Monday, 30 June 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18 हमारा रविवार -- 29 जून से 30 जनू 2014

इस प्रकार   गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -18 दिनांक 29 से 30 जनू 2014 का दूसरा  चरण हमारा रविवार  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।

रचनाकारों के नाम क्रमस:  रजनीश तपन जी, आदरणीया रमा वर्मा, आदरणीय कवि मधुप जी , आदरणीय करण एस पी जी, अखंड गहमरी, आदरणीय सतीश वर्मा जी, आदरणीया कान्‍ती शुक्‍ला जी, आदरणीय आकाश महेशपुरी जी, सुरेश कुमार मिश्रा जी , आदरणीय कन्‍हैया तिवारी जी, आदरणीय महावी सिहं जी,  आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।

गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह -18 के हमारा रविवार के  विजेता आदरणीय रजनीश तपन जी 
  एवं गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारेाह 19 हमारा रविवार के आगामी अध्‍यक्ष  भी रजनीश तपन जी


गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह=18
दूसरा चरण,हमारा रविवार
विधा= गीत
शिल्प विधान~
मुखड़े तथा प्रत्येक पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार-16 -16
मुखड़े का तुकांत-आल न पूछो।
अंतरो का तुकांत क्रमशः निम्न है
1-अता है,2-अला करूँगा,3-आरी,4-आया
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी के सम्मुख सादर प्रस्तुत~
(कहीँ कहीँ मात्रा पतन संभव)
<=> <=> <=> <=>
मन का मेरे हाल न पूछो।
मँहगी रोटी दाल न पूछो।
*
एक कमायी ,क्या निभता है?
वस्त्र फटे हैँ,तन दिखता है।
फीस कहाँ से दे पाता मै,
पढ़े न बेटा,मन दुखता है।
सिकुड़ रही है,खाल न पूछो।
मन का मेरे....
**
कितनी मेहनत भला करूँगा।
राह कठिन है,चला करूँगा।
अपनी भी कुछ इच्छा होती,
कब तक सब मे ढला करूँगा?
ठहर गयी है चाल न पूछो।
मन का मेरे....
***
बढ़ी जा रही जिम्मेदारी ।
करे न कोई हिस्सेदारी।
मै करता सब अपने मन से,
सभी समझते,है लाचारी।
तम का गहरा जाल न पूछो।
मन का मेरे.....
****
कभी सुखी होगी ये काया।
नही दर्श मे होगी माया।
क्योँ अपनी जागीर बनायेँ।
इस तृष्णा ने खूब भगाया।
अवसादित वो काल न पूछो।
मन का मेरे.....
मँहगी रोटी...,
द्वारा-रजनीश तपन
डुमरियागंज-सिद्धार्थनगर
उत्तर प्रदेश
Rama Verma
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
ग़ज़ल
रदीफ़ :-कहाँ है,काफिया :-अत
अरकान:-122 122 122 122
*************************************
बची इस जहां में शराफत कहाँ है
खुदा इस जमीं पर इबादत कहाँ है
सहारा न देखा दुआएं न देखी
दिलो में किसी के मुहब्बत कहाँ है
शमां जल रही है निगाहें झुकाये
तिमिर की किसीको जरूरत कहाँ है
न अम्बर झुका था न धरती झुकी थी
मगर बीच इनके शिकायत कहाँ है
जरा झांक भी लो नजर में हमारी
मुहब्बत भरी है तिजारत कहाँ है
अजी बात कर लो निगाहें न फेरो
कि अब दुश्मनी में अदावत कहाँ है....
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 18
दूसरा चरण हमारा रविवार,अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
ग़ज़ल
रदीफ़ :-पड़ेगा ,काफिया :-आना
अरकान:-122 122 122 122
हजारों ग़मों को उठाना पड़ेगा ।
सदा कष्ट में मुस्कराना पड़ेगा ।
गमों में सदा याद आते हैं ईश्वर,
गमों को गले से लगाना पड़ेगा ।
अगर हर तरफ चाहते हो उजाला,
नया एक सूरज उगाना पड़ेगा ।
भले हो अहिंसक मगर याद रखना,
कि दुश्मन पे गोला चलाना पड़ेगा ।
अगर सर झुकाया नहीं है खुदा को,
हर इक दर पे सर को झुकाना पड़ेगा।
ग़ज़ल गर कहेगा 'मधुप' तो उसे भी,
अदब की नदी में नहाना पड़ेगा ।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)

गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
शिल्प विधान-मुखडे सहित सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरों की पंक्तियोँ का मात्राभार-16/16
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त-आल लिए
अंतरो का तुकान्त-
1-ऊर हुआ था
2-आम दिया
3-आरी

समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्र  सादर समर्पित

ठहर ठहर कर चलता सूरज,दुखडो का जंजाल लिए।
मम्मी पापा किसे पुकारे,बेटा खडा कुदाल लिए।
शूल चुभा था उस दिन तन मे,रक्त चाप भी दूर हुआ था।
जिस दिन बेटा बृद्ध आश्रमों,छोड बाप को शूर हुआ था।
कर्म फर्ज को यहीं दफन कर,चला मूढ कंकाल लिए।
बचपन की उँगली के बदले,मिली वेदना भाल लिए।
ठहर...(1)
जिनकी ममता की ज्योति पुंज,धन मान प्रतिष्ठा नाम दिया।
उनकी राहोँ मे कंटक बो,हर अंग अग्नि सम घाम दिया।
विचलित हृदयों की आभा से,फूटा शब्द गुलाल लिए।
तुमको जीवन की राहों मे,पुष्प मिले जयमाल लिए।
ठहर...(2)
ऐसा जीवन भी जीना क्या,जिसमे होँ कर्म दुराचारी।
पैसा रखकर सर पर सोयें,माँ बाप बने हों भीखारी।
ऐसे पूत कुपूतों का विश्वास खडा विकराल लिए।
देखो दर दर आज खडे है,ऐसे पुत्र मलाल लिए।
ठहर...(3)
ँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी एवं आप सब सुधि जनो की सेवा में
विधा - गजल
रदीफ़ -है सितम देखो
काफिया -आते
अरकान - 1222 1222 1222 1222
हमें वो वेवफा कह कर बुलाते है सितम देखो
चुरा कर नीद रातो की सताते है सितम देखो
कभी मै देखता भी तो नहीं था जाम के प्‍याले
कमस दे कर मुझे अपनी पिलाते है सितम देखो
बडे अरमान से जिसने बनाया आशिया मेरा
वही उस आशिया को अब जलाते है सितम देखो
न रूठे वो कभी हमसे हमारे साथ चलते थे
मगर अब साथ गैरो का निभाते है सितम देखो
खुले जो लब कभी जिनके हमारा नाम ही निकले
न जाने क्‍यो वही हमको भुलाते है सितम देखो
अखंड गहमरी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
( अन्य प्रबुद्ध प्रियजनों के अवलोकनार्थ, प्रतिक्रिया आमंत्रण के संग )
श्रृंगार रस , वियोग भाव , स्थायी रति , आवलम्बन नायिका नायक ,
लाटा अनुप्रास , उपमेय – नायक , उपमान स्वाति बूंद , निशा आदि ।
मात्रायें : मुखडा में प्रथम पंक्ति 17 , द्वितीय में 18 । हर छंद के
अंतिम दो पंक्तियों में यही क्रम । प्रथम छंद की चार पंक्तियों ,
हर पंक्ति में 18 , 18 मात्रायें , द्वितीय और तृतीय छंदों में
हर पंक्ति में 16 -16 मात्रायें ) |
शीर्षक : काश तुम मुझसे दूर न होते ।
आप्यायित हो मलय गुनगुनाता,
राका स्मिति फुहारें बरसाती,
प्रीत का गागर अंक में भर कर
मैं उन्मादित नागिन बन जाती ।
बीन प्यार का अधर में रख कर
प्रीतम जब तुम उसे बजाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
कंचन सी काया मुरझाई,
क्लांत दृग आंसू भर भर के,
खुली पलकों से व्योम निहारे,
प्रिय मिलन की तीव्र लहर से ।
मैं बन जाती चातक आकुल,
स्वाति बूँद तुम बन कर आते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
तारक पुष्प वेणी में चमके,
चंद्र ज्योत्सना सी दहके तरुणाई,
नीलगगन का घूंघट ओढ़े,
वधु वेश में निशा शरमाई ।
मैं बन जाती छाया उसकी,
सिंदूर से तुम मांग भर जाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
: सतीश वर्मा

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -१८
दूसरा चरण हमारा रविवार २९ जून से ३० जून २०१४
अध्यक्ष -सम्मान्य सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
रदीफ अधूरी
काफिया ई
मुझे ग़म की जुस्तजू है अभी है खुशी अधूरी ।
जब तक न अश्क़ छलकें रहती हँसी अधूरी ।
हैं खुश्क लब हमारे यूं तिश्नगी के मारे
जो चश्मे-मय न पाई रहे मयकशी अधूरी ।
यह इश्क है हकीकी हरदम सुरूर में है
पीकर जो होश आए रहे बेखुदी अधूरी ।
ऐसा मुकाम आए कोई फर्क रह न जाए
गर नाज़ है खुदी पर रहे बंदगी अधूरी ।
मैं हूँ ख्वाहिशों के सदके जो आज तक जवां हैं
मुझे तून मिल सका है रही जिंदगी अधूरी ।
कान्ति शुक्ला
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
मापनी-122, 122, 122, 12
मुखड़ा तुकान्त- आ लो जरा
अ.1-अम, अ.2-आना मिला,अ.3-अजा
॰॰॰
ज़माना नहीँ ढूँढ पाये हमेँ
हँसीँ गेसुओँ मेँ छुपा लो जरा
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
चलो प्यार मेँ कुछ बढ़ाएँ कदम
न कोई यहाँ हम अकेले सनम
निगाहोँ मेँ डालो निगाहेँ सुनो
अलग ना रहो आ मिलोँ एकदम
न दूरी कभी अब रहे दर्मियाँ
मुझे धड़कनोँ मेँ बसा लो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
जो दिल मेँ तुम्हारे ठिकाना मिला
मुझे तो खुशी का खज़ाना मिला
मिली ये खुशी अब छुपाऊँ कहाँ
मिले तुम कि जैसे ज़माना मिला
नहीँ और सोचूँ कि तेरे सिवा
मैँ टूटा हुआ हूँ सम्हालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
फुहारोँ का आओ उठा लेँ मजा
भले ये ज़माना सुना दे सजा
नहीँ है हमेँ डर किसी का सनम
कि बाहोँ मेँ आके नहीँ तूँ लजा
ये दिन है सुहाना हमारे लिए
उमंगेँ जो दिल मेँ उछालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
गीतकार- आकाश महेशपुरी
Aakash maheshpuri
...
पता-
वकील कुशवाहा उर्फ आकाश महेशपुरी
ग्रा- महेशपुर,पो- कुबेरस्थान
जि- कुशीनगर,उत्तर प्रदेश

हमारा रविवार
अखंडग गहमरी साहित्य में
आप सब के समक्ष्य
एक गीत माँ पर
विधा गीत --माँ ===
मापनी -१२२ १२२ १२२ १२२
तुकांत -अन कर रहा हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
जब गेट खोलू तो खुलता नहीं हैं
इसे खोलने की जतन कर रहां हूँ
जीवन को अँधेरे में होम देकर
सुबह आज मैं तो हवन कर रहां हूँ
माँ ध्यान तेरा भटकता हैं कैसे
तुम्हें रात दिन स्मरण कर रहां हूँ
तेरी दूरियों ने मुझे तोड़ डाला
नहीं हैं पता क्यों सहन कर रहां हूँ
अहसासो से भर गया हूँ लबालब
उस पग को मैं तो नमन कर रहां हूँ
सभीं की दुआ हैं तभी आज फिर से
सुबह शाम तो आचमन कर रहां हूँ
जब आशीष मुझको मिलेगा तेरा
इसी गीत से यह भजन कर रहां हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
विधा-ग़ज़ल
काफ़िया-आनी
रदीफ़-क्या लिखूँ
रुक़्न-2122 2122 212
ज़ुल्फ नागिन सी दिवानी क्या लिखूँ?
इश्क़ की झूठी कहानी क्या लिखूँ?
भूख मुफ़लिस की लिखूँ या ज़ुल्म को,
शाम ढ़लती है सुहानी क्या लिखूँ?
जो न खौले मुल्क़ के हालात पर,
उस लहू की मै रवानी क्या लिखूँ?
जब दिलोँ मेँ इंतिकामी आग हो,
प्यार को फिर आसमानी क्या लिखूँ?
दावतेँ दुश्मन की खाता रोज जो,
उसको अपना खानदानी क्या लिखूँ?
ख़ौफ़ का मंजर हुआ चारो तरफ़,
जिँदगी होती रुमानी क्या लिखूँ?
"कन्हैया" 9984637982
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
_____ ग़ज़ल
रदीफ़ -लगे
काफिया -अहने
अरकान - 212 212 212
घोर अपमान सहने लगे
आइने ....झूठ कहने लगे
आचरण की लचक देखिए
संग* के संग ....रहने लगे
जिन को पर्वत समझते रहे
वो हवाओं में बहने लगे
खौफ़ की इन्तिहां देखिए
अश्क छुप- छुप के रहने लगे
चमचमाती कनक बेड़ियाँ
’वीर’ हर एक पहने लगे
~~ महावीर ’वीर’
* पत्थर
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''समाप्‍त'''''''''''''''''''''''''''''''''


















गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह '18,प्रा0 27 से 29 जून हमारा मुक्‍तक --तक अध्‍यक्ष धीरज श्रीवास्‍तव

इस प्रकार कार्यक्रम अध्‍यक्ष धीरज श्रीवास्‍तव जी के भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -18 दिनांक 27 से 29 जनू 2014 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।


                     इस कार्यक्रम में क्रसम: आदरणीय कन्‍हैया तिवारी जी, आदरणीय कमलेश दिवेदी जी, आदरणीया मंजू शर्मा जी, आदरणीय महेश जैन ज्‍योति जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तव जी, आदरणीय लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीवाल जी, आदरणीया मंदाकनी गौरी जी, आदरणीया अन्‍नपूर्णा बाजपेयी जी, आदरणीय ओमप्रकाश नाटियाल जी, आदरणीय हीरा लाल प्रजापति जी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीया रमा वर्मा जीी, आरणीय पवन गोयल जी, आदरणीया सुमन जोशी दूबे जी, आदरणीय नारायण गौरव जी, आदरणीय गुरमीत सिहं गुनी जी, आदरणीय नागौरी गेटसे जी, आदरणीय नगेन्‍द्र सिह नीरव जी, अखंड गहमरी, आदरणीया रेखा जोशी जी ,आदरणीया पारूल गुप्‍ता जी,  आदरणीया कान्‍ती शुक्‍ला जी, आदरणीय उद्धव देवली  जी, आदरणीय सतीश कुमार मिश्रा जी, आदरणीय कैलास भारदवाज जी, आदरणीय रजनीश तपन जी, आदरणीय महावीर सिहं जी , आदरणीय कवि सतीश मधुप जी एवं आदणी प्रियंका पांडे जी की रचनाये प्रस्‍तुत हुई जिसके आप सभी का आभार एवं हम आशा करते है कि आप भविष्‍य में ही इस प्रकार का दुलार एवं स्‍नेह बनाये रखेगें।।

इस कार्यक्रम में प्रथम स्‍थान पर ----आदरणीय कन्‍हैया तिवारी जी
दिवतीय स्‍थान पर आदरणीय -------कमेलश दिवेदी जी
एवं प्रतिक्रिया में ---------------------उदूधत देवल जी रहे सभी को हार्दिक बधाई

कार्यक्रम में शामिल रचनाए
मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
शज़र जब तक रहा तब तक परिँदा दर नही भूला,
उड़ानेँ थीँ भले ऊँची मगर वो दर नही भूला।
हमेशा कामयाबी की बुलंदी चूमता है वो,
जो माँ के पाक़ क़दमो मेँ झुकाना सर नही भूला।
"कन्हैया तिवारी"

मुक्तक-27जून 2014
विषय-मां
अध्यक्ष -श्री धीरज श्रीवास्तव
-----------------------------
जब से बेटे से बिछडी वो खाना-पीना भूल गई.
ऐसा लगता है जैसे माँ जीवन जीना भूल गई.
बेटे के बेटे की खातिर कितने कपडे सी डाले,
खुद का दामन तार-तार था उसको सीना भूल गई.
डाॅ.कमलेश द्विवेददी,मो.09415474674

Manju Sharma
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि---
बूढ़े चेहरे पे छायी हर झुर्री , कहती है अनगिनत कहानियाँ
जवानी के गुजारे हर पल , जिसने सुनाने में जिन्हें लोरियाँ
अड़चन लगने लगती वही , जो भगवान का प्रतिरूप इस जहाँ में
व्यस्त हो जाते उसी माँ को भूल ,भोगने दुनिया की मस्तियाँ
--- मँजु शर्मा --- २९-०६-२०१४

साहित्यकारों की धरती- गहमर
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
हमारा मुक्तक -- 27 जून 2014 से 29 जून 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि ।
..............
गौरैया सी सदाँ घरों में चहका करती ,
हरपल उर में प्रेम अग्नि सी दहका
करती ,
गोदी में बैकुण्ठ नेह को तरसें सुरगण ,
माँ के आँचल में ही ममता महका करती ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।

*मुक्तक- 27 जून 2014,
शीर्षक - माँ, अम्मा,माता जननी आदि।
आदरणीय अखंडगहमरी जी तथा अन्य विद्वानोँ के समक्ष सादर प्रस्तुत*
**--**--**--**--**--**
रोज गगन से मेरे खातिर चाँद उतारा अम्मा ने!
सिर था मेरा टेढ़ा मेढ़ा बहुत सँवारा अम्मा ने!
पाँवोँ की मैँ रज चूमूँ सौ बार लगाऊँ माथे पर,
और ऋणी हूँ जन्म जन्म जो मुझे दुलारा अम्मा ने!
रचना - धीरज श्रीवास्तव।
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
मुक्तक (विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि.)
माता पन्ना धाय ने पाला वीर प्रताप,
दुश्मन लोहा मानते पाकर के संताप |
पाकर के संताप दुश्मन पन्ना को कोसे
माँ वसुधा को चाहिए ऐसे वीरों के खाप
|
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक (27 से 29 जून तक )
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव को समर्पित
विषय--- माँ/जननी/माता/माँई
सारे दुःख सहती है माँ ।
नहीं कष्ट कहती है माँ ।।
इसीलिये हर पल मेरे ;
दिल में ही रहती है माँ ।।
---मंदाकिनी गौरी


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि..\
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
*****************************
जाने कितने सपने सजाती वो
दिनो दिन फिर उन्हे संवारती वो
मन मे न कोई चाहत वो रखती
प्यारी माँ ,सबको संभालती वो ॥.
.................अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु'


हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित ।
-
घर माँ से मंदिर था , जब तक उनका साया था,-
था सब से अपनापन , नहीं कोई पराया था,
तब माँ गई बैकुण्ठ , स्नेह रिश्ते सब छोड के
हुई मुद्दत जब इस घर , कोई अपना आया था !
-
मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित ।
====================================
बहुत बुरा हो फिर भी उसको बहुत भला ही कहती है ॥
अपना गंदा बच्चा भी माँ दूध धुला ही कहती है ॥
नहलाते-नहलाते अपने कौए से बच्चे को माँ ,
हंस कभी कहती तो कभी लक-दक बगुला ही कहती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक *
अध्यक्ष -श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर
विषय -माँ
*मुक्तक *
माँ जीवन का सार है
ममता और दुलार है
माँ के ही आशीष से
होता बेड़ा पार है
(लव कुमार 'प्रणय')


मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
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माँ है सब वेदों का सार
जिसके चरणों में संसार
स्नेह का जल बरसाती वो
और लुटाती अपना प्यार
~रमा वर्मा~

मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
जो किरदार में दिखे वो तहजीब होती है,
पूरी हुई मन्नत सी जो खुल जाये यूं ही वो नसीब होती है...
बहती है रगों में लहू बनकर देती है सांस प्राण वायु सी
दूर रहकर भी 'मां' मेरे करीब होती है........
(पवन गोयल)
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
जीती जाये दूजो के सपनें खुद के कोई ख्वाब न माँगे
करती जाएं काम सदा ,न पूछे प्रश्न और जवाब न माँगे
जिससे जिन्दा है दुनिया मे ख़ुशियां ,रौनक और जज्बात
उसे माँ कहती है दुनिया,जो अपनी रहमतो का कभी हिसाब न माँगे
सुषमा दुबे
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक-27 से 29 जून 2014
आदरणीय अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तवजी को समर्पित ।
विषय-माँ/अम्मा/माता/जननी ।
हर काल, हर हाल में जिसकी एक सी कथनी और करनी है।
जिसके आँचल की नाव से पार लगती जीवन वैतरणी है ।
वह केवल एक, सिर्फ नेक, मनुष्यों की जाति में सर्वश्रेष्ठ,
माँ, माता, अम्मा, जीवन को जन्म देने वाली जननी है ।
-नारायण गौरव ।

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक
शीर्षक --- माँ
इतना लिपटकर रोया माँ से , मेरे आंसू मोती बन गए
माँ के थप्पड़ जैसे , मेरी आँखों की ज्योति बन गए
जिसने रुलाया माँ को असीमित गमो में दर बदर
खूबसूरत कपडे भी उनके , फटी पुरानी धोती बन गए
‪#‎गुनी‬ ...
गोपाल राम गहमरी समारोह 18
हमारा मुक्तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
उँगली पकड़ के चलना सीखाती माँ,
सिर्फ तू ही निस्वार्थ प्यार निभाती माँ...
हर रूप मे अच्छी लगती ‘ दोस्त ’
अम्मा, मम्मी, मैया, बिजी, माती माँ...
- कल्पेश ... ' दोस्त '...
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह ==18
हमारा मुक्तक
अध्यक्ष .....धीरज श्री वास्तव जी
विषय ........माँ /जननी /माता
वो फ़कीर हो जाता जग में जिसने माँ को खोया
लावारिस हो कर दुनिया में फूट- फूट वह रोया
माँ का आंचल जिसके सिर से जीवन में हट जाए
दुःख विषाद में नहीं अन्य जो उसका सर सहलाये
.................................गांधी (डीडवाना)

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18
हमारा मुक्तक -27 जून 2014 से 29 जून2014
अध्यक्ष--आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी
विषय --माँ,माई, माता, जननी
दुख में जीकर खुशी वह लुटाती रही ;
पाठ सदा प्रेम का ही,,,,,, पढाती रही ;
रिश्ते कैसे निभाएॅ,,,,,,,,, जगत में यहाँ ?
बेटी को माँ सदा यह,,,,,,,, बताती रही ।।

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी एवं समस्‍त सुधि जन की सेवा में
कहोगें क्‍या उसे तुम तो सताये उम्र भर हो
न दे ही तुम सके रोटी रुलाये उम्र भर हो
बड़े ही प्‍यार से पाला हमें आशा न कोई
कहो क्‍यों माँ को दाई तुम बताये उम्र भर हो
अखंड गहमरी

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-18
हमारा मुक्तक (27 से 29 जून तक )
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव को समर्पित
विषय--- माँ/जननी/माता/माँई
पूत चमके जैसा दिनकर माँ का अरमान
आकाश को छू ले उड़कर माँ का अरमान
अपने बालकों में माँ की बसती है जान
दे आशीष स्नेह भरकर माँ का अरमान
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
*********************************************
माँ को अपनी हम सब आँखों में बसाते हैं
देख कर कष्ट उसका आँसू भी बहाते हैं
धरती माँ जग जननी है समस्त प्राणियों की
क्यूँ फिर उसको रौंदते हम,हर पल जाते हैं
-------------पारुल'पंखुरी'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह - १८ के अन्तर्गत
हमारा मुक्तक
शीर्षक - माँ
अध्यक्ष -सम्मान्य धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
ममता की साकार है प़तिमा ।
माँ की अन्य नहीं है उपमा ।
स्वर्ग-लोक आँचल में बसता -
अवर्णनीय माँ की है महिमा ।
कान्ति शुक्ला
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 18
हमारा मुक्‍तक -- 27 जून 2014 से 29 जनू 2014
अध्‍यक्ष -- आदरणीय धीरज श्रीवास्‍तवा जी को सादर समर्पित ।
विषय --माँ,माई,अम्मा,माता जननी आदि
.
ममता. प्रेम, नेह, अनुराग की जो अतुल्य एवं अवर्णनीय प्रतिमूर्ति है,
संतान कैसी भी, उससे प्यार करना माँ की सहज नैसर्गिक प्रवृति है।
जहाँ तक जाती मेरी यह दृष्टि है, मुझे तो सर्वत्र बस दीखती है माँ
अहर्निश वंदना तेरी वो मेरी माँ, हर पल सच्चे हृदय से तेरी स्तुति है ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई/ 27.06.2014
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -१८,
हमारा मुक्तक-२७ जून से २९ जून २०१४,
समारोह प्रमुख-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी|
बिषय-माँ/माई/अम्मा/माता /जननी/आदि|
==============================
पिता गये बैकुंठ तो माँ ही को हमनें देखा,
रोटी-कपड़ों के लिए भटकनें को हमनें देखा,
हमसे वह कभी न कहती अपनी पीड़ा को,
पर हम रोते तो, माँ के रोनें को हमनें देखा ||
उद्धव देवली /२७-६-२०१४|

अपना मुक्तक =२७.६.१४तो २९.६.१४
शीर्षक =माँ /अम्मा /जननी/एवं पर्यायवाची
बहर(मापनी )=2122 २१२२ २१२२ २१२२
विधा -मुक्तक
आ .परमपूज्य श्री धीरज श्रीवास्तवा जी को समर्पित a
आप करुणा सिंधु हैं माँ ,प्रेम मुझसे कीजिये अब
भावनाओ का मृदुल अब ,भाव सबमे दीजियें अब
मनुजता की पीर से हों ,दिल हमारा मर्माहत
विनय सुत की आज तुम ,स्वाविकार कर लीजिये अब
सुरेश कुमार उत्स

गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
हमारा मुक्तक 27 जून से29 जून
शीर्षक माँ/जननी/पर्यायवाची
समारोह अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव  के समक्ष प्रस्तुत एक रचना।
******
करूं आकाश को कागज़ लिखाई जा नही सकती
महिमा उस की इतनी है बताई जा नही सकती
हम अपनी चाम की जूती बनाकर भी अगर दे दें
तो माँ के दूध की कीमत चुकाई जा नही सकती
~~
"कैलाश भारद्वाज"
फरीदाबाद (हरि.)


राम गोपाल गहमरी साहित्य समारोह=18
हमारा मुक्तक
अध्यक्ष श्री धीरज श्रीवास्तव जी ।
शीर्षक =माँ ,माता,माई आदि
<> ¤ <> ¤ <> ¤ <> ¤ <>
कितना सारा दर्द सहा अभी तक मेरी माई ने।
बिल्कुल भी आराम दिया न उसकी फटी बिवाई ने ।
हम लोगोँ की चिन्ता मे,रात दिन उलझी रहती है।
नाम मात्र का खाना खाती,रोती है तन्हाई मे।


गोपाल राम गहमरी समारोह18
हमारा मुक्तक 27 जून से 29 जून तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
मेरा इस मंच पर प्रथम प्रयास आप सब सरस्वती- पुत्रों के समक्ष समीक्षा हेतु प्रस्तुत है:
_______मुक्तक
मन का सारा मैल सहज ही, कुछ पल में धो लेता हूँ
दुनियाँदारी को बिसरा कर, बचपन में हो लेता हूँ
जब मेरा ईश्वर से बातें, करने का मन होता है
जननी की तस्वीर उठाकर, जी भर के रो लेता हूँ
~~ महावीर 'वीर' २७.०६.२०१४

गोपाल राम गहमरी समारोह18
हमारा मुक्तक 27 जून से 29 जून तक
विषय:-माँ /माता/माई /अम्मा /जननी
अध्यक्ष :-आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को समर्पित
कष्ट घनेरे हों पर माँ की,थपकी से सो जाते हैं।
माँ मीठी लोरी गा दे तो,सपनों में खो जाते हैं ।
पूजन,अर्चन,भजन,प्रार्थना,इनकी भला जरूरत क्या?
माँ कहते ही देव स्वर्ग के,नतमस्तक हो जाते हैं ।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)

मुक्तक-27जून 2014
विषय-माँ,माई,अम्मा,माता जननी
अध्यक्ष आदरणीय श्री धीरज श्रीवास्तव जी को सादर समर्पित
मां वो है जो गल्तियां मुस्कुरा के भुला देती है
बचा के जमाने से हमें आंचल में छुपा लेती है
कडी धूप सा तपता है वक्त जब भी कभी
दुआओं का अपनी हम पर साया सा कर देती है
-----प्रियंका

---------------------------------------------------आप सभी रचनाकारों का पुन: अभिनंन्‍दन-------समाप्‍त----------------

Sunday, 29 June 2014

गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह-17 प्रारम्‍भ 22 जनू से 23 जून 2014 अध्‍यक्ष कान्‍ती शुक्‍ला हमारा रविवार

 कार्यक्रम अध्‍यक्षा कान्‍ती शुक्‍ला जी भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17 दिनांक 22 से 23 जनू 2014 का दूसरा  चरण हमारा रविवार  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।

रचनाकारों के नाम क्रमस:  आदरणीया शुभदा बाजपेयी जी, आदरणीय कवि मधुप जी , अखंड गहमरी  आदरणीय सुरेश मिश्रा, आदरणीया Mahesh Jainjyoti आदरणीय लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीयवााल जी , आदरणीय लव कुमार प्रणय जी आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।

गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह -17 के हमारा रविवार के  विजेता आदरण्‍ीय सुरेश मिश्रा उत्‍साही जी
  एवं गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारेाह हमारा रविवार के आगामी अध्‍यक्ष  सुरेश मिश्रा उत्‍साही जी होगें



Shubhda Bajpai
गोपाल दास गहमरी साहित्य समारोह --१७ के दुसरे चरण के अंतर्गत एक ग़ज़ल
ग़ज़ल ---
काफिया-- आते --
--रदीफ़--नहीं हैं

मात्रा भार --२१२२/२१२२/२१२२/

बिन बुलाये हम कहीं जाते नहीं हैं
यूँ किसी के ख्वाब में आते नहीं हैं
कौन करता है यहाँ दिल से मुहब्बत
कोई नगमें प्यार के गाते नहीं है
कौन कहता है कि रहते मौन पत्थर
बात अपने दिल की कह पाते नहीं हैं
आइना सच बोलता यह तय मगर क्यों
जानते हैं फिर भी घबराते नहीं हैं
दोस्ती का यह चलन देखो न 'शुभदा'
जुल्म भी ढाते हैं शर्माते नहीं हैं
शुभदा बाजपेयी-----२२---६---२०१४

-----------------------------------------------------------------------------------
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 17 के द्वितीय चरण के अंतर्गत ।हमारा रविवार ।
समारोह अध्यक्षा आदरणीय कान्ती शुक्ला जी व् साहित्य संरक्षक आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित ।
मापनी एवं शिल्प:-
1222 1222 1222 1222
काफिया:-आला,रदीफ़ :-तो गया होता
ग़ज़ल
गुनाहों से भरा प्रस्ताव,टाला तो गया होता ।
उसूलों को सही साँचे में,ढाला तो गया होता ।
हमारे 'आज' 'कल' दोनों,सुहाने हो गये होते,
विरासत को सलीके से,सँभाला तो गया होता।
पनप पाते नहीं ये साँप,अपनी आस्तीनों में,
अगर कुछ नेवलों को प्यार से,पाला गया होता ।
समन्दर पार करती बार,होती हार दुश्मन की,
मिसाइल को तरीके से उछाला तो गया होता।
हजारों मोतियों के ढेर,लग जाते किनारे पर,
समन्दर और अन्दर तक,खँगाला तो गया होता।
'मधुप' को और फूलों को,चुभन बिल्कुल नही लगती,
कभी काँटों को बगिया से,निकाला तो गया होता ।

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17
अध्‍यक्षा आदरणीया कान्‍ती शुक्‍ला जी को समिर्पत
विघा ' तरही गजल
काफिया - अना
रदीफ - है
बहर
2122 2122 2122
मत कहो आकाश में कुहरा धना है
जाल धुमते बादलो ने बस बुना है
धूप की चादर अभी फैली फिजा में
चाँदनी को चाँद से मिलना मना है
भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे
दे गवाही आज वो तेरा अना है
फूल भी रोने लगे तब से चमन में
रौद देगा माली ही जब से सुना है
नींद भी तब से नहीं आती किसी को
आदमी शैतान ही जब से बना है
आज ये सुन शर्म खुद रोने लगा क्‍यों
औरतो ने राह पर बच्‍चा जना है
अखंड गहमरी एडमिन रचना

Sureshkumar Mishra
रविवार से सोमवार की रचना
विधा गीत ====
मापनी ===२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत ---अल रहा
आ.कांति शुक्ला जी को समर्पित
===============================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
अब हसी हैं कहाँ देश के वासियों
गॉँव के साथियों राज की दासियों
इस धरा धाम को तो सभी छल रहा
यह किसी आँख में अब नहीं खलरहा
=========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
===========================
वृछ सुरछित नहीं औ शिखर भी नहीं
पोखरे भी नहीं वह लहर भी नहीं
खेत -खलिहान में है लपट ही लपट
कारखानो -घरो में हैं कपट ही कपट
फिल्म औ संस्कृत में जहर घुल रहा
देश तो अब पतन की तरफ चल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
=========================
जल रही शाम की वो सभी वादियाँ
लोभियों से सभी टूटती शादियाँ
जिस्म पूरे वतन का झुलसने लगा
यह जहर नस -रगो में सुलगने लगा
आज माँ के वतन का जिगर गल रहा
कौन है जो यहाँ पर नहीं छल रहा
==========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा
============================
देश भी अब कसम दे रहा आज हैं
रावणो का सुनो अब यहाँ राज हैं
जन्म देती तम्हें माँ इसी के लिए
धन्य तो हैं वहीं देश हित में जियें
वक्त जीवन मरण का अभी चल रहा
सो रहे हो इधर हिम शिखर गल रहा
========================
हम ख़ुशी अब नहीं देश हैं जल रहा
हर जगह इन दिनों अब यही चल रहा

श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -17 द्वितीय चरण ।
अध्यक्षः सम्मान्य कान्ति शुक्ला जी ।
प्रस्तुति-घनाक्षरी छंद ।
परिचय छंद-
मात्रिकः- 47 मात्रायें । रगण 212 व
जगण 121की 5क्रमागत आवृतियाँ ।
अंत में गुरु 2 । यति 16-15पर ।
वर्णिक = 31वर्ण ,16 व 15 पर
यती ।
अंत में गुरु 2 ।
प्रस्तुत छंद का पदान्त- आन लो ।
----------
* राजदंड *
राजदंड थाम के न
ढील दीजिये जनाब ,
खींच राज अश्व की
लगाम आप तान लो ।
खींचते लगाम अश्व
दौड के चला सदैव ,
चाल एक बार ठीक
हो तुरन्त ठान लो ।
जान लीजिये कि तंत्र
आपको मिला खराब ,
काम ठोक पीट के
बिना चले न जान लो ।
है गुहार दंड के बिना
न प्रीत जन्म लेत ,
सत्य बात ज्योति की
हुजूर आप मान लो ।
****
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्‍तगर्त
अध्‍यक्षा-- आदरण्‍ीय कान्‍ती शुक्‍ला जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
विधा - चौपई छंद
शिल्प विधान - चौपई 15 मात्राओं के चार चरणों का सम मात्रिक छंद है.
इसके चरण का अंत गुरु-लघु से होता है (ध्यान रहे यह चौपाई छंद से भिन्न है जो १६ मात्राओं का होता है)
तुकांत - प्रस्तुत छंद में तुकांत -आर,आस,आम,आन,आथ,आह,ओड,ओट,आल एवं एश है
झाड़ू अभी लगानी शेष(चौपई छंद)
======================
समझौते का हो आधार, तभी चले साझा सरकार
इक दूजे पर करे न वार, आत्म बल ही रहे आधार |
जनता का पाने विश्वास, सब दल करते रहे प्रयास
जनता के हो सारे काम, यही मांग जनता की आम |
माँ वसुधा पर जो कुर्बान, उस नेता की हो पहचान |
वंशवाद की छोड़े तान, लोक तंत्र की रखना आन
खिले कमल को लेकर हाथ, पाट दिए जनता ने पाथ
जनता में दिखता उत्साह, नेताजी को मिलती राह |
गाँठ लगाकर लेते जोड़, पर आपस में करते होड़
अन्दर खाने देते चोट, इक दूजे का तोड़े वोट |
सबका जब मिलता है साथ, तभी सुगम होता है पाथ
जनता का जीते विश्वास, उस नेता से करते आस |
हाथ ने किया नहीं कमाल, हाथी हाल हुआ बेहाल
बदले नेताजी ने भेष, झाड़ू अभी लगानी शेष |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17 के दूसरे चरण के अन्‍तगर्त
*हमारा रविवार*
अध्‍यक्षा-- आदरणीय श्रीमती कान्‍ती शुक्‍ला जी को सादर
(प्रिय भाई अखंड गहमरी जी को
सप्रेम समर्पित )
शिल्प विधान =
मापनी =212 1222 212 1222
काफिया =इये
*गजल *
जून के दिनों को तुम, मायका दिवस कहिये
सूनसान इस घर में ,नायिका के बिन रहिये
याद के झरोखे से, मीत को निहारो तुम
वेदना विरह की अब, जाग- जाग कर सहिये
लौट कर चली आओ, जिन्दगी अकेली है
प्रेम एक गाड़ी है, आप हम हैं दो पहिये
आप बिन रहें कैसे, प्यास अब सहें कैसे
मीत पास भी आओ, दूर -दूर मत रहिये
रात है अमावस -सी ,दिन 'प्रणय' अषाढों से
जेठ - सी दुपहरी है, धूप में खड़े दहिये
लव कुमार 'प्रणय'


सभी रचनाकारोंं का विनम्र स्‍वागत 

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह '17,प्रारम्‍भ 20 जून से 22 जून हमारा मुक्‍तक --तक अध्‍यक्ष कुदंन उपाध्‍याय

कार्यक्रम अध्‍यक्ष कुुदन उपाध्‍याय जी के भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17 दिनांक 20 से 23 जनू 2014 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।

रचनाकारों के नाम क्रमस:  ओम प्रकाश नाटीयवाल जी, कवि‍ सतीश मधुप जी, कुदन उपाध्‍याय जी, कांति शुक्‍ला, रजनीश तपन जी ,कल्‍ैाश चंन्‍द्र जी, अखंड गहमरी जी,सतीश वर्मा जी, लव कुमार प्रणय जी,महेश जैन ज्‍योति जी, अभीषेक जैन जी,डाक्‍टर मुकेश कुमार जी,  नारायण गौरव जी, सुरेश मिश्रा जी,करन एस पी जी, उदय देवल जी   आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
प्रथम विजेता
ओम प्रकाश नौटियाल जी
दिद्वतीय --- कवि सतीश मधुप जी
प्रतिक्रिया ''''सतीश वर्मा जी

आप सब विजेताओं को हार्दिक बधाई
Om Prakash Nautiyal
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -17
*हमारा मुक्तक *
अध्यक्षः सम्मान्य श्री कुन्दन उपाध्याय जी
शीर्षकः कमल//पंकज/नीरज /कंज
-
जन्मे स्वर्ण पलने में, ना दीन हीन प्यारा हैं ,
प्रकृति ने घमंड पर उनके एक तंज मारा है ,
जिस कीच को करता ना कोई देखना गवारा
वही पर पल्लवित होता सुंदर कंज न्यारा है !
-
-ओंम प्रकाश नौटियाल

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह 17
शीर्षक:-कमल /पंकज/जलज /वारिज आदि
अध्यक्ष:-आदरणीय कुंदन उपाध्याय जी को समर्पित
हमारा मुक्तक
वायु तत्व विसराओगे तो,सांस न वापस आनी है ।
अग्नि तत्व विसराओगे तो,आभा ही खो जानी है।
धरा गगन विसराओगे तो,आप अधर में लटकोगे,
जीवन जलज सूख जाएगा,अगर न जड़ में पानी है।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)


श्री गोपल राम गहमरी साहित्य समारोह~
शुक्रवार 20जून प्रात: 10 बजे से 22 जून प्रात:10 बजे तक~ हमारा मुक्तक ।
शीर्षक~ कमल , पंकज ,नीर ,शतलज आदि पर्यायवाची ।
परम आदरणीय श्री ओम नीरव जी एवं श्री अंखड गहमरी जी तथा गुणीजनों को सादर समर्पित~
(अतिथि रचना )
जो कमल सरीखा हो जग में, वो जीवन आदर्शित होता है।
खिलता है कमल का फूल जहाँ, किचड में सुशोभित होता है।
किचड में जमाता धाक सदा,किचड को स्वर्ग बनाता है।
रुप रंग आभा मण्डल से जन मन आकर्षित होता है॥

श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह
२० जून प़ात: १० बजे से २२ जून प़ात:१०बजे तक-हमारा मुक्तक
शीर्षक-कमल /नीरज/पंकज/कंज/समानार्थी
अध्यक्ष- श्री कुन्दन उपाध्याय जी को सादर समर्पित
व्योम को प्यास की ही विकलता सदा ।
दर्द के तार छू मन मचलता सदा ।
कंज खिलता हृदय का प़णय-रश्मि पा -
ओस-कण बन के सपना भी पलता सदा ।
कान्ति शुक्ला

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह
< हमारा मुक्तक>
कार्य क्रम अध्यक्ष आदरणीय कुंदन उपाध्याय जी
शीर्षक~पंकज,नीरज,कमल आदि।***
दिखते हो सुंदर,कमल कह दिया।
सूरत दिखी तो,ग़जल कह दिया।
बरसो न बरसो, मर्जी तुम्हारी ।
शायर ने तुमको,सजल कह दिया।

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-17
*हमारा मुक्तक*
समारोह अध्यक्ष -आदरणीय कुंदन उपाध्याय जी के समक्ष प्रस्तुत
शीर्षक- कमल/पंकज/समानार्थी
मात्रा भार 1222 1222 1222 1222
**********
किसी ने भाव को समझा, किसी ने राग को देखा
किसी ने रौशनी देखी, किसी ने आग को देखा
नजर का भेद है कोई कमल देखे है कीचड़ में
किसी ने चाँद को देखा किसी ने दाग को देखा ******
कैलाश भारद्वाज
फरीदाबाद (हरि.)

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह 17
शीर्षक:-कमल /पंकज/जलज /वारिज आदि
अध्यक्ष:-आदरणीय कुंदन उपाध्याय जी को समर्पित
हमारा मुक्तक
बातें नेता की अब करना छोड़ाे यारो
उनके वादो से अब तुम मुँह मोड़ो यारो
जल में कमल तो बागो में गुलाब खिला है
केवल पूजा हेतु इन्हें तुम तोड़ो यारो

शुक्रवार प्रात: 20 जुन प्रात: 10 बजे से 22 जुन प्रात: 10 बजे तक हमारा मुक्तक |
विषय----कमल,नीरज,पंकज,जलज, शतदल,वारिज,कंज आदि पर्यायवाची।
कार्यक्रम अध्य क्ष आदरणीय कुंदन उपाध्यावय जी को सादर समर्पित |
( साथ ह़ी अन्य प्रबुद्ध मित्रों के अवलोकनार्थ , प्रतिक्रिया आमंत्रण के संग )
विषय ( शीर्षक ) : कमल / पंकज |
तुम कहाँ जन्में और रहते हो कहाँ, इसका तनिक भी अर्थ नहीं |
कीचड़ में जन्में , पंकज सरीख खिले, इस दुनिया में समर्थ वही |
जल की बूंदों से लिप्त रहे, पर आसक्ति से ये सदा निर्लिप्त रहे |
कमल से सीखो जीने की कला ताकि जीवन जाये कभी व्यर्थ नहीं |
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -17
*हमारा मुक्तक *
अध्यक्षः सम्मान्य श्री कुन्दन उपाध्याय जी
शीर्षकः कमल//पंकज/नीरज ...
(अतिथि रचना )
नाम बदल कर मेरा मुझसे कहता है अब काम नहीं
भेदभाव की भाषा पढ़ता मन में उसके राम नहीं
जीवन की सच्चाई है यह कीचड़ में ही कमल खिले
प्रेम लुटाओ प्रेम मिलेगा इसका कोई दाम नहीं
लव कुमार 'प्रणय '


श्री गोपालराम गहमरी साहित्य
समारोह -17 ।
(20 से 22 जून )
अध्यक्षः सम्मान्य श्री कुन्दन उपाध्याय जी ।
शीर्षकः कमल/जलज/पंकज/आदि ।
-------------
*अतिथि रचना *
------------
खिल गया लो कमल भारती के अँगन ,
गंध से आज गमका हुआ है गगन ,
सूर्य की रश्मियों में नया ओज है ,
हैं सभी देशवासी हृदय में मगन ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।

गोपल गहमर साहित्य-17
विषय-कमल पंकज
आद.कुदन जी से इजाजत
कीचड मे खिलके भी दिलो,पे राज होता है,
फूलो के राजा के सर पे,काटो का ताज होता,है
देके ही होती है मोहब्बत,की शुरूवात
प्यार का इसी से
आगज होता है

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-17
"हमारा मुक्तक" / विषय- कमल व पर्याय
आदरणीय श्री कुंदन उपाध्याय जी को सादर समर्पित !
प्रेम सही माईने में परिभाषित हो.
प्रमाणिकता हृदय से सत्यापित हो.
एक भ्रमर जो रात्रि भर बेचैन रहा,
व्याकुलता ये पुष्प कमल को ज्ञापित हो.
अर्क़ान-
फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा.
--------मुकेश कुमार "राज"

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-17
आदरणीय अध्यक्ष श्री कुंदन उपाध्याय जी को समर्पित ।
विषय-कमल ।
किसी को कुछ दिया नही, बदले में मिलेगा क्यों ?
सही नीयत से किया नही, पुण्य फिर फलेगा क्यों ?
इच्छित फल की प्राप्ति हेतु सत्कर्म आवश्यक है,
कली गर लगाई नही, कमल उम्मीद का खिलेगा क्यों ?
-नारायण गौरव ।
२० जून से २२ जून तक हमारा मुक्तक
शीर्षक =कमल /कंज
विधा -मुक्तक
बहर=२१२ २१२ २१२ २१२
आ .श्री कुंदन उपाध्याय जी को समर्पित
जन्म तुमको मिला, अब मुस्कराइए
गत वर्ष जो जिये ,सोच हरषाइये
कंज जैसा हमेशा ,महकते रहो
हर दिलों पर ,मधुर गीत बरषाइये
सुरेश कुमार उत्साही
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 17
बिषय- कमल/ अम्बुज/ कंज/ सरोज/ आदि पर्यायवाची।
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समारोह अध्यक्ष सम्मान्य कुंदन उपाध्याय जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
यह तन भी तो कीचड रूपी, जिसमें क्यों बसता है मनोज।
क्षण दूर करो इसको मन से, पालो मानवता का सरोज।
जीवन के इस पंच तत्व मे, गर खिल जाये चेतन अम्बुज।
तो समझो सृजित हुआ तन मे, नैतिकता का अनुपम सरोज।
ँँँँँ

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१७ |
हमारा मुक्तक |
समारोह प्रमुख-आदरणीय कुंदन उपाध्याय जी |
शीर्षक-कमल/नीरज/पंकज/शतदल/वारिज/कंज/आदि |
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अच्छाई सभी ढूंडते नीरज में,
पर कमल उदास रहते मन में ,
एक कमल की किस्मत कीचड ,
व दूजा ब्रह्म कमल बीरानें में ||
नोट:-ब्रह्म कमल ५००० मीटर की ऊँचाई से ऊपर पहाड़ों पर उगनें वाला पुष्प है ,इसे अति पवित्र माना जाता है|

आप सब सभी रचाकारों को मंच की तरफ से हार्दिक श्‍ुाभ कामना आपका जीवन स्‍वस्‍थ एवं भविष्‍य उज्‍जवल हो


गोपाल राम गहमरी साहित्‍यसमारोह -16 प्रारम्‍भ दिनांक 15 जून से 16 जून अध्‍यक्ष गुरूवर लव कुमार प्रणय जी

अध्‍यक्ष गुरूवर लव कुमार प्रणय जी के भागीरथी प्रयास से  गोपाल राम गहमरी साहित्‍यसमारोह -16 दिनांक 15 से 16 जनू 2014 का दूसरा चरण हमारा रविवार  पूर्ण हुआ। हम समस्‍त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्‍त रचनाकारों एवं अध्‍यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके  स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिये प्रार्थना करतें है।

इस समारोह की विजेता आदरणीया --श्रीमती कान्ति शुक्ला जी है जो गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -17 में हमारा रविवार की अध्‍यक्षा होगी

रचनाकारों के नाम क्रमस: आदरणीया कैलाशचन्‍द्रा, आदरणीया  कान्‍ती शुक्‍ला जी( विजेता एवं समारोह ' 17 की अध्‍यक्षा) आदरणीय सुरेश उत्‍साही जी, आदरणीय रजनीश तपन जी , आदरणीया रमा वर्मा जी, अखंड गहमरी, आदरणीय लव कुमार प्रणय जी, आदरणीय करन एस पी जी, आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।

Kanti Shukla
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१६
हमारा रविवार में- गीत / ग़ज़ल /छंद /दोहा /संपूर्ण परिचय के साथ
विधा -गीत
मापनी स्थायी-२१२२ २१२२ २१२
मापनी अंतरा- २१२२ २१२२ २१२२ ( आदरणीय लव कुमार 'प़णय' जी को सादर समर्पित )
तुकांत विधान -स्थायी -अता रहा
अंतरा १-अर अंतरा २-आकर अंतरा ३-अर
प़ीत का सपना मदिर छलता रहा ।
आस का दीपक मगर जलता रहा ।
रिक्त अंजलि भाव की मेंहदी लगा कर
सित महावर याद की पायल बजा कर
साध करके सांस का सम्बन्ध चूनर
दामिनी सी पीर कंपित आह भर-भर
आँख का काजल बिलख बहता रहा ।
प़ाण का पंछी मगर उड़ता रहा ।
मांग में रंगीन कुमकुम को लगा कर
नेह का विश्वास बिंदिया में बसा कर
कल्पना के कक्ष में खुद को सुला कर
वेदना के सत्य को मन से भुला कर
प्यार का बंधन व्यथा सहता रहा ।
अनमना कंगन मगर बजता रहा ।
रेत के घर में विछौना डाल कर
कामना के मोह सा मन का कलेवर
भावना के कोष का संस्पर्श देकर
टीसता सा प़ीत का अनुबंध दुस्तर
चाँदनी के पंथ पर चलता रहा ।
द्वार की आहट मगर सुनता रहा ।
कान्ति शुक्ला
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सुरेश कुमार उत्साही

अपना रविवार =में एक गीत
अध्यक्ष्य -परम पूज्य श्री लव कुमार प्रणय जी
के चरणो में समर्पित -यह गीत
बहर=२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत -अके लिए
एक कोशिश
जिंदगी के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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शांति होती नहीं ये कभी इन्द्रियाँ
चाट जाती सभी भोग सामग्रियाँ
ये न थकती कभी सौ बरस हम जिए
... कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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लाडले पुत्र हैं लाड़ली पुत्रियाँ
हम करें माँग पूरी मिटे दूरियाँ
क्यों बने आज कोल्हू उन्हीं के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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एक दिन सब यहीं तो रहेगा धरा
साँस का सिलसिला तो रहेगा भरा
फूँक देंगे जिए है आप जिनके लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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यह मनुज जन्म क्या इसलिए है मिला
भोग औ वासना का चले सिलसिला
तुम विचारे कभी एक क्षण के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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आज भी तो कई चाहते प्यार को
माँगते आपकी स्नेह की धार को
क्यों नहीं नीर की बूँद मेरे लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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दींन को आपका यदि सहारा मिले
डूबते को तनिक भी किनारा मिले
चल समय दान दें अब भजन के लिए
कर रहा हैं मनुज पाप किसके लिए
जिंदगी है सखे चार दिन के लिए
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सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
अहमदाबाद
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रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)

जरा सा ख्वाव देकर वो,नीद मेरी चुराते हैँ।
बड़ा आसान है आना,बड़ी मुश्किल से जाते हैँ।
मुझे बदनाम करती हैँ,मेरी अब पाँव की ठिठकन।
सुबह पीते हैँ आँखोँ से,शाम तक लड़खड़ाते हैँ।
अगर भौँरा बना हूँ मै,तो इसमे दोष उनका है।
फूल खिलते हैँ अधरोँ पर,नजर से चूम आते हैँ।
अभी ऊबा हुआ हूँ मै,गुजरती शाम बोझिल है।
हवा चलती है आँधी सी,दीप फिर भी जलाता हूँ।
जिँदगी ये मेरी अब तो,तुम्हारे दीद की प्यासी।
आइना पोछकर देखूँ,नजर फिर भी न आते है।
तपन की आरज़ू भी,अब बड़ी बेकार लगती है।
ख्वाहिश मे तुम्हारी ही,हमेशा छटपटाते हैँ।
रजनीश तपन
उज्जवल कार्नर-नईमुल्लाह शाह मार्केट-डुमरियागंज
जनपद-सिद्धार्थ नगर(उ॰प्र॰)
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गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्‍द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
ग़ज़ल
बहर - १२२२ / १२२२ / १२२२ / १२२२
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हुआ इक शोर सा दिल में लगा जैसे कि तुम आये
निखरने मैं लगी ऐसे कि जैसे फूल खिल जाये
दिखाये ख्वाब जो तुमने हुये हैं आज वो पूरे
जिधर देखूं उधर दिखते मुझे बस प्यार के साये
नजारे गुनगुनाते हैं फिजाएं मुस्कुराती है
बहारें झूम कर आये चमन में फूल बिखराये
हुआ किसका असर मुझपर न मुझको चैन आये अब
मिरे ख़्वाबों खयालों को न जाने कौन महकाये
हमारी है नहीं फितरत बगावत क्या करें किससे
दगाबाजी किसी ने की उसे हम सह नहीं पाये......
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~ रमा वर्मा
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गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्‍द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय लव कुमार 'प्रणय' जी को सादर समर्पित
एंव गुरूवर आदरणीय ओम नीरव जी को समर्पित
विधा ' गजल
काफिया ---आती
रदीफ---भी नहीं है
बहर - 1222 1222 1222 122
हमारे प्‍यार को वो अब निभाती भी नहीं है
जलाये क्‍यों हमारा दिल बताती भी नहीं है
लिखा जो गीत उसने वेवफाई पे हमारी
कभी वह गीत हमको तो सुनाती भी नहीं है
बनाया था महल मैनें कभी उनके लिये जो
पड़ा है आज भी सूना जलाती भी नहीं है
बड़े अरमान थे उनसे सजाये जिन्‍दगी में
मगर उनको कभी अब वो सजाती भी नहीं है
करें किससे शिकायत जिन्‍दगी की हम बताओ
कभी भी प्‍यार से मुझको बुलाती भी नहीं है
अखंड गहमरी एडमिन रचना गुरूजनो एवं अग्रज मित्रो के सुझाव एंव मार्गदर्शन हेतु

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गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह- 16
हमारा रविवार में ---गीत/गजल/छन्‍द/देाहा/ चौपाई/
आदरणीय भाई अखंड गहमरी जी को सादर
**गजल **
(शिल्प विधान -मापनी = 2122 2122 212 22
फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन फैलुन
रदीफ़ --नहीं आँसू
काफिया --अते )
अब हमारी आँख से रुकते नहीं आँसू
रिस रहे ये घाव अब भरते नहीं आँसू
क्यों उठाते हो कसम झूठे जमाने की
इस तरह धोखा कभी करते नहीं आँसू
दर्द से रिश्ता निभाते जा रहे हैं हम
इस लिए नम आँख के मरते नहीं आँसू
है बहुत अंगार का मौसम बहारों में
फूल बनकर अब यहाँ झरते नहीं आँसू
जो अँधेरों से उजाले छीन कर लाते
उन सहारों से 'प्रणय' डरते नहीं आँसू
(लव कुमार 'प्रणय' )
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गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 16
समय- रविवार सुबह 10 बजे से सोमवार सुबह 10 बजे के अन्तर गत
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विधा - गीत
शिल्प विधान- मुखडे तथा अंतरे सहित सभी पूरक पंक्तियों की मापनी-
221, 2122 , 221, 2122 के क्रम मे
तीसरे बंद मे मुखडे की पूरक पंक्ति मे मात्रा पतन का लाभ लिया गया है।
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त- आ रहे हैं।
अन्तरोँ का तुकान्त-
1- आह मे मिले थे।
2- अकर।
3- अडे हैं
समारोह अध्यक्ष आदरणीय लव कुमार प्रणय जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँँँ
वो मीत शाम हर पल, बस याद आ रहे हैं।
क्षण ग्रीष्म तपन बनकर , तन को जला रहे हैं।
बन दर्शिका मुझे वो, हर राह मे मिले थे।
मन्दिर व मस्जिदों में, दरगाह मे मिले थे।
अब कब्र पास आकर, दीपक जला रहे हैं।
वो मीत....(1)
ये कंटकीय पथ है, चलना जरा ठहरकर।
खल खार चुभ न जायें, इस प्यार को जकडकर।
हर शूल को छिपा कर, चाहत दिखा रहे हैं।
वो मीत.....(2)
बन दामनीय आशिक , पगदान मे पडे हैं।
कर कंगनी खनक में, गलहार मे जडे हैं।
संग आँचली कफन के, सबको जला रहे हैं।
वो मीत....(3)
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करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
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