Sunday, 29 June 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍यसमारोह -15 दिनांक 8 से 9 जनू 2014 का 2सरा चरण हमारा रविवार अध्‍यक्षप प्रो0 विश्‍वम्‍बर शुक्‍ला जी

इस प्रकार आदरणीय अध्‍यक्षप प्रो0 विश्‍वम्‍बर शुक्‍ला जी , एवं कार्यक्रम संचालकआदरणीय धीरज श्रीवास्‍तव जी के भागीरथीप्रयास से आदरणीय गुरूवर ओम नीरवजी को समर्पित गोपाल राम गहमरी साहित्‍यसमारोह -15 दिनांक 8 से 8 जनू 2014 का 2सरा चरण हमारा रविवार  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍तरचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,संचालक एवं आदरणीयगुरूवर ओमनीरव का आभार प्रकटकरते है तथा उनके स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वलभविष्‍य की कामना करतें है।

जिसमें विजेता आदरणीय लव कुमार प्रणय जी हुए

वह आगामी गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह '16 के हमारा रविवार मे अध्‍यक्ष हो के पद पर अासीन

रचनाकारों के नाम क्रमस: अादरणीय प्रो0 विश्‍वम्‍भर शुक्‍ला जी,संतोष नेमा जी , आदरणीया रमा वर्मा जी, आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु  जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तव जी, सुरेश कुमार मिश्रा , अखंड गहमरी , आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी।

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सम्मान्य Om Neerav जी का हार्दिक अभिनन्दन !
मित्र Akhand Gahmari जी , धीरज श्रीवास्तव जी, लव कुमार 'प्रणय' जी एवं स्नेही मित्रों के सम्मानार्थ _
*
एक अतिथि रचना ~

गीतिका ~
*
प्रात है,साँझ है,दोपहर जिंदगी,
हिम-नदी सी गयी है ठहर जिंदगी !
~
वेग है,ज्वार है,आग है जिंदगी ,
गंग की धार ,शीतल लहर जिंदगी !
~
एक जीवंत दर्शन मचलता हुआ ,
वेद की इक ऋचा सी प्रखर जिंदगी !
~
एक डुबकी लगी आस्था की और
कैसे देखो गयी है निखर जिंदगी !
~
कंठ में है गरल और मुख पर हंसी ,
हो गयी अब शिवम् उम्र-भर जिंदगी !
______________________विश्वम्भर शुक्ल

Santosh Nema
परम आदरणीय ओम नीरव जी एवं प्रो विशम्भर शुक्ल जी को समर्पित -
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बहता हुआ पानी खुद अपनी राह बना लेता है ....!
सहारा तिनके का बचने की चाह बना लेता है ....!
समुन्दर भी किनारे है फिर भी हम प्यासे हैं
रुठने के पहले ही हमें हमराह बना लेता है ....!
लौट के जरूर आएंगे वो ये यकीं हैं हमको,
जाने के पहले ही ये दिल गवाह देता है ....!
हम तो रखते थे उन्हें निगाह में अपनी
वो भी हमें अपने दिल में पनाह देता है ...!
मेरी हकीकत को ख्वाब समझने वालो,
प्यार पत्थर को भी जापनाह बना देता है ....!
दिल की महफ़िल में हैं गम भी शरीक....
प्यार इंसान को शहंशाह बना देता है ...!

आदरणीय श्री प्रोफ़ेसर विशम्भर शुक्ला जी को सादर समर्पित :
विधा - गजल
काफिया - आने
रदीफ - दो जरा
बहर - २१२२/ २१२२/ २१२
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गीत कोई गुनगुनाने दो जरा
साज भी हमको बजाने दो जरा १
चल दिया जिसने अकेला छोड़कर
गम हमें उसका भुलाने दो जरा २
चाँद तारों का भला हम क्या करें
फूल बागों में खिलाने दो जरा ३
आ गया मनमीत फिर मेरी गली
राह तारों से सजाने दो जरा ४
ख्वाब हैं, ये तो हकीकत है नहीं
नींद से खुद को जगाने दो जरा ५
बुझ गये रोशन दिये तो गम नहीं
एक जुगनू ढूंढ लाने दो जरा ६
आँधियाँ भी लौट के फिर जायेगी
हौसला हमको दिखाने दो जरा ७
~रमा~ (७-६-१४)


परम आदरणीय ओम नीरव जी एवं प्रो विशम्भर शुक्ल जी को समर्पित -
गीत रचना
कुछ ऐसे पुकारा तुमने
कदम रुक न सके अपने
कुछ ऐसे ..........
बिजली सी चमक उठी नैनो मे
सरगम सी बज उठी साँसों मे
हृदय वीणा झंकृत कर दी
कुछ ऐसे .........................
अन्तर्मन की कुसुमावलियों मे
उद्गारों की हारावलियों मे
शब्द सुशोभित सज्जित कर दी
कुछ ऐसे ......................
अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु '

@ विधा - गीत
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत- अली गई!
सभी अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-आती थी।2-ओरी है।3-ऊटी थी।4-अंका।
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार- 16 - 10 के क्रम मेँ।
प्रत्येक अंतरे का मात्रा भार-16 - 14 के क्रम मेँ।
परम आदरणीय ओम नीरव सर के सम्मान मेँ परम आदरणीय प्रो.विश्वम्भर शुक्ल सर के समक्ष सादर प्रस्तुत।@
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देख गाँव का भ्रष्ट आचरण
कमली चली गई!
हँसती गाती रही हमेशा
अक्सर ही इतराती थी!
संग सुमन के रही खेलती
मन ही मन हर्षाती थी!
उस उपवन के माली से ही
मसली कली गई!
देख गाँव का.....
माथ पकड़ कर झिनकन रोता
रोती बहुत कटोरी है!
हाय विधाता क्या कर डाला
किसकी सीना जोरी है!
बड़की छुटकी बचीँ भाग्य से
मँझली छली गई!
देख गाँव का.....
मुखिया जी सब जान रहे थे
किसने अस्मत लूटी थी!
और बिचारी क्योँकर आखिर
अन्दर से वह टूटी थी!
देशी दारू थी पहले ही
मछली तली गई!
देख गाँव का.....
थोड़ा सा वह हिम्मत करती
और बजाती जो डंका!
रावण तो मरता ही मरता
खूब जलाती वह लंका!
कैसे कह दूँ ठीक किया औ
पगली भली गई!
देख गाँव का.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव

आ. श्री प्रोफ़ेसर विशम्भर शुक्ला जी
के चरणो में समर्पित यह गीत
आप सब के अवलोकन एवं मार्गदर्शन
के लिए यह गीत अभिलाषी है
बहर==२१२ २१२ २१२ २१२
एक गीत का प्रयास
तुकांत -अफा है कहाँ
देख लो वेवफा को खुदी आज तुम
प्यार में कौन कहता वफ़ा है कंहाँ
आज तो हैं बना प्यार खिलवाड़ हैं
मोड़ तू मुँह चली कर रही नाज तुम
काश ऐसी चलन हीर देते सजा
पूँछता हूँ बता फलसफा हैं कहाँ
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प्यार तो हैं सजा याचना भाव से
मानते हैं सभी हम बड़े चाव से
हर तरफ प्रेम देखों उजड़ ही रहाँ
जान लेकर छिपाती रही राज तुम
झूठ के प्यार में क्या मिली है मजा
तुम बताओ सहीं अब जफ़ा हैं कहाँ
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मौज की तो नहीं प्यार की राह हैं
आज भी देख लो प्यार की चाह हैं
प्रेम पूजा गया यह सुनो तुम सभी
झूठ की नींव में यह उखड़ ही रहा
प्यार में अब नहीं स्नेह की वह मजा
वेवफा सोचती हैं नफा हैं कहाँ
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तोड़ना दिल किसी का सरल हैंबहुत
दर्द में बह गयें अब गरल हैं बहुत
प्यार की उस तपिश से झगड़ ही रहा
ढूँढता मैं अभी प्रेम को ही रहा
टूट कर प्रेम में अब खिले क्या फिजा
सोचती प्रेम में वेवफा वहा खफा है कहाँ
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सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -15
रविवार विशेष में
आदणीय अध्‍यक्ष श्री विश्‍वम्‍भर शुक्‍ल जी के समक्ष
आदरणीय ओमनीरव जी को समर्पित एक अतिथि रचना
विधा - गजल
काफिया --आये
काफिया---कैसे
बहर - 2122 2122 2122 22
बात भी दिल की तुझे हम अब बताये कैसे
साथ जो हमने बिताये पल भुलाये कैसे
बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना
बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटाये कैसे
मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे
पास हम अपने बुलायें तो बुलाये कैसे
आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे
लाश भी कोई हमारी अब जलाये कैसे
खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा
दाग दामन पर लगे हैं वो धुलाये कैसे
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर


हम आप सब रचनाकारो का हार्दिक स्‍वागत करते है।
दिनांक 8 से 9 जून

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