अध्यक्ष गुरूवर लव कुमार प्रणय जी के भागीरथी प्रयास से गोपाल राम गहमरी साहित्यसमारोह -16 दिनांक 15 से 16 जनू 2014 का दूसरा चरण हमारा रविवार
पूर्ण हुआ। हम समस्त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्त रचनाकारों एवं
अध्यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके स्वस्थ जीवन एवं
उज्ज्वल भविष्य के लिये प्रार्थना करतें है।
इस समारोह की विजेता आदरणीया --श्रीमती कान्ति शुक्ला जी है जो गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 में हमारा रविवार की अध्यक्षा होगी
रचनाकारों के नाम क्रमस: आदरणीया कैलाशचन्द्रा, आदरणीया कान्ती शुक्ला जी( विजेता एवं समारोह ' 17 की अध्यक्षा) आदरणीय सुरेश उत्साही जी, आदरणीय रजनीश तपन जी , आदरणीया रमा वर्मा जी, अखंड गहमरी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीय करन एस पी जी, आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१६
हमारा रविवार में- गीत / ग़ज़ल /छंद /दोहा /संपूर्ण परिचय के साथ
विधा -गीत
मापनी स्थायी-२१२२ २१२२ २१२
मापनी अंतरा- २१२२ २१२२ २१२२ ( आदरणीय लव कुमार 'प़णय' जी को सादर समर्पित )
तुकांत विधान -स्थायी -अता रहा
अंतरा १-अर अंतरा २-आकर अंतरा ३-अर
अपना रविवार =में एक गीत
अध्यक्ष्य -परम पूज्य श्री लव कुमार प्रणय जी
के चरणो में समर्पित -यह गीत
बहर=२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत -अके लिए
इस समारोह की विजेता आदरणीया --श्रीमती कान्ति शुक्ला जी है जो गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 में हमारा रविवार की अध्यक्षा होगी
रचनाकारों के नाम क्रमस: आदरणीया कैलाशचन्द्रा, आदरणीया कान्ती शुक्ला जी( विजेता एवं समारोह ' 17 की अध्यक्षा) आदरणीय सुरेश उत्साही जी, आदरणीय रजनीश तपन जी , आदरणीया रमा वर्मा जी, अखंड गहमरी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीय करन एस पी जी, आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
Kanti Shukla
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१६हमारा रविवार में- गीत / ग़ज़ल /छंद /दोहा /संपूर्ण परिचय के साथ
विधा -गीत
मापनी स्थायी-२१२२ २१२२ २१२
मापनी अंतरा- २१२२ २१२२ २१२२ ( आदरणीय लव कुमार 'प़णय' जी को सादर समर्पित )
तुकांत विधान -स्थायी -अता रहा
अंतरा १-अर अंतरा २-आकर अंतरा ३-अर
प़ीत का सपना मदिर छलता रहा ।
आस का दीपक मगर जलता रहा ।
रिक्त अंजलि भाव की मेंहदी लगा कर
सित महावर याद की पायल बजा कर
साध करके सांस का सम्बन्ध चूनर
दामिनी सी पीर कंपित आह भर-भर
आँख का काजल बिलख बहता रहा ।
प़ाण का पंछी मगर उड़ता रहा ।
मांग में रंगीन कुमकुम को लगा कर
नेह का विश्वास बिंदिया में बसा कर
कल्पना के कक्ष में खुद को सुला कर
वेदना के सत्य को मन से भुला कर
प्यार का बंधन व्यथा सहता रहा ।
अनमना कंगन मगर बजता रहा ।
रेत के घर में विछौना डाल कर
कामना के मोह सा मन का कलेवर
भावना के कोष का संस्पर्श देकर
टीसता सा प़ीत का अनुबंध दुस्तर
चाँदनी के पंथ पर चलता रहा ।
द्वार की आहट मगर सुनता रहा ।
कान्ति शुक्ला
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सुरेश कुमार उत्साहीआस का दीपक मगर जलता रहा ।
रिक्त अंजलि भाव की मेंहदी लगा कर
सित महावर याद की पायल बजा कर
साध करके सांस का सम्बन्ध चूनर
दामिनी सी पीर कंपित आह भर-भर
आँख का काजल बिलख बहता रहा ।
प़ाण का पंछी मगर उड़ता रहा ।
मांग में रंगीन कुमकुम को लगा कर
नेह का विश्वास बिंदिया में बसा कर
कल्पना के कक्ष में खुद को सुला कर
वेदना के सत्य को मन से भुला कर
प्यार का बंधन व्यथा सहता रहा ।
अनमना कंगन मगर बजता रहा ।
रेत के घर में विछौना डाल कर
कामना के मोह सा मन का कलेवर
भावना के कोष का संस्पर्श देकर
टीसता सा प़ीत का अनुबंध दुस्तर
चाँदनी के पंथ पर चलता रहा ।
द्वार की आहट मगर सुनता रहा ।
कान्ति शुक्ला
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अपना रविवार =में एक गीत
अध्यक्ष्य -परम पूज्य श्री लव कुमार प्रणय जी
के चरणो में समर्पित -यह गीत
बहर=२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत -अके लिए
एक कोशिश
जिंदगी के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
शांति होती नहीं ये कभी इन्द्रियाँ
चाट जाती सभी भोग सामग्रियाँ
ये न थकती कभी सौ बरस हम जिए
... कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
=======================
लाडले पुत्र हैं लाड़ली पुत्रियाँ
हम करें माँग पूरी मिटे दूरियाँ
क्यों बने आज कोल्हू उन्हीं के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
एक दिन सब यहीं तो रहेगा धरा
साँस का सिलसिला तो रहेगा भरा
फूँक देंगे जिए है आप जिनके लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
=======================
यह मनुज जन्म क्या इसलिए है मिला
भोग औ वासना का चले सिलसिला
तुम विचारे कभी एक क्षण के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
========================
आज भी तो कई चाहते प्यार को
माँगते आपकी स्नेह की धार को
क्यों नहीं नीर की बूँद मेरे लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
दींन को आपका यदि सहारा मिले
डूबते को तनिक भी किनारा मिले
चल समय दान दें अब भजन के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
=======================
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
अहमदाबाद
-------------------------------------------------------------------------------------------
रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)
जरा सा ख्वाव देकर वो,नीद मेरी चुराते हैँ।
बड़ा आसान है आना,बड़ी मुश्किल से जाते हैँ।
जिंदगी के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
शांति होती नहीं ये कभी इन्द्रियाँ
चाट जाती सभी भोग सामग्रियाँ
ये न थकती कभी सौ बरस हम जिए
... कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
=======================
लाडले पुत्र हैं लाड़ली पुत्रियाँ
हम करें माँग पूरी मिटे दूरियाँ
क्यों बने आज कोल्हू उन्हीं के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
एक दिन सब यहीं तो रहेगा धरा
साँस का सिलसिला तो रहेगा भरा
फूँक देंगे जिए है आप जिनके लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
=======================
यह मनुज जन्म क्या इसलिए है मिला
भोग औ वासना का चले सिलसिला
तुम विचारे कभी एक क्षण के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
========================
आज भी तो कई चाहते प्यार को
माँगते आपकी स्नेह की धार को
क्यों नहीं नीर की बूँद मेरे लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
======================
दींन को आपका यदि सहारा मिले
डूबते को तनिक भी किनारा मिले
चल समय दान दें अब भजन के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
अहमदाबाद
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रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)
जरा सा ख्वाव देकर वो,नीद मेरी चुराते हैँ।
बड़ा आसान है आना,बड़ी मुश्किल से जाते हैँ।
मुझे बदनाम करती हैँ,मेरी अब पाँव की ठिठकन।
सुबह पीते हैँ आँखोँ से,शाम तक लड़खड़ाते हैँ।
अगर भौँरा बना हूँ मै,तो इसमे दोष उनका है।
फूल खिलते हैँ अधरोँ पर,नजर से चूम आते हैँ।
अभी ऊबा हुआ हूँ मै,गुजरती शाम बोझिल है।
हवा चलती है आँधी सी,दीप फिर भी जलाता हूँ।
जिँदगी ये मेरी अब तो,तुम्हारे दीद की प्यासी।
आइना पोछकर देखूँ,नजर फिर भी न आते है।
तपन की आरज़ू भी,अब बड़ी बेकार लगती है।
ख्वाहिश मे तुम्हारी ही,हमेशा छटपटाते हैँ।
रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
ग़ज़ल
बहर - १२२२ / १२२२ / १२२२ / १२२२
===============================
हुआ इक शोर सा दिल में लगा जैसे कि तुम आये
निखरने मैं लगी ऐसे कि जैसे फूल खिल जाये
सुबह पीते हैँ आँखोँ से,शाम तक लड़खड़ाते हैँ।
अगर भौँरा बना हूँ मै,तो इसमे दोष उनका है।
फूल खिलते हैँ अधरोँ पर,नजर से चूम आते हैँ।
अभी ऊबा हुआ हूँ मै,गुजरती शाम बोझिल है।
हवा चलती है आँधी सी,दीप फिर भी जलाता हूँ।
जिँदगी ये मेरी अब तो,तुम्हारे दीद की प्यासी।
आइना पोछकर देखूँ,नजर फिर भी न आते है।
तपन की आरज़ू भी,अब बड़ी बेकार लगती है।
ख्वाहिश मे तुम्हारी ही,हमेशा छटपटाते हैँ।
रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
ग़ज़ल
बहर - १२२२ / १२२२ / १२२२ / १२२२
===============================
हुआ इक शोर सा दिल में लगा जैसे कि तुम आये
निखरने मैं लगी ऐसे कि जैसे फूल खिल जाये
दिखाये ख्वाब जो तुमने हुये हैं आज वो पूरे
जिधर देखूं उधर दिखते मुझे बस प्यार के साये
नजारे गुनगुनाते हैं फिजाएं मुस्कुराती है
बहारें झूम कर आये चमन में फूल बिखराये
हुआ किसका असर मुझपर न मुझको चैन आये अब
मिरे ख़्वाबों खयालों को न जाने कौन महकाये
हमारी है नहीं फितरत बगावत क्या करें किससे
दगाबाजी किसी ने की उसे हम सह नहीं पाये......
---
~ रमा वर्मा
-----------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
एंव गुरूवर आदरणीय ओम नीरव जी को समर्पित
विधा ' गजल
जिधर देखूं उधर दिखते मुझे बस प्यार के साये
नजारे गुनगुनाते हैं फिजाएं मुस्कुराती है
बहारें झूम कर आये चमन में फूल बिखराये
हुआ किसका असर मुझपर न मुझको चैन आये अब
मिरे ख़्वाबों खयालों को न जाने कौन महकाये
हमारी है नहीं फितरत बगावत क्या करें किससे
दगाबाजी किसी ने की उसे हम सह नहीं पाये......
---
~ रमा वर्मा
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
एंव गुरूवर आदरणीय ओम नीरव जी को समर्पित
विधा ' गजल
काफिया ---आती
रदीफ---भी नहीं है
बहर - 1222 1222 1222 122
हमारे प्यार को वो अब निभाती भी नहीं है
जलाये क्यों हमारा दिल बताती भी नहीं है
लिखा जो गीत उसने वेवफाई पे हमारी
कभी वह गीत हमको तो सुनाती भी नहीं है
बनाया था महल मैनें कभी उनके लिये जो
पड़ा है आज भी सूना जलाती भी नहीं है
बड़े अरमान थे उनसे सजाये जिन्दगी में
मगर उनको कभी अब वो सजाती भी नहीं है
करें किससे शिकायत जिन्दगी की हम बताओ
कभी भी प्यार से मुझको बुलाती भी नहीं है
अखंड गहमरी एडमिन रचना गुरूजनो एवं अग्रज मित्रो के सुझाव एंव मार्गदर्शन हेतु
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय भाई अखंड गहमरी जी को सादर
**गजल **
(शिल्प विधान -मापनी = 2122 2122 212 22
फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन फैलुन
रदीफ़ --नहीं आँसू
काफिया --अते )
अब हमारी आँख से रुकते नहीं आँसू
रिस रहे ये घाव अब भरते नहीं आँसू
रदीफ---भी नहीं है
बहर - 1222 1222 1222 122
हमारे प्यार को वो अब निभाती भी नहीं है
जलाये क्यों हमारा दिल बताती भी नहीं है
लिखा जो गीत उसने वेवफाई पे हमारी
कभी वह गीत हमको तो सुनाती भी नहीं है
बनाया था महल मैनें कभी उनके लिये जो
पड़ा है आज भी सूना जलाती भी नहीं है
बड़े अरमान थे उनसे सजाये जिन्दगी में
मगर उनको कभी अब वो सजाती भी नहीं है
करें किससे शिकायत जिन्दगी की हम बताओ
कभी भी प्यार से मुझको बुलाती भी नहीं है
अखंड गहमरी एडमिन रचना गुरूजनो एवं अग्रज मित्रो के सुझाव एंव मार्गदर्शन हेतु
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय भाई अखंड गहमरी जी को सादर
**गजल **
(शिल्प विधान -मापनी = 2122 2122 212 22
फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन फैलुन
रदीफ़ --नहीं आँसू
काफिया --अते )
अब हमारी आँख से रुकते नहीं आँसू
रिस रहे ये घाव अब भरते नहीं आँसू
क्यों उठाते हो कसम झूठे जमाने की
इस तरह धोखा कभी करते नहीं आँसू
दर्द से रिश्ता निभाते जा रहे हैं हम
इस लिए नम आँख के मरते नहीं आँसू
है बहुत अंगार का मौसम बहारों में
फूल बनकर अब यहाँ झरते नहीं आँसू
जो अँधेरों से उजाले छीन कर लाते
उन सहारों से 'प्रणय' डरते नहीं आँसू
(लव कुमार 'प्रणय' )
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
समय- रविवार सुबह 10 बजे से सोमवार सुबह 10 बजे के अन्तर गत
ँँँँ
विधा - गीत
शिल्प विधान- मुखडे तथा अंतरे सहित सभी पूरक पंक्तियों की मापनी-
221, 2122 , 221, 2122 के क्रम मे
तीसरे बंद मे मुखडे की पूरक पंक्ति मे मात्रा पतन का लाभ लिया गया है।
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त- आ रहे हैं।
अन्तरोँ का तुकान्त-
1- आह मे मिले थे।
2- अकर।
3- अडे हैं
समारोह अध्यक्ष आदरणीय लव कुमार प्रणय जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँँँ
वो मीत शाम हर पल, बस याद आ रहे हैं।
क्षण ग्रीष्म तपन बनकर , तन को जला रहे हैं।
इस तरह धोखा कभी करते नहीं आँसू
दर्द से रिश्ता निभाते जा रहे हैं हम
इस लिए नम आँख के मरते नहीं आँसू
है बहुत अंगार का मौसम बहारों में
फूल बनकर अब यहाँ झरते नहीं आँसू
जो अँधेरों से उजाले छीन कर लाते
उन सहारों से 'प्रणय' डरते नहीं आँसू
(लव कुमार 'प्रणय' )
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
समय- रविवार सुबह 10 बजे से सोमवार सुबह 10 बजे के अन्तर गत
ँँँँ
विधा - गीत
शिल्प विधान- मुखडे तथा अंतरे सहित सभी पूरक पंक्तियों की मापनी-
221, 2122 , 221, 2122 के क्रम मे
तीसरे बंद मे मुखडे की पूरक पंक्ति मे मात्रा पतन का लाभ लिया गया है।
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त- आ रहे हैं।
अन्तरोँ का तुकान्त-
1- आह मे मिले थे।
2- अकर।
3- अडे हैं
समारोह अध्यक्ष आदरणीय लव कुमार प्रणय जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँँँ
वो मीत शाम हर पल, बस याद आ रहे हैं।
क्षण ग्रीष्म तपन बनकर , तन को जला रहे हैं।
बन दर्शिका मुझे वो, हर राह मे मिले थे।
मन्दिर व मस्जिदों में, दरगाह मे मिले थे।
अब कब्र पास आकर, दीपक जला रहे हैं।
वो मीत....(1)
ये कंटकीय पथ है, चलना जरा ठहरकर।
खल खार चुभ न जायें, इस प्यार को जकडकर।
हर शूल को छिपा कर, चाहत दिखा रहे हैं।
वो मीत.....(2)
बन दामनीय आशिक , पगदान मे पडे हैं।
कर कंगनी खनक में, गलहार मे जडे हैं।
संग आँचली कफन के, सबको जला रहे हैं।
वो मीत....(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
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मन्दिर व मस्जिदों में, दरगाह मे मिले थे।
अब कब्र पास आकर, दीपक जला रहे हैं।
वो मीत....(1)
ये कंटकीय पथ है, चलना जरा ठहरकर।
खल खार चुभ न जायें, इस प्यार को जकडकर।
हर शूल को छिपा कर, चाहत दिखा रहे हैं।
वो मीत.....(2)
बन दामनीय आशिक , पगदान मे पडे हैं।
कर कंगनी खनक में, गलहार मे जडे हैं।
संग आँचली कफन के, सबको जला रहे हैं।
वो मीत....(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
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