बुधवार से गुरूवार ----गीत गजल की दुनिया
शीर्षक ----**स्वागत **
गीत के रस मे शब्दों की मीश्री घुलाते रहे
तुम गजल बन गयी हम गुनगुनाते रहे .
शीर्षक ----**स्वागत **
गीत के रस मे शब्दों की मीश्री घुलाते रहे
तुम गजल बन गयी हम गुनगुनाते रहे .
दिल का कोना दरक जाता है तुम्हारे बीना,
हसी बिखेर कर लवो पर मुस्कराते रहे .
मन उपवन सूख गया सावन की आस मे ,
प्यार गुलसन की खातीर आखो से अश्रु बहाते रहे .
तुम धून बन गयी तरंग मे खो गयी,
हम लिखते रहे फिजाओ मे बिखराते रहे .
अंधेरा हो न जाए प्रीत का आंगन निसा मे ,
तेल बनाकर लहु का नव्जो की बाती जलाते रहे .
प्यार के बंधन मे बंधकर आओगे यकि है 'गजल',
तेरे स्वागत मे कदमों तले खूद को बिछाते रहे.
हसी बिखेर कर लवो पर मुस्कराते रहे .
मन उपवन सूख गया सावन की आस मे ,
प्यार गुलसन की खातीर आखो से अश्रु बहाते रहे .
तुम धून बन गयी तरंग मे खो गयी,
हम लिखते रहे फिजाओ मे बिखराते रहे .
अंधेरा हो न जाए प्रीत का आंगन निसा मे ,
तेल बनाकर लहु का नव्जो की बाती जलाते रहे .
प्यार के बंधन मे बंधकर आओगे यकि है 'गजल',
तेरे स्वागत मे कदमों तले खूद को बिछाते रहे.
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह **9
हमारा दिन हमारी मर्जी
आदरणीया अध्यक्षा गुडिया सिहं
एवं मंच संचालक आदरण्ाीय देव उपाध्याय जी की सेवा में प्रेषित
विधा ' गजल दामन के दाग
हमारा दिन हमारी मर्जी
आदरणीया अध्यक्षा गुडिया सिहं
एवं मंच संचालक आदरण्ाीय देव उपाध्याय जी की सेवा में प्रेषित
विधा ' गजल दामन के दाग
बात भी दिल की तुझे हम अब बतायें कैसे
साथ जो हमने बिताये पल भुलायें कैसे
बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना
बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटायें कैसे
मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे
पास हम अपने बुलायें तो बुलायें कैसे
आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे
लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे
खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा
दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे
अखंड गहमरी एडमिन रचना
साथ जो हमने बिताये पल भुलायें कैसे
बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना
बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटायें कैसे
मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे
पास हम अपने बुलायें तो बुलायें कैसे
आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे
लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे
खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा
दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे
अखंड गहमरी एडमिन रचना
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह **९
सोमवार से मंगलवार----हमारा दिन हमारी मर्जी
स्वर्गीय गोपाल राम गहमरी एवं
अध्यक्षा *****गुडिया सिहं को सादर समर्पित एक रचना
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सोमवार से मंगलवार----हमारा दिन हमारी मर्जी
स्वर्गीय गोपाल राम गहमरी एवं
अध्यक्षा *****गुडिया सिहं को सादर समर्पित एक रचना
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जीवन भर तुझे जपी न राम
अब पुजती हूँ तुझे भगवान
बोलो फल दोगे क्या
मांगू न सोना - चाँदी
न ही हिरा- मोती
बना ले मुझे बस अपनी दासी
थोड़ी सी कृपा कर दे तू
जीवन----------दोगे क्या
माया में मैं लिप्त रही
मेरा -मेरा करती रही
अब हुआ मुझे ऐहसास
कुछ नहीं अपने पास
कर्मों से खली मेरे हाथ
बोलो फल दोगे क्या
जीवन ------------दोगे क्या
मानव का निर्मल तन पाया था
कितना सुन्दर अवसर पाया था
पर व्यर्थ में इसे गंवाया
मुर्ख हूँ मैं
मैंने भी ये माना
बोलो फल दोगे क्या
जीवन----------------दोगे क्या
"कल्याणी झा"
अब पुजती हूँ तुझे भगवान
बोलो फल दोगे क्या
मांगू न सोना - चाँदी
न ही हिरा- मोती
बना ले मुझे बस अपनी दासी
थोड़ी सी कृपा कर दे तू
जीवन----------दोगे क्या
माया में मैं लिप्त रही
मेरा -मेरा करती रही
अब हुआ मुझे ऐहसास
कुछ नहीं अपने पास
कर्मों से खली मेरे हाथ
बोलो फल दोगे क्या
जीवन ------------दोगे क्या
मानव का निर्मल तन पाया था
कितना सुन्दर अवसर पाया था
पर व्यर्थ में इसे गंवाया
मुर्ख हूँ मैं
मैंने भी ये माना
बोलो फल दोगे क्या
जीवन----------------दोगे क्या
"कल्याणी झा"
सोमवार (मुक्तक)
नव युग की नव वेला मे, आगाज यहि चहना होगा.
विकसित राष्ट्र हमारा हो, विश्वविजय गहना होगा.
न ठिठक कभी पथ पर युवा, तू राष्ट्र निर्माता है,
रचना करनी है श्रृष्टी का, तू भारत भाग्य विधाता है.
नव युग की नव वेला मे, आगाज यहि चहना होगा.
विकसित राष्ट्र हमारा हो, विश्वविजय गहना होगा.
न ठिठक कभी पथ पर युवा, तू राष्ट्र निर्माता है,
रचना करनी है श्रृष्टी का, तू भारत भाग्य विधाता है.
धनञ्जय उपाध्याय 'गजल
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