Sunday, 29 June 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -16 प्रारम्‍भं दिनांक 13 से 15 जनू 2014 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक अध्‍यक्ष सतीश वर्मा जी

कार्यक्रम अध्‍यक्ष गुरूवर सतीश वर्मा जी के भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -16 दिनांक 13 से 15 जनू 2014 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।

  इस कार्यक्रम में 1. प्रथम पुरस्कार : कवि सतीश मधुप जी ।2. द्वितीय पुरस्कार : मंदाकिनि गौरी जी ।सर्वश्रेष्ठ प्रतिक्रिया देने वाले :Karan Sp जी :

रचनाकारों के नाम क्रमस:  अादरणीय सतीश वर्मा जी, आदरणीया मंदाकनी गौरी जी, आदरणीया कैलास चंन्‍द्रा जी, आदरणीय नारायन गौरव जी, आदरणीय सुभदा बाजपेयी जी, आदरणीय संतोष नेमा जी, आदरणीया कांन्‍ती शुक्‍ला जी , आदरणीय डा0 हीरा लाला प्रजापति जी , आदरणीय कवि सतीश मधुप जी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीया पारूल गुप्‍ता जी, अखंड गहमरी, आदरणीया मंजू शर्मा जी,  आदरणीय करन एस पी जी, आदरणीय सुीेश कुमार मिश्रा जी, आदरणीय अलका गुप्‍ता जी,   आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।

गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
विषय - नियति /प्रकृति/कुदरत
शीर्षक : नियति ।
आदरणीय ओम नीरव जी, अखण्ड गहमरी जी एवम समस्त प्रबुद्ध प्रियजनों को भेंट :
( अतिथि रचना )
अम्बर से नीलापन लेकर , फिर वासंती तनिक पीलापन लेकर,
नियति के सब रंग चुरा कर, थोड़ा उन्मत यौवन सुरा मिला कर।
चुपके से पीछे जाकर, जबरन रंग डाला उनका सारा तन मन।
‘बुरा न मानो होली है’, कहा मैं ने खींच उन्हें निज गले से लगा कर।
: सतीश वर्मा
मुम्बई / 14.06.2014
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हमारा मुक्तक---विषय -प्रकृति/नियति/कुदरत
अध्यक्ष ------------सतीश वर्मा जी ....
सहजीवी पौधों का देखो मेल दोस्तों ।
धूप-छाँव तो है कुदरत का खेल दोस्तों ।।
जीना है तो जियो सभी मिलजुल करके;
रंगमंच है जीवन, नहीं है जेल दोस्तों ।।
---मन्दाकिनी गौरी
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गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह-16
विषय-नियति /कुदरत/प्रक्रति
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सतीश वर्मा जी के समक्ष प्रस्तुत
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है कुदरत प्रेम की बरखा निहारो और नहाओ तुम
है अनुपम रूप ईश्वर का नही इसको सताओ तुम
कभी यूँ काट कर जंगल कभी यूँ बाँध कर गंगा
तबाही से बहुत पहले ,तबाही मत बुलाओ तुम
~"कैलाश भारद्वाज"
फरीदाबाद
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आदरणीय अध्यक्ष श्री सतीश वर्माजी को समर्पित ।
हमारा मुक्तक, विषय-प्रकृति/नियति/कुदरत ।
प्रेम को जो घटा दे वो नफरत है।
प्रेम को जो बढ़ा दे वो चाहत है।
इँसान की भलाई जिसकी प्रकृति है,
वह नियति नही बल्कि कुदरत है।
-नारायण गौरव ।
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मुक्तक--विषय--नियति/प्रकृति/कुदरत-----
अध्यक्ष आदरणीय ----सतीश वर्मा जी !
====== समूह में मेरा प्रथम प्रयास !


रूप कुदरत ने कैसा संवारा है
प्रकृति ने रचा कैसा नज़ारा है !
रास आओ जरा रचाओ मोहन-
नियति ने किया साफ़ इशारा है !!
शुभदा बाजपेयी---१३---६---२०१४
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शुक्रवार प्रात: 10 बजे शनिवार प्रात: 10 बजे तक
हमारा मुक्‍तक --विषय ---नियति / प्रकृति / कुदरत
अध्‍यक्ष अादरणीय ----सतीश वर्मा जी

अपने अहम का तू यूँ इज़हार न कर ....!
प्रकर्ति के आगे शक्ति बेकार न कर ....!
नियति के सामने हम बौने हैं संतोष"....!
साथ प्रकर्ति के चलने से इंकार न कर ....!
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हमारा मुक्तक
विषय-नियति / प़कृति/ कुदरत
अध्यक्ष- आदरणीय सतीश वर्मा जी को सादर समर्पित
शून्य सा निस्तब्ध अंतर , है विछौना शुष्क पाहन ।
शिथिल आकुल गात गर्वित ,ढूंढता वो सुभग सावन ।
पवन है निस्तब्ध निस्पृह , संयमित से साद़ साधन-
अधर निष्प़भ शब्द वंचित , नियति बस झेलें तपन ।
कान्ति शुक्ला
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गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
विषय - नियति /प्रकृति/कुदरत आदि
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क़ुदरत ने तो बख़्शा था हुस्न ख़ूब-लाजवाब ॥
जंगल घने थे झीलें लबालब नदी पुरआब ॥
किसने ज़मीन उजाड़ी है पेड़ों को काट-काट ?
हम ही ने सूरत इसकी बिगाड़ी है की ख़राब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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मुक्तक ,विषय:-नियति/प्रकृति/ कुदरत
अध्यक्ष आदरणीय आदरणीय सतीश वर्मा जी को समर्पित
पैर थकें पर हिम्मत वाला,उठकर चल भी सकता है ।
संकट का मंडराता बादल,सहसा टल भी सकता है ।
कुदरत,हिम्मत और खुदा की रहमत तीनों मिल जायें,
तो कोई फ़क़ीर अपनी,तकदीर बदल भी सकता है ।
........................................सतीश 'मधुप'
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हमारा मुक्‍तक --विषय ---नियति / प्रकृति / कुदरत
अध्‍यक्ष --श्री सतीश वर्मा जी को सादर
(अतिथि रचना )
*मुक्तक*
नियति का खेल है प्यारे
सभी अपने हुये न्यारे
सजाकर प्यार का मण्डप
छिपे ये चाँद ओ तारे
(लव कुमार 'प्रणय'
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शुक्रवार प्रात: 10 बजे शनिवार प्रात: 10 बजे तक
हमारा मुक्‍तक --विषय ---नियति / प्रकृति / कुदरत
अध्‍यक्ष अादरणीय ----सतीश वर्मा जी के समक्ष प्रस्तुत
प्रकृति ने दी धरती सुन्दर पेड़ उगाने को
पावन गंगा दी निर्मल पानी बहाने को
काट रहे वन मानव, मल गंगा में बहाते
स्वयं लगा रहे आग घर अपना जलाने को
-------------पारुल'पंखुरी'

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गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह ' 16
हमारा मुक्तक---विषय -प्रकृति/नियति/कुदरत
अध्यक्ष ------------सतीश वर्मा जी सेवा में
मंच बनाया जो मैने इक दिया आपने मान है
बढ़े आपके आशीष से मेरा जो अल्‍प ज्ञान है
दूर ही रखे आप सबको नियति अपने कुचक्रो से
लेखनी को आपके मिला शारदा का वरदान है
अखंड गहमरी (एडमिन रचना)

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हमारा मुक्‍तक --विषय ---नियति / प्रकृति / कुदरत ---
आ .अध्यक्ष श्री सतीश वर्मा जी को समर्पित --
सुबह को सूरज का आना साँझ को ढल जाना कुदरती है
घटाओं का आना बोझ तले दबके बरस जाना प्रकृति है
दोहन-शोषण कर रहा हर घड़ी मानव कुदरत की नेमत का
अति भोग से सूखा ,बाढ़ ,सुनामी ,बर्फीला तूफ़ान होना नियति है
--- मँजु शर्मा --- १३-०६-२०१४

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गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
विषय - नियति /प्रकृति/कुदरत आदि
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समारोह अध्यक्ष समान्य Satish Verma सर जी को सादर समर्पित एक मुक्तक।
ँँँँ
सुचि शीतल मंद बयार बहे, मृदु प्रकृति सौम्यता झलक पडी।
भानू उग्यो तजि ताप अभी, शबनम बूँदों पर किरण पडी।
पुष्पों की कलियाँ मुस्काकर ,अब ऊषा का मनुहार करेँ।
यह नियम नियति का देख सखी, रजनी भी छुपकर भाग खडी।
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करन सिंह परिहार
पिण्डारन - बाँदा (उ.प्र.)

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हमारा मुक्तक विषय =नियति /प्रकृति /कुदरत
आ .अध्यक्ष श्री सतीश वर्मा जी को समर्पित
बहर -२१२ २१२ २१२ २१२
प्यार माँ का मिला ,यह ह्रदय खिल गया
हैं लगा आज तो , आनन्द मिल गया ...

आदरणीय अध्यक्ष श्री सतीश वर्माजी को समर्पित ।
समूह में हमारा प्रथम प्रयास में ये मुक्तक,
विषय-प्रकृति/नियति/कुदरत ।
अति-दोहन से संतप्त प्रकृति है |
हुई बालात्कारी कहीं नियति है |
कुदरत का फिर न्याय देखकर ..
क्यूँ नहीं चेते..मनुज तेरी मति है ||
-------------अलका गुप्ता-------------

सभी रचनाकारों का स्‍वागत एवं अभिनंन्‍द है 
















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