इस प्रकार
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -18 दिनांक 29 से 30 जनू 2014 का दूसरा
चरण हमारा रविवार पूर्ण हुआ। हम समस्त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ
से समस्त रचनाकारों एवं अध्यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप
सबके स्वस्थ जीवन एवं उज्ज्वल भविष्य के लिये प्रार्थना करतें है।
रचनाकारों के नाम क्रमस: रजनीश तपन जी, आदरणीया रमा वर्मा, आदरणीय कवि मधुप जी , आदरणीय करण एस पी जी, अखंड गहमरी, आदरणीय सतीश वर्मा जी, आदरणीया कान्ती शुक्ला जी, आदरणीय आकाश महेशपुरी जी, सुरेश कुमार मिश्रा जी , आदरणीय कन्हैया तिवारी जी, आदरणीय महावी सिहं जी, आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह -18 के हमारा रविवार के विजेता आदरणीय रजनीश तपन जी
एवं गोपाल राम गहमरी साहित्य समारेाह 19 हमारा रविवार के आगामी अध्यक्ष भी रजनीश तपन जी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह=18
दूसरा चरण,हमारा रविवार
विधा= गीत
शिल्प विधान~
मुखड़े तथा प्रत्येक पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार-16 -16
मुखड़े का तुकांत-आल न पूछो।
अंतरो का तुकांत क्रमशः निम्न है
1-अता है,2-अला करूँगा,3-आरी,4-आया
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी के सम्मुख सादर प्रस्तुत~
(कहीँ कहीँ मात्रा पतन संभव)
<=> <=> <=> <=>
मन का मेरे हाल न पूछो।
मँहगी रोटी दाल न पूछो।
*
एक कमायी ,क्या निभता है?
वस्त्र फटे हैँ,तन दिखता है।
फीस कहाँ से दे पाता मै,
पढ़े न बेटा,मन दुखता है।
सिकुड़ रही है,खाल न पूछो।
मन का मेरे....
**
कितनी मेहनत भला करूँगा।
राह कठिन है,चला करूँगा।
अपनी भी कुछ इच्छा होती,
कब तक सब मे ढला करूँगा?
ठहर गयी है चाल न पूछो।
मन का मेरे....
***
बढ़ी जा रही जिम्मेदारी ।
करे न कोई हिस्सेदारी।
मै करता सब अपने मन से,
सभी समझते,है लाचारी।
तम का गहरा जाल न पूछो।
मन का मेरे.....
****
कभी सुखी होगी ये काया।
नही दर्श मे होगी माया।
क्योँ अपनी जागीर बनायेँ।
इस तृष्णा ने खूब भगाया।
अवसादित वो काल न पूछो।
मन का मेरे.....
मँहगी रोटी...,
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18रचनाकारों के नाम क्रमस: रजनीश तपन जी, आदरणीया रमा वर्मा, आदरणीय कवि मधुप जी , आदरणीय करण एस पी जी, अखंड गहमरी, आदरणीय सतीश वर्मा जी, आदरणीया कान्ती शुक्ला जी, आदरणीय आकाश महेशपुरी जी, सुरेश कुमार मिश्रा जी , आदरणीय कन्हैया तिवारी जी, आदरणीय महावी सिहं जी, आप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गोपाल राम गहमर साहित्य समारोह -18 के हमारा रविवार के विजेता आदरणीय रजनीश तपन जी
एवं गोपाल राम गहमरी साहित्य समारेाह 19 हमारा रविवार के आगामी अध्यक्ष भी रजनीश तपन जी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह=18
दूसरा चरण,हमारा रविवार
विधा= गीत
शिल्प विधान~
मुखड़े तथा प्रत्येक पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार-16 -16
मुखड़े का तुकांत-आल न पूछो।
अंतरो का तुकांत क्रमशः निम्न है
1-अता है,2-अला करूँगा,3-आरी,4-आया
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी के सम्मुख सादर प्रस्तुत~
(कहीँ कहीँ मात्रा पतन संभव)
<=> <=> <=> <=>
मन का मेरे हाल न पूछो।
मँहगी रोटी दाल न पूछो।
*
एक कमायी ,क्या निभता है?
वस्त्र फटे हैँ,तन दिखता है।
फीस कहाँ से दे पाता मै,
पढ़े न बेटा,मन दुखता है।
सिकुड़ रही है,खाल न पूछो।
मन का मेरे....
**
कितनी मेहनत भला करूँगा।
राह कठिन है,चला करूँगा।
अपनी भी कुछ इच्छा होती,
कब तक सब मे ढला करूँगा?
ठहर गयी है चाल न पूछो।
मन का मेरे....
***
बढ़ी जा रही जिम्मेदारी ।
करे न कोई हिस्सेदारी।
मै करता सब अपने मन से,
सभी समझते,है लाचारी।
तम का गहरा जाल न पूछो।
मन का मेरे.....
****
कभी सुखी होगी ये काया।
नही दर्श मे होगी माया।
क्योँ अपनी जागीर बनायेँ।
इस तृष्णा ने खूब भगाया।
अवसादित वो काल न पूछो।
मन का मेरे.....
मँहगी रोटी...,
द्वारा-रजनीश तपन
डुमरियागंज-सिद्धार्थनगर
उत्तर प्रदेश
डुमरियागंज-सिद्धार्थनगर
उत्तर प्रदेश
Rama Verma
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
ग़ज़ल
रदीफ़ :-कहाँ है,काफिया :-अत
अरकान:-122 122 122 122
*************************************
बची इस जहां में शराफत कहाँ है
खुदा इस जमीं पर इबादत कहाँ है
सहारा न देखा दुआएं न देखी
दिलो में किसी के मुहब्बत कहाँ है
शमां जल रही है निगाहें झुकाये
तिमिर की किसीको जरूरत कहाँ है
न अम्बर झुका था न धरती झुकी थी
मगर बीच इनके शिकायत कहाँ है
जरा झांक भी लो नजर में हमारी
मुहब्बत भरी है तिजारत कहाँ है
अजी बात कर लो निगाहें न फेरो
कि अब दुश्मनी में अदावत कहाँ है....
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 18
दूसरा चरण हमारा रविवार,अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
ग़ज़ल
रदीफ़ :-पड़ेगा ,काफिया :-आना
अरकान:-122 122 122 122
दिलो में किसी के मुहब्बत कहाँ है
शमां जल रही है निगाहें झुकाये
तिमिर की किसीको जरूरत कहाँ है
न अम्बर झुका था न धरती झुकी थी
मगर बीच इनके शिकायत कहाँ है
जरा झांक भी लो नजर में हमारी
मुहब्बत भरी है तिजारत कहाँ है
अजी बात कर लो निगाहें न फेरो
कि अब दुश्मनी में अदावत कहाँ है....
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 18
दूसरा चरण हमारा रविवार,अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
ग़ज़ल
रदीफ़ :-पड़ेगा ,काफिया :-आना
अरकान:-122 122 122 122
हजारों ग़मों को उठाना पड़ेगा ।
सदा कष्ट में मुस्कराना पड़ेगा ।
गमों में सदा याद आते हैं ईश्वर,
गमों को गले से लगाना पड़ेगा ।
अगर हर तरफ चाहते हो उजाला,
नया एक सूरज उगाना पड़ेगा ।
भले हो अहिंसक मगर याद रखना,
कि दुश्मन पे गोला चलाना पड़ेगा ।
अगर सर झुकाया नहीं है खुदा को,
हर इक दर पे सर को झुकाना पड़ेगा।
ग़ज़ल गर कहेगा 'मधुप' तो उसे भी,
अदब की नदी में नहाना पड़ेगा ।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
शिल्प विधान-मुखडे सहित सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरों की पंक्तियोँ का मात्राभार-16/16
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त-आल लिए
अंतरो का तुकान्त-
1-ऊर हुआ था
2-आम दिया
3-आरी
ँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्र सादर समर्पित
ँ
ठहर ठहर कर चलता सूरज,दुखडो का जंजाल लिए।
मम्मी पापा किसे पुकारे,बेटा खडा कुदाल लिए।
शूल चुभा था उस दिन तन मे,रक्त चाप भी दूर हुआ था।
जिस दिन बेटा बृद्ध आश्रमों,छोड बाप को शूर हुआ था।
कर्म फर्ज को यहीं दफन कर,चला मूढ कंकाल लिए।
बचपन की उँगली के बदले,मिली वेदना भाल लिए।
ठहर...(1)
जिनकी ममता की ज्योति पुंज,धन मान प्रतिष्ठा नाम दिया।
उनकी राहोँ मे कंटक बो,हर अंग अग्नि सम घाम दिया।
विचलित हृदयों की आभा से,फूटा शब्द गुलाल लिए।
तुमको जीवन की राहों मे,पुष्प मिले जयमाल लिए।
ठहर...(2)
ऐसा जीवन भी जीना क्या,जिसमे होँ कर्म दुराचारी।
पैसा रखकर सर पर सोयें,माँ बाप बने हों भीखारी।
ऐसे पूत कुपूतों का विश्वास खडा विकराल लिए।
देखो दर दर आज खडे है,ऐसे पुत्र मलाल लिए।
ठहर...(3)
ँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी एवं आप सब सुधि जनो की सेवा में
विधा - गजल
रदीफ़ -है सितम देखो
काफिया -आते
अरकान - 1222 1222 1222 1222
सदा कष्ट में मुस्कराना पड़ेगा ।
गमों में सदा याद आते हैं ईश्वर,
गमों को गले से लगाना पड़ेगा ।
अगर हर तरफ चाहते हो उजाला,
नया एक सूरज उगाना पड़ेगा ।
भले हो अहिंसक मगर याद रखना,
कि दुश्मन पे गोला चलाना पड़ेगा ।
अगर सर झुकाया नहीं है खुदा को,
हर इक दर पे सर को झुकाना पड़ेगा।
ग़ज़ल गर कहेगा 'मधुप' तो उसे भी,
अदब की नदी में नहाना पड़ेगा ।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
शिल्प विधान-मुखडे सहित सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरों की पंक्तियोँ का मात्राभार-16/16
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त-आल लिए
अंतरो का तुकान्त-
1-ऊर हुआ था
2-आम दिया
3-आरी
ँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय सुरेश कुमार मिश्र सादर समर्पित
ँ
ठहर ठहर कर चलता सूरज,दुखडो का जंजाल लिए।
मम्मी पापा किसे पुकारे,बेटा खडा कुदाल लिए।
शूल चुभा था उस दिन तन मे,रक्त चाप भी दूर हुआ था।
जिस दिन बेटा बृद्ध आश्रमों,छोड बाप को शूर हुआ था।
कर्म फर्ज को यहीं दफन कर,चला मूढ कंकाल लिए।
बचपन की उँगली के बदले,मिली वेदना भाल लिए।
ठहर...(1)
जिनकी ममता की ज्योति पुंज,धन मान प्रतिष्ठा नाम दिया।
उनकी राहोँ मे कंटक बो,हर अंग अग्नि सम घाम दिया।
विचलित हृदयों की आभा से,फूटा शब्द गुलाल लिए।
तुमको जीवन की राहों मे,पुष्प मिले जयमाल लिए।
ठहर...(2)
ऐसा जीवन भी जीना क्या,जिसमे होँ कर्म दुराचारी।
पैसा रखकर सर पर सोयें,माँ बाप बने हों भीखारी।
ऐसे पूत कुपूतों का विश्वास खडा विकराल लिए।
देखो दर दर आज खडे है,ऐसे पुत्र मलाल लिए।
ठहर...(3)
ँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी एवं आप सब सुधि जनो की सेवा में
विधा - गजल
रदीफ़ -है सितम देखो
काफिया -आते
अरकान - 1222 1222 1222 1222
हमें वो वेवफा कह कर बुलाते है सितम देखो
चुरा कर नीद रातो की सताते है सितम देखो
कभी मै देखता भी तो नहीं था जाम के प्याले
कमस दे कर मुझे अपनी पिलाते है सितम देखो
बडे अरमान से जिसने बनाया आशिया मेरा
वही उस आशिया को अब जलाते है सितम देखो
न रूठे वो कभी हमसे हमारे साथ चलते थे
मगर अब साथ गैरो का निभाते है सितम देखो
खुले जो लब कभी जिनके हमारा नाम ही निकले
न जाने क्यो वही हमको भुलाते है सितम देखो
अखंड गहमरी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
( अन्य प्रबुद्ध प्रियजनों के अवलोकनार्थ, प्रतिक्रिया आमंत्रण के संग )
श्रृंगार रस , वियोग भाव , स्थायी रति , आवलम्बन नायिका नायक ,
लाटा अनुप्रास , उपमेय – नायक , उपमान स्वाति बूंद , निशा आदि ।
मात्रायें : मुखडा में प्रथम पंक्ति 17 , द्वितीय में 18 । हर छंद के
अंतिम दो पंक्तियों में यही क्रम । प्रथम छंद की चार पंक्तियों ,
हर पंक्ति में 18 , 18 मात्रायें , द्वितीय और तृतीय छंदों में
हर पंक्ति में 16 -16 मात्रायें ) |
शीर्षक : काश तुम मुझसे दूर न होते ।
आप्यायित हो मलय गुनगुनाता,
राका स्मिति फुहारें बरसाती,
प्रीत का गागर अंक में भर कर
मैं उन्मादित नागिन बन जाती ।
बीन प्यार का अधर में रख कर
प्रीतम जब तुम उसे बजाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
कंचन सी काया मुरझाई,
क्लांत दृग आंसू भर भर के,
खुली पलकों से व्योम निहारे,
प्रिय मिलन की तीव्र लहर से ।
मैं बन जाती चातक आकुल,
स्वाति बूँद तुम बन कर आते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
तारक पुष्प वेणी में चमके,
चंद्र ज्योत्सना सी दहके तरुणाई,
नीलगगन का घूंघट ओढ़े,
वधु वेश में निशा शरमाई ।
मैं बन जाती छाया उसकी,
सिंदूर से तुम मांग भर जाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
: सतीश वर्मा
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -१८
दूसरा चरण हमारा रविवार २९ जून से ३० जून २०१४
अध्यक्ष -सम्मान्य सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
चुरा कर नीद रातो की सताते है सितम देखो
कभी मै देखता भी तो नहीं था जाम के प्याले
कमस दे कर मुझे अपनी पिलाते है सितम देखो
बडे अरमान से जिसने बनाया आशिया मेरा
वही उस आशिया को अब जलाते है सितम देखो
न रूठे वो कभी हमसे हमारे साथ चलते थे
मगर अब साथ गैरो का निभाते है सितम देखो
खुले जो लब कभी जिनके हमारा नाम ही निकले
न जाने क्यो वही हमको भुलाते है सितम देखो
अखंड गहमरी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित ।
( अन्य प्रबुद्ध प्रियजनों के अवलोकनार्थ, प्रतिक्रिया आमंत्रण के संग )
श्रृंगार रस , वियोग भाव , स्थायी रति , आवलम्बन नायिका नायक ,
लाटा अनुप्रास , उपमेय – नायक , उपमान स्वाति बूंद , निशा आदि ।
मात्रायें : मुखडा में प्रथम पंक्ति 17 , द्वितीय में 18 । हर छंद के
अंतिम दो पंक्तियों में यही क्रम । प्रथम छंद की चार पंक्तियों ,
हर पंक्ति में 18 , 18 मात्रायें , द्वितीय और तृतीय छंदों में
हर पंक्ति में 16 -16 मात्रायें ) |
शीर्षक : काश तुम मुझसे दूर न होते ।
आप्यायित हो मलय गुनगुनाता,
राका स्मिति फुहारें बरसाती,
प्रीत का गागर अंक में भर कर
मैं उन्मादित नागिन बन जाती ।
बीन प्यार का अधर में रख कर
प्रीतम जब तुम उसे बजाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
कंचन सी काया मुरझाई,
क्लांत दृग आंसू भर भर के,
खुली पलकों से व्योम निहारे,
प्रिय मिलन की तीव्र लहर से ।
मैं बन जाती चातक आकुल,
स्वाति बूँद तुम बन कर आते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
तारक पुष्प वेणी में चमके,
चंद्र ज्योत्सना सी दहके तरुणाई,
नीलगगन का घूंघट ओढ़े,
वधु वेश में निशा शरमाई ।
मैं बन जाती छाया उसकी,
सिंदूर से तुम मांग भर जाते ।
उनींदी नयनो के सपने,
काश तुम मुझसे दूर न होते ।
: सतीश वर्मा
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -१८
दूसरा चरण हमारा रविवार २९ जून से ३० जून २०१४
अध्यक्ष -सम्मान्य सुरेश कुमार मिश्रा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
रदीफ अधूरी
काफिया ई
मुझे ग़म की जुस्तजू है अभी है खुशी अधूरी ।
जब तक न अश्क़ छलकें रहती हँसी अधूरी ।
हैं खुश्क लब हमारे यूं तिश्नगी के मारे
जो चश्मे-मय न पाई रहे मयकशी अधूरी ।
यह इश्क है हकीकी हरदम सुरूर में है
पीकर जो होश आए रहे बेखुदी अधूरी ।
ऐसा मुकाम आए कोई फर्क रह न जाए
गर नाज़ है खुदी पर रहे बंदगी अधूरी ।
मैं हूँ ख्वाहिशों के सदके जो आज तक जवां हैं
मुझे तून मिल सका है रही जिंदगी अधूरी ।
कान्ति शुक्ला
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
मापनी-122, 122, 122, 12
मुखड़ा तुकान्त- आ लो जरा
अ.1-अम, अ.2-आना मिला,अ.3-अजा
॰॰॰
ज़माना नहीँ ढूँढ पाये हमेँ
हँसीँ गेसुओँ मेँ छुपा लो जरा
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
काफिया ई
मुझे ग़म की जुस्तजू है अभी है खुशी अधूरी ।
जब तक न अश्क़ छलकें रहती हँसी अधूरी ।
हैं खुश्क लब हमारे यूं तिश्नगी के मारे
जो चश्मे-मय न पाई रहे मयकशी अधूरी ।
यह इश्क है हकीकी हरदम सुरूर में है
पीकर जो होश आए रहे बेखुदी अधूरी ।
ऐसा मुकाम आए कोई फर्क रह न जाए
गर नाज़ है खुदी पर रहे बंदगी अधूरी ।
मैं हूँ ख्वाहिशों के सदके जो आज तक जवां हैं
मुझे तून मिल सका है रही जिंदगी अधूरी ।
कान्ति शुक्ला
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह-18
विधा- गीत
मापनी-122, 122, 122, 12
मुखड़ा तुकान्त- आ लो जरा
अ.1-अम, अ.2-आना मिला,अ.3-अजा
॰॰॰
ज़माना नहीँ ढूँढ पाये हमेँ
हँसीँ गेसुओँ मेँ छुपा लो जरा
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
चलो प्यार मेँ कुछ बढ़ाएँ कदम
न कोई यहाँ हम अकेले सनम
निगाहोँ मेँ डालो निगाहेँ सुनो
अलग ना रहो आ मिलोँ एकदम
न दूरी कभी अब रहे दर्मियाँ
मुझे धड़कनोँ मेँ बसा लो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
जो दिल मेँ तुम्हारे ठिकाना मिला
मुझे तो खुशी का खज़ाना मिला
मिली ये खुशी अब छुपाऊँ कहाँ
मिले तुम कि जैसे ज़माना मिला
नहीँ और सोचूँ कि तेरे सिवा
मैँ टूटा हुआ हूँ सम्हालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
फुहारोँ का आओ उठा लेँ मजा
भले ये ज़माना सुना दे सजा
नहीँ है हमेँ डर किसी का सनम
कि बाहोँ मेँ आके नहीँ तूँ लजा
ये दिन है सुहाना हमारे लिए
उमंगेँ जो दिल मेँ उछालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
गीतकार- आकाश महेशपुरी
Aakash maheshpuri
...
पता-
वकील कुशवाहा उर्फ आकाश महेशपुरी
ग्रा- महेशपुर,पो- कुबेरस्थान
जि- कुशीनगर,उत्तर प्रदेश
हमारा रविवार
अखंडग गहमरी साहित्य में
आप सब के समक्ष्य
एक गीत माँ पर
विधा गीत --माँ ===
मापनी -१२२ १२२ १२२ १२२
तुकांत -अन कर रहा हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
जब गेट खोलू तो खुलता नहीं हैं
इसे खोलने की जतन कर रहां हूँ
जीवन को अँधेरे में होम देकर
सुबह आज मैं तो हवन कर रहां हूँ
न कोई यहाँ हम अकेले सनम
निगाहोँ मेँ डालो निगाहेँ सुनो
अलग ना रहो आ मिलोँ एकदम
न दूरी कभी अब रहे दर्मियाँ
मुझे धड़कनोँ मेँ बसा लो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
जो दिल मेँ तुम्हारे ठिकाना मिला
मुझे तो खुशी का खज़ाना मिला
मिली ये खुशी अब छुपाऊँ कहाँ
मिले तुम कि जैसे ज़माना मिला
नहीँ और सोचूँ कि तेरे सिवा
मैँ टूटा हुआ हूँ सम्हालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
फुहारोँ का आओ उठा लेँ मजा
भले ये ज़माना सुना दे सजा
नहीँ है हमेँ डर किसी का सनम
कि बाहोँ मेँ आके नहीँ तूँ लजा
ये दिन है सुहाना हमारे लिए
उमंगेँ जो दिल मेँ उछालो जरा-
कि मौसम जवाँ मनचला आसमाँ
चलो इश्क मेँ भी नहा लो जरा
गीतकार- आकाश महेशपुरी
Aakash maheshpuri
...
पता-
वकील कुशवाहा उर्फ आकाश महेशपुरी
ग्रा- महेशपुर,पो- कुबेरस्थान
जि- कुशीनगर,उत्तर प्रदेश
हमारा रविवार
अखंडग गहमरी साहित्य में
आप सब के समक्ष्य
एक गीत माँ पर
विधा गीत --माँ ===
मापनी -१२२ १२२ १२२ १२२
तुकांत -अन कर रहा हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
जब गेट खोलू तो खुलता नहीं हैं
इसे खोलने की जतन कर रहां हूँ
जीवन को अँधेरे में होम देकर
सुबह आज मैं तो हवन कर रहां हूँ
माँ ध्यान तेरा भटकता हैं कैसे
तुम्हें रात दिन स्मरण कर रहां हूँ
तेरी दूरियों ने मुझे तोड़ डाला
नहीं हैं पता क्यों सहन कर रहां हूँ
अहसासो से भर गया हूँ लबालब
उस पग को मैं तो नमन कर रहां हूँ
सभीं की दुआ हैं तभी आज फिर से
सुबह शाम तो आचमन कर रहां हूँ
जब आशीष मुझको मिलेगा तेरा
इसी गीत से यह भजन कर रहां हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
विधा-ग़ज़ल
काफ़िया-आनी
रदीफ़-क्या लिखूँ
रुक़्न-2122 2122 212
तुम्हें रात दिन स्मरण कर रहां हूँ
तेरी दूरियों ने मुझे तोड़ डाला
नहीं हैं पता क्यों सहन कर रहां हूँ
अहसासो से भर गया हूँ लबालब
उस पग को मैं तो नमन कर रहां हूँ
सभीं की दुआ हैं तभी आज फिर से
सुबह शाम तो आचमन कर रहां हूँ
जब आशीष मुझको मिलेगा तेरा
इसी गीत से यह भजन कर रहां हूँ
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहां हूँ
तुम्हारी कथन माँ कहन कर रहां हूँ
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
विधा-ग़ज़ल
काफ़िया-आनी
रदीफ़-क्या लिखूँ
रुक़्न-2122 2122 212
ज़ुल्फ नागिन सी दिवानी क्या लिखूँ?
इश्क़ की झूठी कहानी क्या लिखूँ?
भूख मुफ़लिस की लिखूँ या ज़ुल्म को,
शाम ढ़लती है सुहानी क्या लिखूँ?
जो न खौले मुल्क़ के हालात पर,
उस लहू की मै रवानी क्या लिखूँ?
जब दिलोँ मेँ इंतिकामी आग हो,
प्यार को फिर आसमानी क्या लिखूँ?
दावतेँ दुश्मन की खाता रोज जो,
उसको अपना खानदानी क्या लिखूँ?
ख़ौफ़ का मंजर हुआ चारो तरफ़,
जिँदगी होती रुमानी क्या लिखूँ?
"कन्हैया" 9984637982
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
_____ ग़ज़ल
इश्क़ की झूठी कहानी क्या लिखूँ?
भूख मुफ़लिस की लिखूँ या ज़ुल्म को,
शाम ढ़लती है सुहानी क्या लिखूँ?
जो न खौले मुल्क़ के हालात पर,
उस लहू की मै रवानी क्या लिखूँ?
जब दिलोँ मेँ इंतिकामी आग हो,
प्यार को फिर आसमानी क्या लिखूँ?
दावतेँ दुश्मन की खाता रोज जो,
उसको अपना खानदानी क्या लिखूँ?
ख़ौफ़ का मंजर हुआ चारो तरफ़,
जिँदगी होती रुमानी क्या लिखूँ?
"कन्हैया" 9984637982
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 18
दूसरा चरण हमारा रविवार -- 29 जून 2014 से 30 जनू 2014
अध्यक्ष -- आदरणीय सुरेश कुमार मिश्रा जी
_____ ग़ज़ल
रदीफ़ -लगे
काफिया -अहने
अरकान - 212 212 212
घोर अपमान सहने लगे
आइने ....झूठ कहने लगे
आचरण की लचक देखिए
संग* के संग ....रहने लगे
जिन को पर्वत समझते रहे
वो हवाओं में बहने लगे
खौफ़ की इन्तिहां देखिए
अश्क छुप- छुप के रहने लगे
चमचमाती कनक बेड़ियाँ
’वीर’ हर एक पहने लगे
~~ महावीर ’वीर’
* पत्थर
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''समाप्त'''''''''''''''''''''''''''''''''
काफिया -अहने
अरकान - 212 212 212
घोर अपमान सहने लगे
आइने ....झूठ कहने लगे
आचरण की लचक देखिए
संग* के संग ....रहने लगे
जिन को पर्वत समझते रहे
वो हवाओं में बहने लगे
खौफ़ की इन्तिहां देखिए
अश्क छुप- छुप के रहने लगे
चमचमाती कनक बेड़ियाँ
’वीर’ हर एक पहने लगे
~~ महावीर ’वीर’
* पत्थर
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