कार्यक्रम अध्यक्षा कान्ती शुक्ला जी भागीरथी प्रयास से गोपाल राम
गहमरी साहित्य समारोह -17 दिनांक 22 से 23 जनू 2014 का दूसरा चरण हमारा रविवार
पूर्ण हुआ। हम समस्त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्त रचनाकारों एवं
अध्यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके स्वस्थ जीवन एवं
उज्ज्वल भविष्य के लिये प्रार्थना करतें है।
रचनाकारों के नाम क्रमस: आदरणीया शुभदा बाजपेयी जी, आदरणीय कवि मधुप जी , अखंड गहमरी आदरणीय सुरेश मिश्रा, आदरणीया Mahesh Jainjyoti आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लाडीयवााल जी , आदरणीय लव कुमार प्रणय जी आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह -17 के हमारा रविवार के विजेता आदरण्ीय सुरेश मिश्रा उत्साही जी
एवं गोपाल राम गहमरी साहित्य समारेाह हमारा रविवार के आगामी अध्यक्ष सुरेश मिश्रा उत्साही जी होगें
गोपाल दास गहमरी साहित्य समारोह --१७ के दुसरे चरण के अंतर्गत एक ग़ज़ल
ग़ज़ल ---
काफिया-- आते --
--रदीफ़--नहीं हैं
मात्रा भार --२१२२/२१२२/२१२२/
बिन बुलाये हम कहीं जाते नहीं हैं
यूँ किसी के ख्वाब में आते नहीं हैं
रचनाकारों के नाम क्रमस: आदरणीया शुभदा बाजपेयी जी, आदरणीय कवि मधुप जी , अखंड गहमरी आदरणीय सुरेश मिश्रा, आदरणीया Mahesh Jainjyoti आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लाडीयवााल जी , आदरणीय लव कुमार प्रणय जी आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह -17 के हमारा रविवार के विजेता आदरण्ीय सुरेश मिश्रा उत्साही जी
एवं गोपाल राम गहमरी साहित्य समारेाह हमारा रविवार के आगामी अध्यक्ष सुरेश मिश्रा उत्साही जी होगें
Shubhda Bajpai
गोपाल दास गहमरी साहित्य समारोह --१७ के दुसरे चरण के अंतर्गत एक ग़ज़ल ग़ज़ल ---
काफिया-- आते --
--रदीफ़--नहीं हैं
मात्रा भार --२१२२/२१२२/२१२२/
बिन बुलाये हम कहीं जाते नहीं हैं
यूँ किसी के ख्वाब में आते नहीं हैं
कौन करता है यहाँ दिल से मुहब्बत
कोई नगमें प्यार के गाते नहीं है
कौन कहता है कि रहते मौन पत्थर
बात अपने दिल की कह पाते नहीं हैं
आइना सच बोलता यह तय मगर क्यों
जानते हैं फिर भी घबराते नहीं हैं
दोस्ती का यह चलन देखो न 'शुभदा'
जुल्म भी ढाते हैं शर्माते नहीं हैं
शुभदा बाजपेयी-----२२---६---२०१४
-----------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 17 के द्वितीय चरण के अंतर्गत ।हमारा रविवार ।
समारोह अध्यक्षा आदरणीय कान्ती शुक्ला जी व् साहित्य संरक्षक आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित ।
मापनी एवं शिल्प:-
1222 1222 1222 1222
काफिया:-आला,रदीफ़ :-तो गया होता
ग़ज़ल
गुनाहों से भरा प्रस्ताव,टाला तो गया होता ।
उसूलों को सही साँचे में,ढाला तो गया होता ।
कोई नगमें प्यार के गाते नहीं है
कौन कहता है कि रहते मौन पत्थर
बात अपने दिल की कह पाते नहीं हैं
आइना सच बोलता यह तय मगर क्यों
जानते हैं फिर भी घबराते नहीं हैं
दोस्ती का यह चलन देखो न 'शुभदा'
जुल्म भी ढाते हैं शर्माते नहीं हैं
शुभदा बाजपेयी-----२२---६---२०१४
-----------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 17 के द्वितीय चरण के अंतर्गत ।हमारा रविवार ।
समारोह अध्यक्षा आदरणीय कान्ती शुक्ला जी व् साहित्य संरक्षक आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित ।
मापनी एवं शिल्प:-
1222 1222 1222 1222
काफिया:-आला,रदीफ़ :-तो गया होता
ग़ज़ल
गुनाहों से भरा प्रस्ताव,टाला तो गया होता ।
उसूलों को सही साँचे में,ढाला तो गया होता ।
हमारे 'आज' 'कल' दोनों,सुहाने हो गये होते,
विरासत को सलीके से,सँभाला तो गया होता।
पनप पाते नहीं ये साँप,अपनी आस्तीनों में,
अगर कुछ नेवलों को प्यार से,पाला गया होता ।
समन्दर पार करती बार,होती हार दुश्मन की,
मिसाइल को तरीके से उछाला तो गया होता।
हजारों मोतियों के ढेर,लग जाते किनारे पर,
समन्दर और अन्दर तक,खँगाला तो गया होता।
'मधुप' को और फूलों को,चुभन बिल्कुल नही लगती,
कभी काँटों को बगिया से,निकाला तो गया होता ।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17
अध्यक्षा आदरणीया कान्ती शुक्ला जी को समिर्पत
विघा ' तरही गजल
काफिया - अना
रदीफ - है
बहर
2122 2122 2122
विरासत को सलीके से,सँभाला तो गया होता।
पनप पाते नहीं ये साँप,अपनी आस्तीनों में,
अगर कुछ नेवलों को प्यार से,पाला गया होता ।
समन्दर पार करती बार,होती हार दुश्मन की,
मिसाइल को तरीके से उछाला तो गया होता।
हजारों मोतियों के ढेर,लग जाते किनारे पर,
समन्दर और अन्दर तक,खँगाला तो गया होता।
'मधुप' को और फूलों को,चुभन बिल्कुल नही लगती,
कभी काँटों को बगिया से,निकाला तो गया होता ।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17
अध्यक्षा आदरणीया कान्ती शुक्ला जी को समिर्पत
विघा ' तरही गजल
काफिया - अना
रदीफ - है
बहर
2122 2122 2122
मत कहो आकाश में कुहरा धना है
जाल धुमते बादलो ने बस बुना है
धूप की चादर अभी फैली फिजा में
चाँदनी को चाँद से मिलना मना है
भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे
दे गवाही आज वो तेरा अना है
फूल भी रोने लगे तब से चमन में
रौद देगा माली ही जब से सुना है
नींद भी तब से नहीं आती किसी को
आदमी शैतान ही जब से बना है
आज ये सुन शर्म खुद रोने लगा क्यों
औरतो ने राह पर बच्चा जना है
अखंड गहमरी एडमिन रचना
श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 द्वितीय चरण ।
अध्यक्षः सम्मान्य कान्ति शुक्ला जी ।
प्रस्तुति-घनाक्षरी छंद ।
परिचय छंद-
मात्रिकः- 47 मात्रायें । रगण 212 व
जगण 121की 5क्रमागत आवृतियाँ ।
अंत में गुरु 2 । यति 16-15पर ।
वर्णिक = 31वर्ण ,16 व 15 पर
यती ।
अंत में गुरु 2 ।
प्रस्तुत छंद का पदान्त- आन लो ।
----------
* राजदंड *
राजदंड थाम के न
ढील दीजिये जनाब ,
खींच राज अश्व की
लगाम आप तान लो ।
खींचते लगाम अश्व
दौड के चला सदैव ,
चाल एक बार ठीक
हो तुरन्त ठान लो ।
जान लीजिये कि तंत्र
आपको मिला खराब ,
काम ठोक पीट के
बिना चले न जान लो ।
है गुहार दंड के बिना
न प्रीत जन्म लेत ,
सत्य बात ज्योति की
हुजूर आप मान लो ।
****
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्तगर्त
अध्यक्षा-- आदरण्ीय कान्ती शुक्ला जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
विधा - चौपई छंद
शिल्प विधान - चौपई 15 मात्राओं के चार चरणों का सम मात्रिक छंद है.
इसके चरण का अंत गुरु-लघु से होता है (ध्यान रहे यह चौपाई छंद से भिन्न है जो १६ मात्राओं का होता है)
तुकांत - प्रस्तुत छंद में तुकांत -आर,आस,आम,आन,आथ,आह,ओड,ओट,आल एवं एश है
जाल धुमते बादलो ने बस बुना है
धूप की चादर अभी फैली फिजा में
चाँदनी को चाँद से मिलना मना है
भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे
दे गवाही आज वो तेरा अना है
फूल भी रोने लगे तब से चमन में
रौद देगा माली ही जब से सुना है
नींद भी तब से नहीं आती किसी को
आदमी शैतान ही जब से बना है
आज ये सुन शर्म खुद रोने लगा क्यों
औरतो ने राह पर बच्चा जना है
अखंड गहमरी एडमिन रचना
Sureshkumar Mishra
रविवार से सोमवार की रचना
विधा गीत ====
मापनी ===२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत ---अल रहा
आ.कांति शुक्ला जी को समर्पित
===============================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
अब हसी हैं कहाँ देश के वासियों
गॉँव के साथियों राज की दासियों
इस धरा धाम को तो सभी छल रहा
यह किसी आँख में अब नहीं खलरहा
=========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
===========================
वृछ सुरछित नहीं औ शिखर भी नहीं
पोखरे भी नहीं वह लहर भी नहीं
खेत -खलिहान में है लपट ही लपट
कारखानो -घरो में हैं कपट ही कपट
फिल्म औ संस्कृत में जहर घुल रहा
देश तो अब पतन की तरफ चल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
=========================
जल रही शाम की वो सभी वादियाँ
लोभियों से सभी टूटती शादियाँ
जिस्म पूरे वतन का झुलसने लगा
यह जहर नस -रगो में सुलगने लगा
आज माँ के वतन का जिगर गल रहा
कौन है जो यहाँ पर नहीं छल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
============================
देश भी अब कसम दे रहा आज हैं
रावणो का सुनो अब यहाँ राज हैं
जन्म देती तम्हें माँ इसी के लिए
धन्य तो हैं वहीं देश हित में जियें
वक्त जीवन मरण का अभी चल रहा
सो रहे हो इधर हिम शिखर गल रहा
========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
मापनी ===२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत ---अल रहा
आ.कांति शुक्ला जी को समर्पित
===============================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
अब हसी हैं कहाँ देश के वासियों
गॉँव के साथियों राज की दासियों
इस धरा धाम को तो सभी छल रहा
यह किसी आँख में अब नहीं खलरहा
=========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
===========================
वृछ सुरछित नहीं औ शिखर भी नहीं
पोखरे भी नहीं वह लहर भी नहीं
खेत -खलिहान में है लपट ही लपट
कारखानो -घरो में हैं कपट ही कपट
फिल्म औ संस्कृत में जहर घुल रहा
देश तो अब पतन की तरफ चल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
=========================
जल रही शाम की वो सभी वादियाँ
लोभियों से सभी टूटती शादियाँ
जिस्म पूरे वतन का झुलसने लगा
यह जहर नस -रगो में सुलगने लगा
आज माँ के वतन का जिगर गल रहा
कौन है जो यहाँ पर नहीं छल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
============================
देश भी अब कसम दे रहा आज हैं
रावणो का सुनो अब यहाँ राज हैं
जन्म देती तम्हें माँ इसी के लिए
धन्य तो हैं वहीं देश हित में जियें
वक्त जीवन मरण का अभी चल रहा
सो रहे हो इधर हिम शिखर गल रहा
========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 द्वितीय चरण ।
अध्यक्षः सम्मान्य कान्ति शुक्ला जी ।
प्रस्तुति-घनाक्षरी छंद ।
परिचय छंद-
मात्रिकः- 47 मात्रायें । रगण 212 व
जगण 121की 5क्रमागत आवृतियाँ ।
अंत में गुरु 2 । यति 16-15पर ।
वर्णिक = 31वर्ण ,16 व 15 पर
यती ।
अंत में गुरु 2 ।
प्रस्तुत छंद का पदान्त- आन लो ।
----------
* राजदंड *
राजदंड थाम के न
ढील दीजिये जनाब ,
खींच राज अश्व की
लगाम आप तान लो ।
खींचते लगाम अश्व
दौड के चला सदैव ,
चाल एक बार ठीक
हो तुरन्त ठान लो ।
जान लीजिये कि तंत्र
आपको मिला खराब ,
काम ठोक पीट के
बिना चले न जान लो ।
है गुहार दंड के बिना
न प्रीत जन्म लेत ,
सत्य बात ज्योति की
हुजूर आप मान लो ।
****
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्तगर्त
अध्यक्षा-- आदरण्ीय कान्ती शुक्ला जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
विधा - चौपई छंद
शिल्प विधान - चौपई 15 मात्राओं के चार चरणों का सम मात्रिक छंद है.
इसके चरण का अंत गुरु-लघु से होता है (ध्यान रहे यह चौपाई छंद से भिन्न है जो १६ मात्राओं का होता है)
तुकांत - प्रस्तुत छंद में तुकांत -आर,आस,आम,आन,आथ,आह,ओड,ओट,आल एवं एश है
झाड़ू अभी लगानी शेष(चौपई छंद)
======================
समझौते का हो आधार, तभी चले साझा सरकार
इक दूजे पर करे न वार, आत्म बल ही रहे आधार |
जनता का पाने विश्वास, सब दल करते रहे प्रयास
जनता के हो सारे काम, यही मांग जनता की आम |
माँ वसुधा पर जो कुर्बान, उस नेता की हो पहचान |
वंशवाद की छोड़े तान, लोक तंत्र की रखना आन
खिले कमल को लेकर हाथ, पाट दिए जनता ने पाथ
जनता में दिखता उत्साह, नेताजी को मिलती राह |
गाँठ लगाकर लेते जोड़, पर आपस में करते होड़
अन्दर खाने देते चोट, इक दूजे का तोड़े वोट |
सबका जब मिलता है साथ, तभी सुगम होता है पाथ
जनता का जीते विश्वास, उस नेता से करते आस |
हाथ ने किया नहीं कमाल, हाथी हाल हुआ बेहाल
बदले नेताजी ने भेष, झाड़ू अभी लगानी शेष |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्तगर्त
*हमारा रविवार*
अध्यक्षा-- आदरणीय श्रीमती कान्ती शुक्ला जी को सादर
(प्रिय भाई अखंड गहमरी जी को
सप्रेम समर्पित )
शिल्प विधान =
मापनी =212 1222 212 1222
काफिया =इये
*गजल *
जून के दिनों को तुम, मायका दिवस कहिये
सूनसान इस घर में ,नायिका के बिन रहिये
======================
समझौते का हो आधार, तभी चले साझा सरकार
इक दूजे पर करे न वार, आत्म बल ही रहे आधार |
जनता का पाने विश्वास, सब दल करते रहे प्रयास
जनता के हो सारे काम, यही मांग जनता की आम |
माँ वसुधा पर जो कुर्बान, उस नेता की हो पहचान |
वंशवाद की छोड़े तान, लोक तंत्र की रखना आन
खिले कमल को लेकर हाथ, पाट दिए जनता ने पाथ
जनता में दिखता उत्साह, नेताजी को मिलती राह |
गाँठ लगाकर लेते जोड़, पर आपस में करते होड़
अन्दर खाने देते चोट, इक दूजे का तोड़े वोट |
सबका जब मिलता है साथ, तभी सुगम होता है पाथ
जनता का जीते विश्वास, उस नेता से करते आस |
हाथ ने किया नहीं कमाल, हाथी हाल हुआ बेहाल
बदले नेताजी ने भेष, झाड़ू अभी लगानी शेष |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्तगर्त
*हमारा रविवार*
अध्यक्षा-- आदरणीय श्रीमती कान्ती शुक्ला जी को सादर
(प्रिय भाई अखंड गहमरी जी को
सप्रेम समर्पित )
शिल्प विधान =
मापनी =212 1222 212 1222
काफिया =इये
*गजल *
जून के दिनों को तुम, मायका दिवस कहिये
सूनसान इस घर में ,नायिका के बिन रहिये
याद के झरोखे से, मीत को निहारो तुम
वेदना विरह की अब, जाग- जाग कर सहिये
लौट कर चली आओ, जिन्दगी अकेली है
प्रेम एक गाड़ी है, आप हम हैं दो पहिये
आप बिन रहें कैसे, प्यास अब सहें कैसे
मीत पास भी आओ, दूर -दूर मत रहिये
रात है अमावस -सी ,दिन 'प्रणय' अषाढों से
जेठ - सी दुपहरी है, धूप में खड़े दहिये
लव कुमार 'प्रणय'
सभी रचनाकारोंं का विनम्र स्वागत
वेदना विरह की अब, जाग- जाग कर सहिये
लौट कर चली आओ, जिन्दगी अकेली है
प्रेम एक गाड़ी है, आप हम हैं दो पहिये
आप बिन रहें कैसे, प्यास अब सहें कैसे
मीत पास भी आओ, दूर -दूर मत रहिये
रात है अमावस -सी ,दिन 'प्रणय' अषाढों से
जेठ - सी दुपहरी है, धूप में खड़े दहिये
लव कुमार 'प्रणय'
सभी रचनाकारोंं का विनम्र स्वागत
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