमवार हमरी दिन हमारी मर्जी
अध्यक्ष -आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी एवं
मंच संचालक आदरणीय श्री राम जयसवाली जी को सादर समर्पित
##################################################
दिल तो मेरा बन बैठा हैं आकाश
इसके ऊंचाइयों का नहीं अभास
कल्पना का ये तो घोड़ा दौड़ाए
कहूँ अपने आपको ही मैं शाबाश
गोपाल राम गहमरी समारोह --१२
सोमवार मंगलवार --हमारा दिन हमारी मर्जी
अध्यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्तवा जी
मंच संचालक - आदरणीय श्री राम जायसवाल जी
को सादर समरर्पित
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-12
सोमवार हमरी दिन हमारी मर्जी
अध्यक्ष -आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी एवं
मंच संचालक आदरणीय श्री राम जयसवाली जी को सादर समर्पित
##################################################
दिल तो मेरा बन बैठा हैं आकाश
इसके ऊंचाइयों का नहीं अभास
कल्पना का ये तो घोड़ा दौड़ाए
कहूँ अपने आपको ही मैं शाबाश
गोपाल राम गहमरी समारोह --१२
सोमवार मंगलवार --हमारा दिन हमारी मर्जी
अध्यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्तवा जी
मंच संचालक - आदरणीय श्री राम जायसवाल जी
को सादर समरर्पित
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
कटने लगे थे अब पल इंतजार के
बंध गये जो हम धागो में प्यार के
जिन्दगी में चाहत के फूल खिल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
हर चाहतो को मेरी जानने लगे
आँखो से कहे जो हम मानने लगे
जीवन के रंग ढ़ग सबतो बदल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
देखो तुम प्यार का कैसा सिला मिला
टूट गया उनके आने का सिलसिला
भूले प्यार मेरा अब वो बदल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
सूना लगे ये जीवन न हम रह सके
बंद लबो के गम हम कैसे सह सकें
खुशियाँ अखंड के सपने सब जल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
अखंड गहमरी एडमिन रचना
---------------------------------------------------------------
* गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 12
सोमवार मंगलवार- हमारा दिन हमारी मर्जी।
आदरणीय अखंड गहमरी जी एवं मंच संचालक आदरणीय श्री राम जायसवाल जी तथा अन्य आदरणीय मित्रोँ को सादर समर्पित*
**--**--**--**--**--**
मेरी खातिर रोज गगन से चाँद उतारा अम्मा ने!
सिर था मेरा टेढ़ा मेढ़ा बहुत सँवारा अम्मा ने!
पाँवो की मैँ रज चूमूँ सौ बार लगाऊँ माथे पर!
और ऋणी हूँ जन्म जन्म जो मुझे दुलारा अम्मा ने!
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-12
शुक्रवार से शनिवार ******हमारी चतुष्पदी (विषय - स्वप्न/ख्वाब)
अध्यक्ष -आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी एवं
मंच संचालक आदरणीय श्री राम जयसवाली जी को सादर समर्पित
################################################
सपनों में आना छोड़ो
मुझको सताना छोड़ो
आना ही है अगर सनम
हमको रूलाना छोडो
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
कटने लगे थे अब पल इंतजार के
बंध गये जो हम धागो में प्यार के
जिन्दगी में चाहत के फूल खिल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
हर चाहतो को मेरी जानने लगे
आँखो से कहे जो हम मानने लगे
जीवन के रंग ढ़ग सबतो बदल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
देखो तुम प्यार का कैसा सिला मिला
टूट गया उनके आने का सिलसिला
भूले प्यार मेरा अब वो बदल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
सूना लगे ये जीवन न हम रह सके
बंद लबो के गम हम कैसे सह सकें
खुशियाँ अखंड के सपने सब जल गये
चल रहे थे अकेले फिर वो मिल गये
चेहरे पे खुशियों के फूल खिल गये
अखंड गहमरी एडमिन रचना
---------------------------------------------------------------
* गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 12
सोमवार मंगलवार- हमारा दिन हमारी मर्जी।
आदरणीय अखंड गहमरी जी एवं मंच संचालक आदरणीय श्री राम जायसवाल जी तथा अन्य आदरणीय मित्रोँ को सादर समर्पित*
**--**--**--**--**--**
मेरी खातिर रोज गगन से चाँद उतारा अम्मा ने!
सिर था मेरा टेढ़ा मेढ़ा बहुत सँवारा अम्मा ने!
पाँवो की मैँ रज चूमूँ सौ बार लगाऊँ माथे पर!
और ऋणी हूँ जन्म जन्म जो मुझे दुलारा अम्मा ने!
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-12
शुक्रवार से शनिवार ******हमारी चतुष्पदी (विषय - स्वप्न/ख्वाब)
अध्यक्ष -आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी एवं
मंच संचालक आदरणीय श्री राम जयसवाली जी को सादर समर्पित
################################################
सपनों में आना छोड़ो
मुझको सताना छोड़ो
आना ही है अगर सनम
हमको रूलाना छोडो
"कल्याणी झा"
आप सभी रचनाकार एवं माननीय अध्यक्ष महोदय को हार्दिक बधाई एवं आभार
No comments:
Post a Comment