Monday, 30 June 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह '18,प्रा0 27 से 29 जून हमारा मुक्‍तक --तक अध्‍यक्ष धीरज श्रीवास्‍तव

इस प्रकार कार्यक्रम अध्‍यक्ष धीरज श्रीवास्‍तव जी के भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -18 दिनांक 27 से 29 जनू 2014 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।


                     इस कार्यक्रम में क्रसम: आदरणीय कन्‍हैया तिवारी जी, आदरणीय कमलेश दिवेदी जी, आदरणीया मंजू शर्मा जी, आदरणीय महेश जैन ज्‍योति जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तव जी, आदरणीय लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीवाल जी, आदरणीया मंदाकनी गौरी जी, आदरणीया अन्‍नपूर्णा बाजपेयी जी, आदरणीय ओमप्रकाश नाटियाल जी, आदरणीय हीरा लाल प्रजापति जी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीया रमा वर्मा जीी, आरणीय पवन गोयल जी, आदरणीया सुमन जोशी दूबे जी, आदरणीय नारायण गौरव जी, आदरणीय गुरमीत सिहं गुनी जी, आदरणीय नागौरी गेटसे जी, आदरणीय नगेन्‍द्र सिह नीरव जी, अखंड गहमरी, आदरणीया रेखा जोशी जी ,आदरणीया पारूल गुप्‍ता जी,  आदरणीया कान्‍ती शुक्‍ला जी, आदरणीय उद्धव देवली  जी, आदरणीय सतीश कुमार मिश्रा जी, आदरणीय कैलास भारदवाज जी, आदरणीय रजनीश तपन जी, आदरणीय महावीर सिहं जी , आदरणीय कवि सतीश मधुप जी एवं आदणी प्रियंका पांडे जी की रचनाये प्रस्‍तुत हुई जिसके आप सभी का आभार एवं हम आशा करते है कि आप भविष्‍य में ही इस प्रकार का दुलार एवं स्‍नेह बनाये रखेगें।।

इस कार्यक्रम में प्रथम स्‍थान पर ----आदरणीय कन्‍हैया तिवारी जी
दिवतीय स्‍थान पर आदरणीय -------कमेलश दिवेदी जी
एवं प्रतिक्रिया में ---------------------उदूधत देवल जी रहे सभी को हार्दिक बधाई

कार्यक्रम में शामिल रचनाए
मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
शज़र जब तक रहा तब तक परिँदा दर नही भूला,
उड़ानेँ थीँ भले ऊँची मगर वो दर नही भूला।
हमेशा कामयाबी की बुलंदी चूमता है वो,
जो माँ के पाक़ क़दमो मेँ झुकाना सर नही भूला।
"कन्हैया तिवारी"

मुक्तक-27जून 2014
विषय-मां
अध्यक्ष -श्री धीरज श्रीवास्तव
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जब से बेटे से बिछडी वो खाना-पीना भूल गई.
ऐसा लगता है जैसे माँ जीवन जीना भूल गई.
बेटे के बेटे की खातिर कितने कपडे सी डाले,
खुद का दामन तार-तार था उसको सीना भूल गई.
डाॅ.कमलेश द्विवेददी,मो.09415474674

Manju Sharma
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि---
बूढ़े चेहरे पे छायी हर झुर्री , कहती है अनगिनत कहानियाँ
जवानी के गुजारे हर पल , जिसने सुनाने में जिन्हें लोरियाँ
अड़चन लगने लगती वही , जो भगवान का प्रतिरूप इस जहाँ में
व्यस्त हो जाते उसी माँ को भूल ,भोगने दुनिया की मस्तियाँ
--- मँजु शर्मा --- २९-०६-२०१४

साहित्यकारों की धरती- गहमर
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
हमारा मुक्तक -- 27 जून 2014 से 29 जून 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि ।
..............
गौरैया सी सदाँ घरों में चहका करती ,
हरपल उर में प्रेम अग्नि सी दहका
करती ,
गोदी में बैकुण्ठ नेह को तरसें सुरगण ,
माँ के आँचल में ही ममता महका करती ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।

*मुक्तक- 27 जून 2014,
शीर्षक - माँ, अम्मा,माता जननी आदि।
आदरणीय अखंडगहमरी जी तथा अन्य विद्वानोँ के समक्ष सादर प्रस्तुत*
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रोज गगन से मेरे खातिर चाँद उतारा अम्मा ने!
सिर था मेरा टेढ़ा मेढ़ा बहुत सँवारा अम्मा ने!
पाँवोँ की मैँ रज चूमूँ सौ बार लगाऊँ माथे पर,
और ऋणी हूँ जन्म जन्म जो मुझे दुलारा अम्मा ने!
रचना - धीरज श्रीवास्तव।
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
मुक्तक (विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि.)
माता पन्ना धाय ने पाला वीर प्रताप,
दुश्मन लोहा मानते पाकर के संताप |
पाकर के संताप दुश्मन पन्ना को कोसे
माँ वसुधा को चाहिए ऐसे वीरों के खाप
|
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक (27 से 29 जून तक )
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव को समर्पित
विषय--- माँ/जननी/माता/माँई
सारे दुःख सहती है माँ ।
नहीं कष्ट कहती है माँ ।।
इसीलिये हर पल मेरे ;
दिल में ही रहती है माँ ।।
---मंदाकिनी गौरी


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि..\
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
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जाने कितने सपने सजाती वो
दिनो दिन फिर उन्हे संवारती वो
मन मे न कोई चाहत वो रखती
प्यारी माँ ,सबको संभालती वो ॥.
.................अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु'


हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित ।
-
घर माँ से मंदिर था , जब तक उनका साया था,-
था सब से अपनापन , नहीं कोई पराया था,
तब माँ गई बैकुण्ठ , स्नेह रिश्ते सब छोड के
हुई मुद्दत जब इस घर , कोई अपना आया था !
-
मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित ।
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बहुत बुरा हो फिर भी उसको बहुत भला ही कहती है ॥
अपना गंदा बच्चा भी माँ दूध धुला ही कहती है ॥
नहलाते-नहलाते अपने कौए से बच्चे को माँ ,
हंस कभी कहती तो कभी लक-दक बगुला ही कहती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक *
अध्यक्ष -श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर
विषय -माँ
*मुक्तक *
माँ जीवन का सार है
ममता और दुलार है
माँ के ही आशीष से
होता बेड़ा पार है
(लव कुमार 'प्रणय')


मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
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माँ है सब वेदों का सार
जिसके चरणों में संसार
स्नेह का जल बरसाती वो
और लुटाती अपना प्यार
~रमा वर्मा~

मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
जो किरदार में दिखे वो तहजीब होती है,
पूरी हुई मन्नत सी जो खुल जाये यूं ही वो नसीब होती है...
बहती है रगों में लहू बनकर देती है सांस प्राण वायु सी
दूर रहकर भी 'मां' मेरे करीब होती है........
(पवन गोयल)
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
जीती जाये दूजो के सपनें खुद के कोई ख्वाब न माँगे
करती जाएं काम सदा ,न पूछे प्रश्न और जवाब न माँगे
जिससे जिन्दा है दुनिया मे ख़ुशियां ,रौनक और जज्बात
उसे माँ कहती है दुनिया,जो अपनी रहमतो का कभी हिसाब न माँगे
सुषमा दुबे
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक-27 से 29 जून 2014
आदरणीय अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तवजी को समर्पित ।
विषय-माँ/अम्मा/माता/जननी ।
हर काल, हर हाल में जिसकी एक सी कथनी और करनी है।
जिसके आँचल की नाव से पार लगती जीवन वैतरणी है ।
वह केवल एक, सिर्फ नेक, मनुष्यों की जाति में सर्वश्रेष्ठ,
माँ, माता, अम्मा, जीवन को जन्म देने वाली जननी है ।
-नारायण गौरव ।

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक
शीर्षक --- माँ
इतना लिपटकर रोया माँ से , मेरे आंसू मोती बन गए
माँ के थप्पड़ जैसे , मेरी आँखों की ज्योति बन गए
जिसने रुलाया माँ को असीमित गमो में दर बदर
खूबसूरत कपडे भी उनके , फटी पुरानी धोती बन गए
‪#‎गुनी‬ ...
गोपाल राम गहमरी समारोह 18
हमारा मुक्तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
उँगली पकड़ के चलना सीखाती माँ,
सिर्फ तू ही निस्वार्थ प्यार निभाती माँ...
हर रूप मे अच्छी लगती ‘ दोस्त ’
अम्मा, मम्मी, मैया, बिजी, माती माँ...
- कल्पेश ... ' दोस्त '...
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह ==18
हमारा मुक्तक
अध्यक्ष .....धीरज श्री वास्तव जी
विषय ........माँ /जननी /माता
वो फ़कीर हो जाता जग में जिसने माँ को खोया
लावारिस हो कर दुनिया में फूट- फूट वह रोया
माँ का आंचल जिसके सिर से जीवन में हट जाए
दुःख विषाद में नहीं अन्य जो उसका सर सहलाये
.................................गांधी (डीडवाना)

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक -27 जून 2014 से 29 जून2014
अध्यक्ष--आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी
विषय --माँ,माई, माता, जननी
दुख में जीकर खुशी वह लुटाती रही ;
पाठ सदा प्रेम का ही,,,,,, पढाती रही ;
रिश्ते कैसे निभाएॅ,,,,,,,,, जगत में यहाँ ?
बेटी को माँ सदा यह,,,,,,,, बताती रही ।।

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी एवं समस्‍त सुधि जन की सेवा में
कहोगें क्‍या उसे तुम तो सताये उम्र भर हो
न दे ही तुम सके रोटी रुलाये उम्र भर हो
बड़े ही प्‍यार से पाला हमें आशा न कोई
कहो क्‍यों माँ को दाई तुम बताये उम्र भर हो
अखंड गहमरी

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक (27 से 29 जून तक )
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव को समर्पित
विषय--- माँ/जननी/माता/माँई
पूत चमके जैसा दिनकर माँ का अरमान
आकाश को छू ले उड़कर माँ का अरमान
अपने बालकों में माँ की बसती है जान
दे आशीष स्नेह भरकर माँ का अरमान
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
*********************************************
माँ को अपनी हम सब आँखों में बसाते हैं
देख कर कष्ट उसका आँसू भी बहाते हैं
धरती माँ जग जननी है समस्त प्राणियों की
क्यूँ फिर उसको रौंदते हम,हर पल जाते हैं
-------------पारुल'पंखुरी'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह - १८ के अन्तर्गत
हमारा मुक्तक
शीर्षक - माँ
अध्यक्ष -सम्मान्य धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
ममता की साकार है प़तिमा ।
माँ की अन्य नहीं है उपमा ।
स्वर्ग-लोक आँचल में बसता -
अवर्णनीय माँ की है महिमा ।
कान्ति शुक्ला
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी को सादर समर्पित ।
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
.
ममता. प्रेम, नेह, अनुराग की जो अतुल्य एवं अवर्णनीय प्रतिमूर्ति है,
संतान कैसी भी, उससे प्यार करना माँ की सहज नैसर्गिक प्रवृति है।
जहाँ तक जाती मेरी यह दृष्टि है, मुझे तो सर्वत्र बस दीखती है माँ
अहर्निश वंदना तेरी वो मेरी माँ, हर पल सच्चे हृदय से तेरी स्तुति है ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई/ 27.06.2014
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -१८,
हमारा मुक्तक-२७ जून से २९ जून २०१४,
समारोह प्रमुख-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी|
बिषय-माँ/माई/अम्मा/माता /जननी/आदि|
==============================
पिता गये बैकुंठ तो माँ ही को हमनें देखा,
रोटी-कपड़ों के लिए भटकनें को हमनें देखा,
हमसे वह कभी न कहती अपनी पीड़ा को,
पर हम रोते तो, माँ के रोनें को हमनें देखा ||
उद्धव देवली /२७-६-२०१४|

अपना मुक्तक =२७.६.१४तो २९.६.१४
शीर्षक =माँ /अम्मा /जननी/एवं पर्यायवाची
बहर(मापनी )=2122 २१२२ २१२२ २१२२
विधा -मुक्तक
आ .परमपूज्य श्री धीरज श्रीवास्तवा जी को समर्पित a
आप करुणा सिंधु हैं माँ ,प्रेम मुझसे कीजिये अब
भावनाओ का मृदुल अब ,भाव सबमे दीजियें अब
मनुजता की पीर से हों ,दिल हमारा मर्माहत
विनय सुत की आज तुम ,स्वाविकार कर लीजिये अब
सुरेश कुमार उत्स

गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
हमारा मुक्तक 27 जून से29 जून
शीर्षक माँ/जननी/पर्यायवाची
समारोह अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव  के समक्ष प्रस्तुत एक रचना।
******
करूं आकाश को कागज़ लिखाई जा नही सकती
महिमा उस की इतनी है बताई जा नही सकती
हम अपनी चाम की जूती बनाकर भी अगर दे दें
तो माँ के दूध की कीमत चुकाई जा नही सकती
~~
"कैलाश भारद्वाज"
फरीदाबाद (हरि.)


राम गोपाल गहमरी साहित्य समारोह=18
हमारा मुक्तक
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव जी ।
शीर्षक =माँ ,माता,माई आदि
<> ¤ <> ¤ <> ¤ <> ¤ <>
कितना सारा दर्द सहा अभी तक मेरी माई ने।
बिल्कुल भी आराम दिया न उसकी फटी बिवाई ने ।
हम लोगोँ की चिन्ता मे,रात दिन उलझी रहती है।
नाम मात्र का खाना खाती,रोती है तन्हाई मे।


गोपाल राम गहमरी समारोह18
हमारा मुक्तक 27 जून से 29 जून तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
मेरा इस मंच पर प्रथम प्रयास आप सब सरस्वती- पुत्रों के समक्ष समीक्षा हेतु प्रस्तुत है:
_______मुक्तक
मन का सारा मैल सहज ही, कुछ पल में धो लेता हूँ
दुनियाँदारी को बिसरा कर, बचपन में हो लेता हूँ
जब मेरा ईश्वर से बातें, करने का मन होता है
जननी की तस्वीर उठाकर, जी भर के रो लेता हूँ
~~ महावीर 'वीर' २७.०६.२०१४

गोपाल राम गहमरी समारोह18
हमारा मुक्तक 27 जून से 29 जून तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
कष्ट घनेरे हों पर माँ की,थपकी से सो जाते हैं।
माँ मीठी लोरी गा दे तो,सपनों में खो जाते हैं ।
पूजन,अर्चन,भजन,प्रार्थना,इनकी भला जरूरत क्या?
माँ कहते ही देव स्वर्ग के,नतमस्तक हो जाते हैं ।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)

मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
मां वो है जो गल्तियां मुस्कुरा के भुला देती है
बचा के जमाने से हमें आंचल में छुपा लेती है
कडी धूप सा तपता है वक्त जब भी कभी
दुआओं का अपनी हम पर साया सा कर देती है
-----प्रियंका

---------------------------------------------------आप सभी रचनाकारों का पुन: अभिनंन्‍दन-------समाप्‍त----------------

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