Sunday, 20 July 2014

20 जुलाई 2014 रविवार हमारी जिन्‍दगी हमारी यादें का संकलन

अपनी यादे - मेरे जीवन की अविस्मर्णीय घटना
बात सन 1975 की है | अग्रवाल युवा संगठन के महासचिव के रूप में मेरे नेतृत्व में
बाजारों से एक जुलुस उस घर के बाहर प्रदर्शन कर रहा था जहाँ दहेज़ न मिलने पर एक नवयुवती की जहर दे हत्या करदी थी | दुसरे दिन राजस्थानपत्रिका व अन्य समाचार
पत्रों में हमारी जुलुस की फोटो सहित समाचार चर्चा का विषय बन गया | कुछ दिन बाद
मेरे ननिहाल के शादी समारोह में प्रीतिभोज में उस समय लागू सीमा से अधिक संख्या
में जीमण को रोकने पुलिस आयी | किसी ने छोटे भाई के पास दिल्ली में मेरे माँ-बाप को शिकायत की “तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण बाबू ने पुलिस भेज कर रंग में भंग किया है | शहर में दहेज विरोधी पोस्टर भी लक्ष्मण का नाम है |पुलिस भेजने की कार्यवाही में मेरा
हाथ न होने पर भी मुझ पर उंगलियाँ उठती रही जो मै भुलाए नहीं भूल पाता हूँ |
तसल्ली यहीहै कि दहेज़ के हत्यारे पति को सात साल की जेल हो गयी |

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

आत्म कथा सत्य पर आधारित।
मेरा नाम- विनय कुमार सिंह
मोबाईल न0- 9792497553
              मेरी जिंदगी सदा ही खट्टी मीठी यादों से भरी रही, मैंने कभी भी ओ नहीं पाया जो मैंने चाह या जिसके लिए प्रयास किया। बचपन से मुझे बहुत ही पढ़ने लिखने का शौक था परन्तु घर की माली हालत कुछ ऐसी रही की ये सपने भी अधूरे रह गए। बाल्य अवस्था से ही मुझे मन में उमड़ते शब्दों को कलम द्वारा कागज पे उतारने का जूनून था।
                 मै अपने ख्यालों को लिखकर रखने लगा। एक बार की बात है जब मै 10वी कक्षा में पढ़ता था , एक रोज मै पढाई करते समय एक डायरी में ऐसे ही हल्का गजल लिख रहा था जिनके शब्दों में थोड़ी गहरे थी उसी समय मेरे चाचा जी के एक मित्र आ गए मैंने झट से डायरी छुपा ली, चाचा जी के मित्र ने हमे डायरी छुपाते देख ली और हमसे डायरी मांग ली मै डर गया क्योंकि आज मेरी चोरी पकड़ी गयी थी मैंने डरते डरते डायरी उनको दे दी ओ बोल बोल के मेरे लिखे सब्दो को पढ़ने लगे और उनके द्वारा मेरा जम के उपहास किया जाने लगा इतने में मेरे चाचा जी भी आ गए तो उनके मित्र ने ओ डायरी उनको दिखाई और कहा की साहबजादे पढाई के आड़ में इश्कबाजी कर रहें है! चाचा जी ने मुझे बहुत फटकार लगाई और कहा की तुम पढाई लिखाई छोड़ दो और कोई कम करो साथ ही उन्होंने पत्र द्वारा पिताजी को भी बता दिया । तब मुझे लगा की मैंने अपने पिताजी का भी भरोसा खो दिया ओ इतनि मेहनत करके हमे पढ़ा रहे है और हम ये सब कर रहे है। तब से हमे दुबारा कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हुई बस भावनाए प्रति दिन मेरे अन्दर अंगड़ाई लेती थी पर दर जाता था। उसके बाद जब मै नौकरी करने लगा तब फिर लालसा जगी की अब खुलकर लिखे। फिर समस्या वही की मुझे पढ़ेगा कोन।
             इसके बाद मैंने एक परम मित्र की सलाह पर साहित्यकारों की धरती गहमर के माध्यम से जुड़ा जहाँ पर मुझे आप सभी महान बिभुतियों से सराहना मिली और सच पूछिए तो आज मुझे लगता है की पहली बार मै अपनी इक्षा से जीने की कोशिश कर रहा हूँ। इसके लिए इस साहित्यकारों की धरती गहमर पेज का मई मन से आभार ब्यक्त करना चाहूँगा।

अपनी यादे के तहत
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ये उस समय की बात हैं जब मैं १० साल की थी ,मैं अपने सहेलियों के साथ खेल रही थी कि मैंने देखा कि गुड़िया जो कि मेरे ही उम्र कि थी कल (चापाकल) पर पानी लेने के लिए आई |उसने कल को जोड़ से चलाकर हेंडल छोड़ दी नतीजा ये हुआ कि हेंडल सीधे उसके मुंह में लगा और उसका दाँत टूट गया |वो रोने लगी उसकी रोने कि आवाज सुनकर उसकी दादी आ गई उसका घर पास में ही था |उसकी दादी पुछि क्या हुआ क्यों रो रही हो |मैं खेलना छोड़कर दौड़ कर कल पर गई उसी कि गलती मैने भी दोहरा दी ताकि उसकी दादी समझ सके कि उसे चोट कैसे लगा |मेरा भी हाल वही हुआ जो गुड़िया का हुआ था मेरे भी दाँत टूट गया और मुंह से खून निकलने लगा |


'हमारी ज़िन्दगी , हमारी यादें' के अंतर्गत :
एक संस्मरण : एक रोचक प्रसंग :
ज़िंदगी में समस्याये आती ही रहती हैं । ज़िन्दगी हैं तो समस्यायें हैं. समस्यायें हैं, इसलिये ज़िन्दगी है। अपने पारिवारिक जीवन में भी समस्याओं का कई बार सामना करना पड़ता है, विशेषकर पत्नी भी यदा कदा समस्या का कारण बन जाती हमें है। हमारी विवेकशीलता इस पर है कि समस्या का समाधन हम कितनी और कैसी चतुरता से करते हैं ।
बात काफी पहले की है, मेरी नई नई शादी हुई थी । और जैसा शुरु में हर पति का स्वभाव होता है कि अपनी पत्नी को कुछ नये नये उपहार , ‘सरप्राइज गिफ्ट’ के नाम से दे कर उसे खुश करने का । ऐसी ही भावना से उत्प्रेरित होकर मैं ने भी इस तरह का उपहार श्रीमती जी को देना शुरु किया । मगर ये क्या , जब भी मैं ऐसा करता, वो उसका मूल्य पुछती और सही सही मूल्य बतलाने पर चिल्लाने सी लगती ‘ ठग गये न , पहले तो आपको कोई चीज पसंद करने आती नही , उस पर हमेशा ठग जाते हैं ।‘ मुझे उनकी ये बातें बहुत नागावार लगतीं । उनकी नाराज़गी से बचने के लिये एक नया रास्ता अपनाया मैं ने । जो भी तोहफा मैं लाता, उसका दाम बहुत कम करके उन्हें बतलाता, करीब करीब तीन चौथाई । फिर भी उनका वही रवैया रहता ‘ ठग गये न , मैं हमेशा कहती हूँ , अकेले शॉपिंग पर मत जाया करो । एक तो आपकी चीजें पसंद करने नहीं आती और उस पर से हमेशा ठग जाते हैं ।‘
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था , इस तरह की बातें सुन कर भी उपहार लाना जारी रखा और दाम हमेशा बहुत कम कर के बतलाता उन्हें, मगर श्रीमती जी का वही रवैया रहता । ऐसे ही उनका जन्मदिन था , मैं ने बड़े शौक से उनके लिये एक कीमती साड़ी खरीदी और बहुत प्यार के साथ उन्हें भेंट किया , 1000 रू. की साड़ी का दाम 500 रू. बतलाया। सोचा इस बार वह बहुत खुश होगीं और मेरी पसंद और खरीददारी को दाद देगीं वों, पर फिर भी हाय खुदा, उनकी वही वक्रोक्ति ‘ठग गये न, आपकी पसंद भी कितनी घटिया है, हर जगह ठग जाते हैं' सुनने को मिली ।
पर इस बार मैं भी तैयार था , मंद मंद मुस्कराते हुये कहा उंनसे ‘ डार्लिंग, तुम ठीक कहती, मेरी पसंद बहुत ही घटिया है और मैं हर जगह ठग जाता हूँ । आखिर तुम्हें भी तो मैं ने ही पसंद किया था।‘
इतना सुनते ही पत्नी जी के चेहरे का रंग उड़ गया, जो देखते ही बनता था । और वो दिन और आज का दिन श्रीमती से फिर कभी भी ऐसी बात सुनने को नहीं मिली कि ‘आपकी पसंद घटिया होती है या आप हर जगह ठग जाते हो ।‘ यह मेरे लिये एक बहुत ही तस्कीन की बात रही और है, एक बड़ी समस्या से मुक्ति।
घर के ही एक अन्य संस्मरण के साथ , अगले अंक में । धन्यवाद सुविज्ञ मित्रों को ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई / 20.07.2014

हमारी जिन्‍दगी हमारी यादें
यह बात 24 जून 1989 की है मेरे पिता जी जनपद देवरिया के पडरौना में तैनात थे। हम लोग वही से अपनी कार यू0पी0के0 4038 से पडरौना से अपनी मौसी की शादी में भाग लेने धरहरा मुँगेर जा रहे थे। हमारे साथ हमारी माता जी, दो भाई, मामा और वह मौसी जिनकी शादी थी और उनकी एक मित्र रूबी थी। हम लोग सुबह 6 बजे पडरौना से निकल कर 12 बजे गोपालगंज बिहार के पास पहुँचे थे उसी समय हम लोगो की कार खराब हो गयी हमारे मामा गोपालगंज बिहार से लाये मगर शा वह कार किसी तरह को गोपालगंज के अपने गैरेज में लाया मगर वह कार को पूरी तरह से ठीक करने में 2 दिन का समय मागा चूकि हम लोग शादी में जाना था सेा उसने कहा कि गोपलगंज शहर सहित पूरे बिहार के माहौल ठीक नहीं है आप लोगो को पूरी रात बिहार में यात्रा करनी है जो काफी कठिन होगा आप लोग वापस लौट जाये मैं 100 किलोमीटर तक जाने लायक कर देता हॅू। हम लोग वापस लौटने लगे मगर दुर्भाग्‍य देखीये जिस जगह में दिन में कार खराब हुई थी वही फिर खराब हो गयी रात के 9 बज रहे थे हम लोग परेशान उस समय हम लोगी गाडी में विवाह में देने हेतु 2 लाख नगद एवं लगभग 20 भर जेवर थे और अन्‍य सामान हम लोग परेशान हो गये अौरते रोने लगी, तब हम लोगो किसी तरह सडक के किनारे बसे गाँव में पहुँचे और मदद मॉंगी वह लोग तुरन्‍त बाहर निकले और गॉंव से एक किलोमीटर दूर सडक पर आये तथा सारा सामन निकल कर एक बैलगाडी पर लादे हम लोगो को बैठाया और खेतो के सहारे गोपालगंज स्‍टेशन चल दिये मौसम पूरी तहर खराब था आसमान में काले बादल अधेरी रात डरावना माहैाल मगर वह 10 की संख्‍या में हथियारो से लैस होकर चल रहे थे अभी हम आधे रास्‍ते पहुॅचे ही थे कि कुछ लूटेरो ने हमें घेर लिया मगर साथ चल रहे लोगो ने उनका मुकाबल किया जिसमें कुछ लोग घायल होगये हमारी आवाजे और चीखे सुन कर पास के गाँव के लोग निकल कर बाहर आये तब तक लूटेरे भाग गये थे, हम गाडी में घायलो को लाद कर गोपालगंज रेलवे आये वहा भी पूरी तरह सन्‍नाटा केवल एक दुकान झोपडी में खुली थी हम लोग भूख से व्‍याकुल थे, उसने हम लोगों को उस समय 30 रूपया प्‍लेट चावल दाल सब्‍जी बना कर खिलाया, खाने में पत्‍थरो का बोलबाला था मगर चंडाल पेट सब हजम करने को तैयार। रेलवे स्‍टेशन से पुलिस को सूचना दिया गया वही से घयलो केा अस्‍पताल और हम लोगो को एक पैसेजर ट्रेन से पडरौना भेजा गया। हम लोग सुबह 6 बजे 24 घंटे में जिन्‍दगी की एक खौफनाक सफर करके लौटे मगर हम लोगो का मन आज भी उन गोपाल गंज बिहार के लोगो के प्रति श्रधा से झुक जाता है।किस प्रकार उन्‍होने अपनी जान पर खेल कर हमें तथा हमारे सामानो को बचाया ओर सुरक्षित पहुँचा और उसके एवज में ईलाज तक के पैसे लेने से इन्‍कार कर दिये।
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर



॥अपनी यादें, अपनी जिन्दगी॥
------कहाँ है संवेदना ?------
गलती उन दोनों की नहीं थी कि उन्होने अपने स्कूटर से मेरी बच्ची को टक्कर मारी बल्कि गलती तो मेरी 7 साल की बच्ची की थी कि वह उन दो पढ़े-लिखे नौजवानों के स्कूटर से टकरा गई । मैने अपनी फूल सी नाजुक,
कोमल कली की इस धृष्टता के लिए उन दोनों के आगे हाथ जोड़ दिए, कहा कि-अपनी बिटिया की तरफ से मैं माफी माँगता हूँ,वह तो बेचारी बच्ची है, अभी रो भी रही है, उसकी वजह से आपको ब्रेक लगाना पड़ा, कीमती समय गंवाना पड़ा, उसके लिए मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। बस इतना सुनना था कि वे दोनों सीना फुलाकर, जयी मुस्कान लिए अपने स्कूटर पर चलते बने और मैं अपनी रोती लाडो को चुप कराने लगा, साथ ही मन ही मन
दुख भी मनाने लगा कि काश जाते-जाते, वे मुझसे एक बार पूछ लेते-भाईसाहब, बच्ची को ज्यादा चोट तो नही आयी ?


हमारी ज़िन्दगी हमारी यादें
उसकी शादी के बाद एक यादगार पत्र
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प्राण प्रिय...
आज काफी समय बाद ख़त लिख रहा हूँ। तुम्हारे नये पते के बारे में शहर के नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं जानता हूँ इसलिए इस उम्मीद से फेसबुक पर भेज रहा हूँ कि अगर भूल से भी तुम फेसबुक पर आओ तो शायद तुम्हें नज़र पड़ जाए। कल फिर कुछ पुरानी यादों को कुरेदने के लिए उसी जगह पहुँच गया जहाँ हम अक्सर मिला करते थे। कुछ 10 मिनट ही हुई होंगी मुझे उस चाय वाले भईया की दुकान पर बैठे हुए कि तुम्हारी प्रिय सहेली वहाँ पहुँच गई। अरे वही जो अक्सर गालिब के शहर जाती रहती है, उसने मुझे पहले कभी नही देखा था मगर आश्चर्य की बात है कि कल उसने आते ही मुझे मेरे नाम से पुकार कर पूँछा- ‘‘एन. एस. , अब क्यों आये हो तुम यहाँ....?’’
एक अन्जान लड़की ने मुझे ‘एन. एस.’ कह कर बुलाया ये बात मुझे बिल्कुल हज़म नहीं हुई और फिर मुझे भी पूँछना ही पड़ा कि वो कौन है और मुझे कैसे जानती है..? जैसे ही उसने अपना नाम बताया, मुझे सब कुछ याद आ गया। ये वही लड़की थी जिसके बारे में तुम अक्सर बात किया करती थीं। ये वही थी जिसे तुमने मेरे मुक्तक और मेरी कहानियाँ सुनाईं। इसी ने तो मेरी हर रचना को अद्भुत और सबसे अलग बताते हुए कई बार तुमसे कहा था कि मुझे भी तेरे ‘एन. एस.’ से मिलना है। कुछ ही महीने पहले की तो बात है, तुम्हारी ये सहेली मुझसे मिलने को ऐसे बेताब थी कि जैसे ये किसी फिल्म अभिनेता या भारतीय क्रिकेट टीम के किसी खिलाड़ी से मिलना चाहती हो। मगर कल का नज़ारा बिल्कुल अलग था, उसे मुझसे मिल कर कोई खुशी नहीं हुई बल्कि उसे बहुत दुःख हुआ। इतना दुःख कि उसकी आखें भर आईं... फिर उसने जाते-जाते मुझसे कहा- ‘‘न जाने क्यों मुझे यकीन था कि तुम अब भी हर सन्डे की शाम को इस रैस्टोरेंट में आते होगे, उससे मिलने नहीं, उसे ढूँढने....’’ इतना कह कर वो रोते हुए वहाँ से चली गई।
उसके जाने के बाद वो चाय वाले भईया और उनकी दुकान पर बैठ वो कुछ लोग जो शायद मुझे जानते थे मेरी ओर इस तरह हमदर्दी भरी नज़र से देखने लगे कि जैसे मानो उन्हें मालूम हुआ हो कि मैं कुछ ही दिनों में मरने वाला हूँ और वो चाह कर भी मेरी मदद न कर पा रहे हों।
तेरे बिन एक ग़म है जि़ंदगी में,
वो कुछ तो है जो कम है जि़ंदगी में.......
तुम्हारा ‘पागल’

अपनी यादे अपनी जिन्‍दगी
एक घटना जो कभी नहीं भूल सकती
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बात २००४ की है , जब मैं अपनी तीन साल की बेटी के साथ अकेले बिलासपुर से नागपुर आ रही थी | ट्रैन सुबह ४ बजे बिलासपुर से छूटती थी , पापा और भैया मुझे ट्रैन में बिठा कर चले गए थे | चूँकि मायके से ससुराल जा रही थी तो स्वाभाविक था कि मन बहुत भारी था, और समय भी सुबह का था तो पता ही नहीं चला कि कब नींद लग गई | करीब ८-९ बजे नींद खुली तो देखा कि मेरा सूटकेश गायब था | काफी ढूंढने पर भी नहीं मिला तो मैं परेशान हो गई | मुझे परेशानी से ढूंढते देख आस पास के यात्रियों ने भी पुरे डब्बे में तलाश करने में मेरी मदद करनी शुरू कर दी | मगर सूटकेश नहीं मिला | रो रोकर मेरा हाल बुरा हो रहा था| चाहते हुए भी मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी | आसपास के यात्रियों ने शिकायत दर्ज करने के लिए टी. सी. को बुलाया | टी.सी ने कहा कि पहले पूरी ट्रैन में तलाश करते है शायद मिल जाए | किसी तरह लोगों पर विश्वास करके मैंने अपनी बेटी को उनके पास छोड़ा और टी.सी. के साथ पूरी ट्रैन में तलाशी के लिए गई , मगर सब बेकार,,,चोरी की कम्प्लेन लिख ली गई | किसी से मोबाइल मांग कर घर पर चोरी की खबर की | दस घंटे का सफर काटना मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो गया था आज भी जब वो दिन याद आता है तो सिहर जाती हूँ | और भगवान से यही प्रार्थना करती हूँ कि ऐसी घटना किसी के साथ न घटे | पुलिस रिकॉर्ड में मेरे केश की फाइल शायद बंद हो गई हो पर मेरी स्मृति में वो फाइल आज भी खुल जाती है जब मैं ट्रैन में सवार होती हूँ | सफर तो आज भी ज्यादातर अकेली ही करती हूँ ,, मगर ट्रैन में सवार होते ही ये घटना आँखों के सामने ताजा हो जाती है और मेरी आँखे अपने सामान की निगरानी करने लगती है |
~रमा वर्मा~

Saturday, 19 July 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह 21 का दूसरा चरण हमारा मुक्‍तक दिनांक 18 से 20 जुलाई अध्‍यक्षा आदरणीय प्रियंका

इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह 21 का दूसरा चरण हमारा मुक्‍तक दिनांक 18 से 20 जुलाई अध्‍यक्षा आदरणीय प्रियंका पांडें जी के भागीरथी प्रयास से सम्‍मन हुआ। हम आप सब रचनाकारों एवं अतिथि यो का हार्दिक अभिनंन्‍दन करते है ।

इस समारोह में क्रमस आदरणीय रमा वर्मा जी, महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी, नारायण गौरव जी, रेखा जोशी जी,अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु, कान्‍ती शुक्‍ला जी, उमेश श्रीवास्‍तव जी,मीना मिश्रा जी, सुरेश मिश्रा जी, डा0 हीरा लाल प्रजापति जी, कुन्‍दन उपाध्‍याय, ओम प्रकाश नाटींवाल,विजय शंकर मिश्रा जी,आलोक मित्‍तल, कल्‍याणी झा आप सब का हार्दिक आभार हम आपके स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍जव भविष्‍य की कामना करते है। तथा आशा करते है कि आप सब का सहयोग मंच को हमेशा मित्‍ता रहेगा । 
 
इस समारोह में प्रथम स्‍थान आदरणीया--रमा वर्मा 
दूसरा स्‍थान आदरणीय --महेश चंन्‍द्र जैन ज्‍योति ने 
तथा बडे दुख के साथ कहना पड रहा है कि प्रतिक्रिया हेतु सम्‍मान उचित प्रतिक्रिया के आभाव में खाली रहा।

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
विषय----शिव, भोले, शंकर,
अध्‍यक्षा-----आदरणीया Priyanka Pandey जी को सादर समर्पित
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शिव के कर डमरू रहे, सोहे कंठ भुजंग 
बेल पत्र इनको चढे , और धतूरा भंग
मुक्ती के दाता कहे, इनको सब संसार
बसते हैं कैलाश पर, भस्म रमाये अंग

रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 21
अध्यक्षा-----आदरणीया प्रियंका पांडे
जी की प्रतिष्ठा में ।
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जटाओँ की लटाओँ में बसी है गंग
की धारा ,
उमापति नाथ भोले का गजानन आँख
का तारा ,
भाल पर चन्द्रमा दमके गले फुंकारता
विषधर ,
हमारे नाथ शंकर का बड़ा ही रूप है
प्यारा ।
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महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-21
हमारा मुक्तक-आदरणीय अध्यक्षा प्रियंका पांडे जी को समर्पित ।
विषय-महादेव/समानार्थी ।
महादेव ने अमृत नही, विषपान किया है ।
देव, दानव, मानवों को वरदान दिया है ।
प्रचंड आवेशित गंगा को धारण करके,
सृष्टि के लिए पवित्रता का संज्ञान लिया है ।

-नारायण गौरव ।
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
दूसरा चरण - हमारा मुक्‍तक
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्षा-----आदरणीया प्रियंका पांडे जी को सादर समर्पित
शंकर महादेव की शक्ति हो तुम
हम सब की यहाँ परम भक्ति हो तुम
दुनिया में सब ध्याय नाम तेरा
अर्धनारीश्वर महाशक्ति हो तुम
रेखा जोशी
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
दूसरा चरण - हमारा मुक्‍तक
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्षा-----आदरणीया प्रियंका पांडे जी को सादर समर्पित
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सती को कंधो पर उठाए घूमे शिव
प्रेम की पराकाष्ठा सिखाते घूमे शिव
यूं तो औघड़ दानी त्रिपुरारी कहलाते है
जगत की खातिर धुनि रमाए हुये शिव ॥
...........अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह - २१
दूसरा चरण
दि. १८ जुलाई प़ात: १० बजे से २० जुलाई प़ात: १० बजे तक
विषय - शिव/भोले/शंकर/शंभू/आदि प़चलित शिव जी के नाम
समारोह अध्यक्षा- आदरणीया प़ियंका पांडेय जी के प़ति
चन्द्र भाल मुंडमाल शिव त्रिपुंड धारी ।
गंगाधर व्योमकेश शंकर त्रिपुरारी ।
कर में डमरू त्रिशूल भोले भंडारी ।
नेत्र त्रय भुजंग कंठ शरण हूँ तिहारी ।
कान्ति शुक्ला

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 21
दूसरा चरण - हमारा मुक्तक
विषय - शिव, भोले, शंकर
अध्यक्षा - प्रियंका पाण्डेय जी के समक्ष प्रस्तुत
पद्मानुज-शशि मतवाला है
जो विष्णू का प्रिय साला है ।
साला ही समझ कर शिव जी ने
मस्तक पर उसे बिठाला है ।।
डा0 उमेश चन्द्र श्रीवास्तव
लखनऊ
Meena Mishra
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्षा-----आदरणीया पियंका पांडे जी के समक्ष एक मुक्तक
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जटा-जूट में गंग विराजें,माथे चन्द्र धराए ;
गौरा संग गोद गणेश,कंठ भुजंग लपटाए।
हिमशिला पे बाघंबर आसन,सेवा में नन्दी;
 लोक के स्वामी भोले,महादेव कहलाए।।मीना मिश्रा

Sureshkumar Mishra

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२१
दूसरा चरण हमारा मुक्तक
विषय -शिव ,भोले , शंकर
अध्‍यक्षा-----आदरणीया प्रियंका पांडे जी को समर्पित
मात्रा भार =१६ ,१६
आशुतोष सबके हितकारी ,जटाजूट में गंगाधारी
दर्शन जिनका मंगलकारी ,अपने भक्तो के दुखहारी
गणपति जिनके गॉद विराजें,कार्तिकेय कंधे पर साजे
वाम भाग में शैलकुमारी ,वीर भद्र करतें रखवारी
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६



गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
विषय - शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्ष - आदरणीया प्रियंका पांडे जीके समक्ष एक [ मुक्तक ]
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हे शिव जो जग में है अशिव तुरत निवार दो ॥
परिव्याप्त मलिन तत्व गंग से निखार दो ॥
स्वर्गिक बना दो पूर्वकाल सी धरा पुनः ,
या खोल अपना तीसरा नयन निहार दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह ~21
दूसरा चरण
हमारा मुक्तक~
दिनाँक ~18 जुलाई प्रात: 10 बजे से
20 जुलाई 10बजे तक
विषय~ शिव ,भोले ,शंकर ,भूत नाथ,शम्भू

अध्यक्षा~ आदरणीया प्रियंका पाण्डे जी के समक्ष सादर समर्पित~
है दिव्य तेज हर रुप निराला ,तांडव रुप धमक विकराला।
अमृत त्याग पिये विष प्याला,तप में लीन रहे मतवाला।
सावन में रुप श्रृंगार सजे,भक्तों में समर्पण भाव जगे।
भोले शंकर दीनदयाला,सृष्टि जगत का है रखवाला।
कुन्दन<जय हिन्द!
18.7,14

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्षा-----आ. प्रियंका पांडे जी के समक्ष प्रस्तुत !
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भक्तो की पुकार गूंजती, बम भोले भोले,
जरूरी है कि नेत्र आप अब तीसरा खोलें,
अत्याचार अनाचार सभी कुछ बढा बाबा
कर दें भस्म दुष्टों को चिरनिद्रा सभी सो लें!
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-ओंम प्रकाश नौटियाल



हे मानव कब तक तोड़ेगा नैतिकता
कब सुविचारों की लेगा प्राथमिकता
पापों का घड़ अब भर चूका है
शिव के त्रिनेत्रो से मृत्यु अग्न धधकता II
विजय शंकर मिश्रा

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्‍यक्षा-----आदरणीया पियंका पांडे जी के समक्ष एक मुक्तक
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किया विश्व का कल्याण
पिया विष को दिया दान
शिव शंकर जटा धारी
सदा भक्तो का रखते ध्यान
----"आलोक"---
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21
दूसरा चरण - हमारा मुक्‍तक
विषय----शिव, भोले, शंकर, सहित भगवान शिव के कोई प्रचलित नाम
अध्यक्षा-आदरणीया पियंका पांडे जी को सादर समर्पित
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देखो आया सावन का पावन महिना
गूंज उठा हर तरफ बाबा का तराना
भक्त सब मदमस्त हो गा झूम रहें हैं
कर रहे बाबा के महिमा का बखाना

"कल्याणी झा
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Friday, 18 July 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 21 शिल्‍प और शिल्‍प 17 से 18 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष गीता वर्मा जी

इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह संख्‍या -21 दिनांक 17 से 18 जुलाई   प्रथम चरण शिल्‍प और शिल्‍प अध्‍यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के भागीरथी प्रयास से सम्‍पन्‍न हुआ हम सभी रचनाकारों का आभार व्‍यक्‍त करते हुए आपके स्‍वस्‍थ जीवन एंव उज्‍जवल भविष्‍य की कामना करते है 

इस समारोह में - पुष्पेन्द्र यादव विनय कुमार सिंह "बालि"जी, आलोक मित्‍त जी, हितेश शर्मा जी,महेश जैन 'ज्योति' जी, रमा वर्मा जी, रजनीश तपन जी,नितिन सिकरवार पागल जी, कान्‍ती शुक्‍ला जी, प्रियंका पांडे जी,धीरज श्रीवास्‍तव जी, सुषमा जोशी दूबे जी, करण एस पी जी, सुनील कुमार जश्‍न जी, अखंड गहमरी ने हिस्‍सा लिया आप सब का पुन: हार्दिक आभार

इस समारोह के बिजेता आदरण्‍ीाय पुष्‍पेन्‍द्र यादव जी रहे 

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
विधा:- दोहा
शिल्प:- दोहा मात्रिक छंद है, जिसके प्रथम और
तृतीय चरण में 13-13 एवं द्वितीय
एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
- श्रावण मास, भगवान शिव और पावस ऋतु पर केन्द्रित कुछ दोहे प्रस्तुत हैं...
*************************
आशुतोष अवधूत शिव, हर-हर भोलेनाथ।
नीलकंठ मर्दन-मदन, बंदहुं पद धरि माथ।।
त्याग तपस्या साधना, शिव जीवन के मूल।
परहित विषपायी बने, चुने जगत के शूल।।

पावस की हर बूँद ज्यो, मेरे उर की पीर।
बंजारा बादल बना, मनवा हुआ अधीर।।
पिय के हिय की हे सखी, मैं जानूँ हर बात।
मन डरपत सुनि घनगरज, कठिन विरह की रात।।
रतनारे लोचन सजल, हृदय अनकही पीर।
बिन प्रियतम लू सम लगे, शीतल मंद समीर।।
- पुष्पेन्द्र यादव

Vinay Kumar Singh
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण- शिल्प/शिल्पी
विद्या- गीत/गजल
मापनी-1222,1222,1222,...........
काफिया- 'आना'
रदीफ- 'वही'
अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के सन्मुख अर्पित।

'दिल' ढूंढता है, फिर से फसाना वही,
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
जब पहली नजर का हुआ था असर
खता थी न मेरी , न उनको खबर ।
वो जो आलम इशारों का होने लगा
मुहब्बत की बजने लगी जब गजर ।।
उनकी गलियों में फिर आना जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
वो हमे देखकर मुस्कुराने लगे
मेरे ख्वाबों में भी रोज आने लगे।
वो चाहत का पल जो हंसी कम न था
कर इशारा हमे जब बुलाने लगे।।
उनका खिड़की से पर्दा उठाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
इजहारे 'मुहब्बत' जो हमने किया
इकरारे 'करम' फिर उनका हुआ।
जिंदगानी की रंगत बदल सी गयी
मेरी बाँहों में आना जो उनका हुआ।।
इक दूजे में फिर खो जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
दिल ढूंढता है फिर से फसाना वही।।...........
विनय कुमार सिंह "बालि"

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--21
अध्‍यक्षा आरणीया गीता वर्मा जी के समक्ष मेरी एक कोशिश
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प्रथम चरण -शिल्‍प और शिल्‍पी - ग़ज़ल
2 1 2 2 -1 2 1 2 -2 2
फ़ायलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन
काफिया -- आब
रदीफ़ -- कितने थे
भेजे जो वो गुलाब कितने थे
देखे तो वो नवाब कितने थे
हमने पूछा सवाल जब उनसे
पास उनके जवाब कितने थे
चाह कर भी न मुस्कराए वो
सोच उन पर अजाब कितने थे
आज भी याद कर रहा हूँ वो
उनकी आँखों में ख्वाब कितने थे
जिंदगी का भरोसा क्या है जब
रोग उनके खराब कितने थे
रोज उनका उधार लेना था
जाने उनके हिसाब कितने थे
----"आलोक"----
गोपाल राम गहमरी समारोह - 21
प्रथम चरण - शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आदरणीया Geeta Verma जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें।
विधा - मत्तगयन्द सवैया
शिल्प - यह चार पंक्तियों का मात्रिक छंद है जिसमें हर पंक्ति में सात भगण व अन्त में दो गुरु होते हैं। अर्थात् हर पंक्ति में वर्णक्रम निम्न प्रकार होता है:
भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गागा।
रचना की भूमि -
श्री कृष्ण के जन्म प्रसंग को तीन सवैयों में व्यक्त किया है। तीनों सवैयों की अन्तिम पंक्ति को स्थायी रखने का प्रयोग भी है रचना में।
रचना:
जन्म लियो घनघोर निसा खुलि वज्र कपाट गये अति भारी।
देवकि सों वसुदेव कहैं अब आइ गये दिन हैं सुखकारी।
पन्थ बनाय दईं जमुना अरु शेष करैं प्रभु की रखवारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
नन्द दुआर जुरी सखि भीर भये अति हर्षित गाँव जँवारी।
आँगन सोहर गूँजि रहे सब ग्वालिनि गाय रहीं सुकुमारी।
मातु जसोमति देखि रहीं मुसकाय रहें पलना त्रिपुरारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
शीतल मन्द बयार झुलाय रही झुलना किलकैं बनवारी।
नाचत मस्त मयूर खिले सब फूल सखी महकी फुलवारी।
बाल गुपाल निहाल प्रसन्न कदम्ब हँसैं वृषभानुकुमारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
- हितेश शर्मा "पथिक"

Mahesh Jainjyoti
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
--------
विधा:- घनाक्षरी छंद
शिल्प:- 47मात्रिक छंद । रगण 212
एवम् जगण 121 की क्रमागत 5
आवृत्तियाँ व अँत में एक गुरू ।
------------------------
बाग में कली कहीं जहाँ उगें
नहीं कहो न ,
कौन से उपाय से खिलें
प्रसून डाल के ।
टूट जाँय तार जो सितार के
बजे कभी न ,
ढोल फूट जो गया बजें न
बोल ताल के ।
जो न बेटियाँ रहीं वधू मिले
कहीं न सोच ,
क्या जवाब दीजिये सपूत के
सवाल के ।
बेटियाँ हवा समान भावनी
सुहावनीय ,
मारिये कभी न 'ज्योति 'पालिये
सँभाल के ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
***


गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आ.गीता वर्मा जी को समर्पित
==================================
विधा - गज़ल
मापनी/बहर --१२२२ / १२२२/ १२२२/ १२२२
काफ़िया --आया
रदीफ़ - नहीं करते
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सितमगर जिंदगी पर यूँ सितम ढाया नहीं करते !
किया है प्यार तो फिर जान तडफाया नहीं करते !!१!!
मिटाना चाहते हो फासले तो पास आ जाओ !
खयालों में सताकर प्यार को पाया नहीं करते !!२!!
हमारी ख्वाहिशें हम मर मिटें तेरी पनाहों में !
किसी की चाहतों को यार ठुकराया नहीं करते !!३!!
सुहाना सा समां है पर नजारे हैं बड़े गुमशुम !
विरह के गीत सावन में कभी गाया नहीं करते !!४!!
जमाने ने दिया जो जख्म वो ताजा हुआ फिर से !
लुटा है दिल सरे बाजार बतलाया नहीं करते !!५!!
फसाने जिंदगी के किस तरह तुमको सुनायें हम !
चुराकर चाँद को घर बार दमकाया नहीं करते !!६!!
चले आओ जुदाई डस रही मेरे खयालों को !
किसी के ख्वाब पर हक यार जतलाया नहीं करते !!७!!
~रमा वर्मा~

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -21
प्रथम चरण
हमारा रविवार
विधा ~गीत
मुखड़े तथा सभी पूरक पँक्तियोँ का मात्रा भार~16 -16
मुखड़े का तुकांत~आना भी है
अंतरोँ का तुकांत क्रमशः निम्न प्रकार है~1-आलू देखो,2-एंशन है,3-आन बिकेँगे,4-देखेँगे,5-अत बदली
समारोह अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी की प्रतिष्ठा मे~<>
खाना और बचाना भी है।
सारे फर्ज निभाना भी है।
1-
मँहगा होता आलू देखो।
फिसले जैसे बालू देखो।
दुनिया भर मे यही तमाशा।
रहे हमेशा ,चालू देखो।
रो,रो कर मुस्काना भी है।
सारे फर्ज.....
2-
फीस किताबोँ का,टेँशन है।
गयी नौकरी बस पेँशन है।
तन की हालत बिगड़ी बिगड़ी,
बिला वजह का संस्पेँशन है।
सोचा तो,पछताना भी है।
सारे फर्ज....
3-
खेत बिके,खलिहाल बिकेँगे।
घर के सब सामान बिकेँगे।
अगर जरूरत आन पड़ी तो,
दुनिया मे ईमान बिकेंगे।
आखिर शान बचाना भी है।
सारे फर्ज....
4-
सुख के लम्हे कब देखेँगे।
आज नही,अब कल देखेँगे।
अभी भरोसा किस्मत पर है,
जब देखेँगे, तब देखेँगे।
रुकते क्योँ हो,जाना भी है।
सारे फर्ज....
5-
आज तपन की हालत बदली।
दर्पन देखा,सूरत बदली।
समय सभी है देखा मैने ।
क्या करता मै,किस्मत बदली।
मन को आस दिलाना भी है।
सारे फर्ज ...।

(कहीँ कहीँ मात्रा पतन संभव)

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--21
प्रथम चरण -शिल्‍प और शिल्‍पी ।।
विधा- गजल,
मापनी- १२२२, १२२२, १२२२, १२२.

काफ़िया- आ,
रदीफ़- कर.
अध्‍यक्षा---आरणीया गीता वर्मा जी के सम्मुख सादर..
नहीं हूँ अब तुम्हारी मैं मुझे इतना बता कर,
बहुत रोई वो अपने हाथों की मेंहदी दिखा कर।
तुम्हारी हर निशानी छीन ली ज़ालिम जहाँ ने,
मुझे ढांपा नए कपडे नए ज़ेवर उढ़ा कर।
बहुत मजबूर हूँ कोई बता दे क्या करूँ मैं,
किसी का प्यार हूँ कोई चला दुल्हन बना कर।
दबी शहनाइयों की गूँज में दिल की सदायें,
मैं करती भी तो क्या करती कोई हल्ला मचा कर।
बहुत सुन्दर सजाया अर्थी को लोगों ने मेरी,
कहारों से कहा फिर ले चलो डोली उठा कर।
सुनो 'पागल' तुम्हारी ख्वाहिशों को विधवा कर के,
मुझे वर ले गया वो माँग सिन्दूरी सजा कर।
नितिन सिकरवार 'पागल'

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह - २१
प़थम चरण -शब्द और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा-आदरणीया गीता वर्मा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
मापनी - 2122 1222 1222 2
काफ़िया -अत
रदीफ़ -क्यों है

बेरुख़ी से तेरी मुझको रफ़ाक़त क्यों है ।
बेवफ़ा वक़्त में एहसास की दौलत क्यों है ।
सोच मेरी है ,जुबां मेरी , तसव्वुर मेरा
फिर भी इजहारे-हक़ीक़त से दहशत क्यों है ।
चाँदनी चुपके से दस्तक है दिल पे दे जाती
मेरी रातों के अँधेरों पे इनायत क्यों है ।
आईना चाँद का , फुर्क़त , ये अक्स यादों के
आज माजी के नजारों में नफासत क्यों है ।
यकीने-वाहमी के फूल तो मुरझा ही गए
मेरे दामन में अब ख़ारों की नियामत क्यों है ।
कान्ति शुक्ला
( रफाकत = मैत्री भाव , फुर्कत = वियोग , अक्स =चित्र , माजी =अतीत ,नफासत =स्वच्छता , यकीने-वाहमी = पारस्परिक विश्वास ,नियामत = अनुग्रह )

* गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21,
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत*
विधा- दुर्मिल सवैया या चन्द्रकला छंद
लक्षण- आठ सगण, वर्ड संख्या 24
प्रथम दो छंद में तुकांत अरु
तीसरे छंद में तुकान्त अरो

मन के सब संशय छोडि सकूँ अब ये भवसागर पार करूँ
पल बीत रहा घटते दिन देख दुखी मन भीतर आज जरुं
तजि जाल बवाल सभी अब मैं प्रभु पावन नामहि आस धरुं
इस जीवन से कुछ लाभ लिया नहि आगम से भगवान् डरूं
प्रभु नाम लिया नहि सोच रहा भवसागर में नहि जाय परूँ
अब आपन दोष कहूँ किससे प्रभु आपहि नाम सहाय करूँ
प्रभुआपन आज बिसारि सकूँ मनमानस तोहि बसाय मरुँ
जग के सगरे विष छोड़ सकूँ मनभावन हाथ प्रसाद धरुं
प्रभु आय बसों मन में हमरे मन आँगन पावन आज करो
मन गागर रीत रहा कब से अब पावन वारिहि डारि भरो
बन कोमल मोहक पावन सी अनमोल सुगंध सुवास झरो
रट लागि रही तुमरे जप की अब मानस भीतर धाम धरो
~~~~~~प्रियंका

* गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21, विधा-गीत। मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत -ईत सखी। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-अहक रहा।2-आती है।3-ओड़ दिया।4-एल नहीँ। प्रत्येक पंक्तियोँ का मात्राभार -16 - 14 के क्रम पर। समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत*
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रोज रात आँखोँ मेँ आकर
करता नृत्य अतीत सखी!
एक बहुत ही दिल से प्यारा
मेरा भी था मीत सखी!

याद अभी तक प्रथम छुअन है
तन मन अब तक महक रहा!
सुर्ख लबोँ से जहाँ छुआ था
सच कहती हूँ दहक रहा!
जैसे बात अभी कल की पर
गया साल भर बीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
मुझको जब ये धवल चाँदनी
आँगन मेँ नहलाती है!
महक साँस मेँ तब पुरवाई
उसकी लेकर आती है!
उर से निकल रागिनी भी फिर
गा उठती है गीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
लोक लाज के कारण मैँने
उसके दिल को तोड़ दिया!
आना जाना राह से उसकी
बिल्कुल मैँने छोड़ दिया!
चुपके चुपके आँसू बनकर
बहती है अब प्रीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
कहने वाले सच कहते हैँ
भाग्य बिना है मेल नहीँ!
आज समझ मेँ आया मुझको
प्यार प्यार है खेल नहीँ!
जीत उसे मैँ हार गयी वो
गया हारकर जीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव
ए - 259 संचार विहार कालोनी मनकापुर गोँडा उ.प्र पिन- 271308
फोन - 08858001681

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--21
प्रथम चरण -शिल्‍प और शिल्‍पी ---शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्‍द/रचना
अध्‍यक्ष---आरणीया गीता वर्मा जी ...
कह-मुकरी विधा
कह-मुकरी मूलतः दो सखियों के बीच की वार्ता पर आधारित विधा है । इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में १५ या १६ मात्राएँ होती हैं । इसके प्रथम तीन चरणों में एक सखी द्वारा दूसरी सखी से अपने साजन के कुछ लक्षण बताए जाते हैं, उन लक्षणों को सुनकर दूसरी सखी द्वारा पहली सखी से उत्तरविषयक (ए सखि साजन ?) प्रश्न किया जाता है और तब पहली सखि लजाकर अपने कहे से मुकर जाती है तथा साजन के बजाय कहे लक्षणों से मिलता-जुलता कुछ और उत्तर दे देती है ।
मात्रा भार -
लघु जिस पर कोई मात्रा न हो या छोटी मात्रा हो एक मात्रा गिनी जायेगी। गुरु यानी बड़ी मात्रा, इसकी २ मात्राएँ गिनी जांयेंगीं
इस विधा पर अमीर खुसरो द्वारा सर्वाधिक काम किया गया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की।
तारे गिन गिन रातें कटती
बिन उसके ना सुबहे होती
सारे दिन लगाता चक्कर
क्या सखि साजन ??
नहीं दिवाकर !! $ 1 $
तन मन को वो बहका जाये
सोचूँ तो नैना झुक जाये
मिल जाये तो रच दूँ गीत
के सखि साजन ?????
ना सखि प्रीत। ........ $ 2 $
उससे ही सांसो के तार
वो ही जीवन का आधार
उस बिना ना जाये जिया
क्या सखि साजन ???
न सखि हिया .......... $ 3 $
देख देख उसको शरमाऊँ
बिन उसके घर सूना सूना
सुख दुःख सारे उसको अर्पण
क्या सखि साजन ???
ना सखि दर्पण। .... $ 4 $
रंग रँगीली है वो सुन्दर
झांके वो घूँघट से बाहर
ले जाये साजन की निंदिया
ऐ सखि सजनी ??
ना री बिंदिया !! $ 5 $
सुषमा दुबे
गोपाल राम गहमरी 'शिल्प शिल्पी' साहित्यिक समारोह- 21
विधा- गीत
शिल्प विधान- मुखडे की सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरोँ की सभी पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/16
तुकान्त विधान- मुखडे का तुकान्त- ओड दिया।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- आरे।
2- ई है।
3- अंक हो गया।
ँँँ
समारोह अध्यक्षा सम्मान्य आदरणीया ''गीत वर्मा'' जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
प्रेम प्रकृति का पावन बंधन, आत्म सुखोँ से जोड दिया।
ऋतु पावस का मस्त झकोरा, पिया पंथ रुख मोड दिया।

धूर्त नयन उर हंस निहारेँ,
गगन मेघ से झरत फुहारे।
बागोँ मे मोरोँ की बोली,
कर हिय घाव जिया को जारेँ।
दादुर की वह टर्र टर्र ने,
विरह राग मन जोड दिया।
ऋतु.....(1)
मधुमासोँ नें दस्तक दी है,
वर्षा कर श्रंगार सजी है।
हरित धरा भी आज मचलकर,
ले अनंग को साथ खडी है।
व्योम दामिनी की दमको ने,
तन मन सब झंझोड दिया।
ऋतु.....(2)
अंग दहन जस लंक हो गया,
रक्त चाप भी रंक हो गया।
भीग गयी थी तपित श्वाँस से,
दाहित मन अब पंक हो गया।
स्वप्न सुखोँ के ओज बिन्दु नेँ,
शीर्ष शिथिल तन छोड दिया।
ऋतु......(3)
ँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह 21
गीता वर्मा जी को समर्पित
एक गीत का प्रयास । मापनी .मुफाईलुन चार बार 1222 चार बार ।ज़िहाफत के साथ
.मुखडा
किया वादा निभाऊँगा ,मैँ वापस लौट आऊँगा
लगाऊँगा तुझे सीने तुझे दुल्हन बनाऊँगा
.
प्रथम अँतरा
चरागोँ का सफर भी है अँधेरोँ की नज़र भी है
तुझे जो आग तड़पाये मिरी जानम इधर भी है
सराबोँ की गली से भी मैँ सावन खीँच लाऊँगा
किया वादा ...
अँतरा 2
वही मँदिर की दहलीजेँ तिरा झुकता हुआ माथा
भरे नयनोँ की स्याही से ह्रदय लिखता वही गाथा
वही मजबूरियाँ वापस तुझे ना फिर सुनाऊँगा
किया वादा ...
.
.अँतरा 3
पड़े थे कब से खाली ये नगर सूने तमन्ना के
सजे हैँ आज पलकोँ पर गुहर कितने तमन्ना के
यही मरती हुई हसरत मुहब्बत फिर जगाऊँगा
किया वादा निभाऊँगा ..
जश्न
गुहर _मोती
सराब_मृगमरीचिका , जलका भ्रम

गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21,
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी एवं समस्‍त मंच तथा गुरूजनों को समर्पित
विधा ---गजल
काफिया --ओने
रदीफ --नहीं देती
बहर -
1222 1222 1222 1222
किसी की याद रातो मे हमें सोने नहीं देती
कसम उसने दिया था जो हमे रोने नहीं देती

चली थी साथ मेरे जो कभी इक हमसफर बन कर
न जाने पास अपने क्‍यों हमें होने नहीं देती
सिखाया था हमें जिसने जमाने में रहें कैसे
वही अब प्‍यार भी हमको वहाँ बोने नहीं देती
नहीं है प्‍यार मुझसे अब मगर नफरत जरा देखो
किसी को लाश भी मेरी वो अब ढोने नहीं देती
हमारे गीत में छुपकर हमेशा वो चली आती
बने आवाज दिल की सुर हमें खोने नही़ं देती
अखंड गहमरी
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Wednesday, 16 July 2014

गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह 20 हमारा रविवारा दिनांक 13 जुलाई 2014 से 14 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष आदरणीय कृष्‍णा नन्‍दन मौर्य

इस प्रकार गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह 20 का दूसरा चरण हमारा रविवारा  दिनांक 13 जुलाई 2014 से 14 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष आदरणीय कृष्‍णा नन्‍दन मौर्य एवं आप सब के सहयोग से पूर्ण हुआ हम आप सब रचनाकारों का हार्दिक अभिनंन्‍दन करते है तथा अापके स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍जवल भविष्‍य की कामना करते है।
इस समारोह में क्रमस गीता वर्मा जी,एस आर पल्‍लव जी, सुरश्‍ेा मिश्रा उत्‍साही जी, रेखा जोशी जी,नितिन सिकारवार पागल जी, कल्‍याणी झा जी,लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीवाल जी, हितेश शर्मा जी, रमा वर्मा जी, डा0 हीरा लाल प्रजापित जी, करण एस पी जी, कान्‍ती शुक्‍ला जी, सतीश वर्मा जी, अखंड गहमरी ने अपनी रचना प्रस्‍तुत किया आप सब का हार्दिक आभार

इस कार्यक्रम की विजेता गीता वर्मा जी रही जो आगामी कार्यक्रम की अध्‍यक्षा रहेगी


Geeta Verma
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
विधा - गीत
मापनी-2122,1212,22
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत- आस है फिर से।
प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-आऊँ 2-आनी थी 3-एरा था।
आयोजन प्रमुख सम्मान्य अध्यक्ष श्री. कृष्ण नन्दन मौर्य जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर।
*******************************
आज मौसम उदास है फिर से
तू मेरे दिल के पास है फिर से!
पूरा सागर छलक गया लेकिन,
एक कतरे की प्यास है फिर से!
...
तू जो कह दे तो मैँ घटा बन के
तुझ को छू लूँ अभी बरस जाऊँ!
आये बैठे जरा सुने मुझको
जाने कितने ही गीत मैँ गाऊँ!
क्यूँ समर्पण का भाव आया है
तुझसे कैसी ये आस है फिर से!
क्या कहूँ कैसी जिंदगानी थी
तू नहीँ था तो क्या कहानी थी!
एक समन्दर था घिरा तूफाँ से
और कश्ती मेरी पुरानी थी!
तू जो आया तो जी उठी हूँ मैँ
मेरी साँसो मेँ साँस है फिर से!
क्या कहूँ किस कदर अँधेरा था
और निराशा ने मुझको घेरा था!
सारे मंजर मुझे डराते थे
और बस खौफ का बसेरा था!
तू जो आया है दीप बन करके
मेरे दिल मेँ उजास है फिर से!
………geet


S.r. Pallav
साहित्य समारोह - 20
द्वितीय चरण- गीत गजल-
शिल्प विधान -
1222 1222 1222 1222
काफिया- आते,
रदीफ- हैँ
अतिथि रचना -
मुहब्बत मेँ कभी ऐसे रँगी लमहे भी आते हैँ
कि दो पल को जमाने के सभी गम भूल जाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
मेरे पहलू मेँ आकर तुम
चलो भी दो कदम तो सँग
नजारे खुद ही राहोँ मेँ बहारोँ को बिछाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
कभी इन्तजार की घडियाँ
कभी बस प्यार की घडियाँ
यही है ख्वाब कुछ ऐसे जो हर दिल को लुभाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
कभी इस राहे उल्फत मेँ
तन्हाई मेँ , जवाँ रुत मेँ
हँसी रहबर के सँग गुजरे हुए दिन याद आते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
उन्हेँ चाहेँ भुलाना भी
खयालोँ मेँ न लाना भी
मगर उतना निकट आते कि जितना दूर जाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
. . . . . . . . . . . . . पल्लव *

हमारा रविवार =२०
अध्यक्ष्य -आ .कृष्ण नंदन मौर्य जी के चरणो में
मात्रा भार =१६/१६
मुकरिया विधा
१== नारी देख आज हरशाये
सोच यहीं उलटा मन भाये
यही सोच रावण हैं जीता
क्या सख़ि साजन ,ना सखि सीता
२== देखों उपजा प्रेम अगाधा
आज्ञा मिली लक्ष्य हैं साधा
तेल तरल सृजन है तसली
क्या सख़ि साजन,ना सखि मछली
३==प्रथम मेल वाटिका करवाये
देखे वहा तभी शरमाये
सोच रही हूँ बनूं संगनी
क्या सख़ि साजन,ना सखि सुगनी
४== टूटा अपना जीवन नाता
सुन लो यही सत्य हैं भ्राता
मारा मुझको करा ना भक्षण
क्या सख़ि साजन,ना सखि लक्ष्मण
५== तेरा नाम सुना था पहले
मेरी गलती कुछ भी कह ले
खाओ झूठा हूँ मैं पगली
क्या सख़ि साजन,ना सखि कदली
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७१०६६१
९६३४७६३०७६

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
अध्‍यक्ष-- कृष्ण नन्दन मौर्य जी
विधा ग़ज़ल
मापनी/बहर --1222 1222 122
काफ़िया --आ
रदीफ़ -अब ज़िंदगी में
तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में
न हो हमसे खफा अब ज़िंदगी में
रहे तन्हा बिना तेरे सहारे
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में
बहुत रोये सनम तेरे लिये हम
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में
तड़प तुम यह हमारी देख ले अब
मिले जो इस दफा अब ज़िंदगी में
न कर शिकवा बहारों से सनम तू
नही वह बेवफा अब ज़िंदगी में
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
विधा- ग़ज़ल,
मापनी- 1221 2212 2122
काफिया- आने
रदीफ़- की कोशिश
अध्‍यक्ष-- कृष्ण नन्दन मौर्य जी
शुरू हो गई है भुलाने की कोशिश ।
मुझे अपने दिल से मिटाने की कोशिश ।
नहीं बाज आते वो आदत से अपनी,
कदम दर कदम आजमाने की कोशिश ।
इरादे जुदा लग रहे हैं सनम के,
नहीं है फकत ये सताने की कोशिश ।
हमें इश्क ने ये तज़ुर्बा दिया है,
न करना कभी दिल लगाने की कोशिश ।
मिले तीरगी ज़िस्त में तो बताना,
करूँगा मैं खुद को जलाने की कोशिश ।
भूला दूँगा मैं रास्ता मैकदों का,
कभी आँखों से कर पिलाने की कोशिश ।
मेरी जान ले लेगी इक दिन तुम्हारी,
ये 'पागल' से दामन छुड़ाने की कोशिश ।

नितिन सिकरवार 'पागल'

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--२०
विधा-गजल
काफिया -आ , रदीफ-रहा ,
मापनी -२१२--२१२--२१२--२१२
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प्यार में सुनो सनम खोता रहा
कल्पना बीज यार मैं बोता रहा
समय तो भागता-भागता ही रहा
यार आराम से खूब सोता रहा
ठोकर लगी मैं सुधरने लगा यार
प्यार मैं क्यों पड़ा सोच रोता रहा
प्यार तो होता लुभावन बड़ा
दोस्त इस पर कुर्बान होता रहा
यार अब तुम सब मेरी हाल न पुछो
यार अपनी नसीब तो खोटा रहा
"कल्याणी झा"
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20 दूसरा चरण-
दोहे शिल्प विधान – दोहा छंद में १३,११ मात्राओं के चार चरण होते हैं ! विषम चरण का अंत गुरु से और सम चरण का गुरु लघु (२१) के तुकांत से करते हैं ! दोहे के विषम चरण में आंतरिक व्यवस्था 3-3 4 3, या 4-4 3 3 श्रेष्ठ मानी जाती है | विषम चरणों का प्रारम्भ जगण अर्थात १२१ मात्राभार वाले 'स्वतंत्र शब्द' से नहीं होता है !इसकी एक विशेष लय होती है !
मिलता मान असीम (दोहें)
भौतिक सुख घटता रहे, इसका काल ससीम
बढ़ता जाए आत्म सुख, मिलता रहे असीम |
आत्मा जिससे तृप्त हो, उससे नहीं थकान
जिससे मिलता सुख बहुत,उसको ले पहचान |
भौतिक सुख की चाहना, मन में रहे असीम
सीमित तन मन शक्ति को,समझे राम रहीम |
निजता में झाँके नहीं, सिमित करे सम्बन्ध,
ताका झाँकी तोड़ती, सीमा के तटबंध |
निजता में भी कर सके, निश्छल प्रेम प्रवेश
प्रेम पूर्ण व्यवहार हो, मन में रहे न द्वेष |
प्रेम पूर्ण व्यवहार से, मिलता मान असीम,
वरना निजता लांघना, रिश्ता करे ससीम |
-लक्ष्मण प्रसद लडीवाला

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
समारोह अध्यक्ष श्री कृष्ण नन्दन मौर्य जी को समर्पित निम्न रचना आप सबके समक्ष सादर प्रस्तुत कर रहा हूँ. कृपया स्नेहाशीष दें.
विधा - मत्तगयन्द सवैया
शिल्प विधान - चार चरणों का मात्रिक छंद, प्रत्येक चरण में भानस की सात आवृत्तियों के बाद दो गुरु. अर्थात "भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गा गा".
रचना परिचय - भगवान श्री कृष्ण के बृज से जाने के प्रसंग के एक अंश को निम्न मत्तगयंद सवैयों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उनके जाने की सूचना से राधा रानी व्याकुल हैं, मधुसूदन स्वयं व्याकुल हैं और निर्जीव सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी भी व्याकुल है।
जाय रहे बृज से नँदलाल सुनी बस हाल भुला रहिं राधा।
दौरि परी घट छोरि सखी बिन पादुप पंथ भुला रहिं राधा।
झूठ खिझाय रहे सबही मन धीरज खूब दिला रहिं राधा।
माखनचोर बसैं हियँही मन मा सब देव मना रहिं राधा।।
नन्द दुवार जुरी लखि भीर झुराय गयीं पथरा गयिं राधा।
देखि परे मुरलीधर तो कर जोरि उन्है बुलवा गयिं राधा।
होंठन बोलि सकीं न कुछौ हिय की पर पीर बता गयिं राधा।
प्रीत कि रीति निभाय गयीं अरु नैनन नीर छिपा गयिं राधा।।
आय गये अकरूर लिये रथ जानि गए मुरझा फिर कान्हा।
दौरि परे सब छोरि सखी दधि माखन खेल भुला फिर कान्हा।
जाय यशोमति अंक छिपे अरु आँचल में सिमटा फिर कान्हा।
ना जइहौं हम रोकि लियौ तुम बोलि गले चिपटा फिर कान्हा।।
द्वार दिखीं वृषभानुसुता झट दौरि परे सँकुचावत कान्हा।
अंदर अंदर रोय रहे प्रिय ढाँढस खूब दिलावत कान्हा।
आज गए बस आ जइहौं तुम देखि लिहो बतलावत कान्हा।
प्रीत कि रीति निभाय रहे प्रिय के मन को समझावत कान्हा।।
नित्य बजै पर आज भई चुप भीतर से अकुला रहि बंसी।
देखि रही चुपचाप परी सब पोरन नीर बहा रहि बंसी।
होंठ लगाय मुरारि लिये सब पीर हिये बिसरा रहि बंसी।
बाजि रही मुरलीधर के मन प्रीत कि रीत निभा रहि बंसी।।
- हितेश शर्मा “पथिक”, लखनऊ

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
अध्‍यक्ष-- आदरणीय कृष्ण नन्दन मौर्य जी को सादर समर्पित
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विधा - ग़ज़ल
काफ़िया - अता
रदीफ़ - हम क्या करें
मापनी - 2122 / 2122 / 212
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दिल कहीं लगता नहीं हम क्या करें |
चाँद भी ढलता नहीं हम क्या करें ||१||
चांदनी भी सो गई है रात में |
आसमां मिलता नहीं हम क्या करें ||२||
ढूंढती थी ये नजर जिसको सदा |
वो कहीं दिखता नहीं हम क्या करें ||३||
शाख से टूटा हुआ पत्ता कभी |
शाख पे जुड़ता नहीं हम क्या करें ||४||
आँख में आंसू भरे हों तो वहां |
ख्वाब भी पलता नहीं हम क्या करें ||५||
दर्द जो दिल में दबा है वो कभी |
आँख से बहता नहीं हम क्या करें ||६||
दिल जरा नाजुक कली सा है 'रमा' |
दर्द ये सहता नहीं हम क्या करें ||७||
~रमा वर्मा~

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
13 जुलाई रविवार प्रात: 10 बजे से 14 जुुलाई सोमवार प्रात: 10बजे तक
अध्‍यक्ष--समारोह 19 के बिजेता कृष्ण नन्दन मौर्य जी
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विधा - ग़ज़ल
काफ़िया - अड़के
रदीफ़ - यहाँ
मापनी - 2122 / 2122 / 2122 / 212
[ छूट ली है - ढ़ , सड़कें ]
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क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II
माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II
जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ,
जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ II
ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी ,
उनका दिल तक कर हसीनाओं को न धड़के यहाँ II
कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ ,
अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ II
कुछ कुसूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो ,
रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ II
उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें ,
जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ II
पहले थर्राते थे दरवाज़ो शज़र तूफाँ से सच ,
खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 20
विधा- गीत
शिल्प- मुखडे तथा अंतरोँ की सभी पंक्तियोँ की मापनी-
2122, 2122, 2122, 2122
मुखडे का तुकान्त- आना
अंतरोँ का तुकान्त-
1- आन बनकर
2- अजीले
3- अको मे
ँँँँँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय कृष्णनंदन मौर्य जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
हे विकल पथ के अकिंचन, धैर्य से पग तू बढाना।
ओढ साहिल पे खडे हैं, खार खल योगी का बाना।
तू सफल गर मंजिलोँ मेँ, हो गया इंसान बनकर।
तो समझ तेरा ये जीवन, बढ चला संज्ञान बनकर।
बस भ्रमित इन साहिलोँ पर, तू नजर को मत घुमाना।
ओढ...(1)
खीँच ले गर प्रीति बनकर, हुस्न के बंधन सजीले।
चंदनोँ सी लेप मे जो, छिप रहे नैना लजीले।
ओज कण को फिर सजग हो, दलदलोँ मे तू गिराना।
ओढ....(2)
बन गया अंजान हर नर, हिमशिखर की ठंडकों में।
मिट गयी इंसानियत अब, द्वेश पशुता बंधकों मेँ।
तू नवल प्रतिदान बनकर, कर्म पथ अपना सजाना।
औढ...(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन-

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह २०
शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
रविवार १३ जुलाई प़ात: १० बजे से सोमवार १४ जुलाई प़ात: १०बजे तक
समारोह अध्यक्ष -सम्मान्य श्री कृष्ण नंदन मौर्य जी को सादर समर्पित
ग़ज़ल
मात्रा भार-२१२२ २१२२ २
काफिया-आब
रदीफ़ -देखा है
आज फिर एक ख्वाब देखा है ।
कहीं खिलता गुलाब देखा है ।
आसमां की ऊंचाई छूने को
मैंने उड़ता उकाब देखा है ।
हरी फसलों के शेर लिखते हुए
किसान इक कामयाब देखा है ।
धूल की पैरहन पहन के भी खुश
ऐसा इक बेहिजाब देखा है ।
एक मजदूर माँ के बच्चे को
मैंने पढ़ते किताब देखा है ।
घने दरख्त के झुरमुट में अटक
झांकता माहताब देखा है ।
शुक्रिया की नमाज़ करते अदा
एक मुफलिस शबाब देखा है ।
सहर होने का इशारा लेकर
निकलता आफताब देखा है ।
खोया ज्यादा है और कम पाया
मैंने पिछला हिसाब देखा है ।
कान्ति शुक्ला


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन के अंतर्गत :
अध्‍यक्ष--समारोह 19 के बिजेता कृष्ण नन्दन मौर्य जी को सादर समर्पित ।
( अन्य स्नेहिल मित्रों के अवलोकानार्थ , प्रतिक्रिया आमंत्रण के अनुरोध के संग )
स्थायीभाव, करुण रस, आलाम्बन विभाव : प्रेयसी , उद्दीपन विभाव : वियोग व्यथा ।
मुखड़े का मात्रा भार : 28, अंतरें का मात्राभाव : 44.
शीर्षक : अब रूप ऐसा हमारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
ज्यों नाविक कोई,
मंझधार बीच,
दिशा बोध खोकर,
कोशिश में लगा,
पा जाये किनारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
जैसे क्लांत पुष्प,
धरा पर गिर कर,
चाह रखे दिल में,
रूष्ठ सौरभ को,
पा जाये दुबारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
जैसे विरही एक,
खोकर निज प्यार,
जीवन से विरत,
खोजे फिर भी,
जीने का कोई सहारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई/ 13.07.2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
अध्‍यक्ष-- आदरणीय कृष्ण नन्दन मौर्य जी एवं सम्‍पूर्ण मंच को समर्पित
विधा ' गजल
काफिया -- आते
रदीफ --रहे
बहर 212 212 212 212
गीत गा कर उसे हम सुनाते रहे
हाल दिल का उसे हम बताते रहे
रात भी तो गुजरने लगी थी मगर
पास आये न बाते बनाते रहे
प्‍यार उन से करे हम कहाँ बैठ जब
चाँद से भ्‍ाी उसे हम छुपाते रहे
प्‍यार हमने किया प्‍यार उसने किया
वो मिटाते रहे हम निभाते रहे
माँग उसकी सजाई लहू से मगर
साथ चल ना सके हम बुलाते रहे
फिर मिलेगे कभी ना कभी हम यहाँ
आस के दीप मन में जलाते रहे
अखंड गहमरी
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''7777आप सब रचनाकारो को हार्दिक नमन

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह 20 हमारा मुक्‍तक 11 से 13 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष महेश चंन्‍द्र ज्‍योति

इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह 20 का प्रथम चरण हमारा मुक्‍तक दिनांक 11 जुलाई 2014 से 13 जुलाई 2014 तक  अध्‍यक्ष आदरणीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति एवं आप सब के प्रयास से पूर्ण हुआ। हम आपस के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य एवं स्‍वस्‍थ जीवन की कामना करते है तथा आशा करते है कि आप सब इसी प्रकार मंच को अपना स्‍नेह देते रहेगें ।
           इस समारोह में आप क्रमंस - आदरणीय हितीक शर्मा जी , नितिन सिकरवार जी , ओमप्रकाश नौटींयाल जी, लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीवाल जी , विजय शंकर मिश्रा जी, पारूल गुप्‍ता जी, लव कुमार प्रणय जी, नारायण गौरव जी, उमेश श्रीवास्‍तव जी, पवन गोली जी,मीना मिश्रा जी, धीरेन्‍द्र कुमर जोशी जी, राकेश जोशी जी, सतीश वर्मा जी, महेश जैन ज्‍योति जी, डा अर्चना गुप्‍ता जी, अन्‍नुपूर्णा बाजपेयी जी, सुषमा जोशी दूबे जी,Uddhav Deoli जी, कल्‍याणी जैन झा जी, कैलास चन्‍द्रा जी, अरूण शर्मा जी,कान्‍ती शुक्‍ला जी, सतोष नेमा जी, रजनीश तपन जी, पारूल गुप्‍ता जी, अलका गुप्‍ता जी, प्रियंका पांड जी, कवि सतीश मघुप जी, डा0 हीरा लाल प्रजापति जी, रमा वर्मा जी, कुन्‍दन उपाश्‍याय जी, मीना मिश्रा जी,सब ने अपना योगदान दिया हम पूरे गहमर क्षेत्र के तरफ से आप के आभारी है ।

इस समारोह में प्रथम स्‍थान ---आदरणीय हितीक शर्मा जी
दितीय स्‍थान ------आदरणीय नितिन सिकरवार पागल जी
प्रतिक्रिया के लिये आदरणीय सतीश वर्मा जी
को दिया गया आप सब का हार्दिक अभिनंन्‍दन

Hitesh Sharma

11 July at 15:46 · Lucknow

शुक्रवार शनिवार - मुक्तक
विषय - आँख/नयन/नेत्र समानार्थी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 20
समारोह अध्यक्ष आदरणीय Mahesh Jainjyoti

चाँद छिपा, बादल ने कर दी, मद्धम हो बाती जैसे।
और हवा कानों में मीठी, लोरी थी गाती वैसे।
थकन थकी दे खूब थपकियाँ, खूब किया मनुहार मगर,
ख्वाब तुम्हारे थे आँखों में, नींद भला आती कैसे।

- हितेश शर्मा “पथिक”

 Nitin Sikarwar
11 July at 21:02

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र

मेरी आँखों में इक प्यासा समंदर रो रहा है।
जिधर देखूं उधर हर एक मंज़र रो रहा है ।
सर.ए.महफ़िल छुपा कर ग़म मैं जब से मुस्कुराया,
कोई तो है मेरे अंदर ही अंदर रो रहा है ।

नितिन सिकरवार 'पागल'
Om Prakash Nautiyal
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-20
हमारा मुक्तक 11 से 13 जुलाई 2014
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी के समक्ष सादर प्रस्तुत !
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
उन आँखो मे कहाँ नूर जिनमे हया न हो,
किस बात का गुरूर जब कि दिल में दया न हो,
छंद, शिल्प से सजी उस रचना में क्या पढें
अगर भाव, अनुभव, विचार कुछ भी नया न हो !
-
-ओंम प्रकाश नौटियाल

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
जब बहते नयनों से आंसू विरह गीत नया बन जाता
सजल नेत्र से निरखे जिसका जीवन सफल हो जाता
करुनामयी के आँसू जब छलके करुना में निर्झर –
ह्रदय से निकले गीत स्नेह के आशीष वचन देजाता |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी
तेरे नैनों के जादू से बचना चाहा,
ऑंखें नदियाँ उसकी-समुन्दर चाहा,
उसे डूबोने का हर हुनर मालूम था,
कागज की कश्ती से पार करना चाहा II
विजय शंकर"मिश्रा"

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
पहला चरण- हमारा मुक्‍तक --11 जुलाई शुक्रवार प्रात: 10 बजे से 13 जुुलाई प्रात: 10बजे तक
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र "
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी एवं समस्त गुनीजनो के सम्मुख प्रस्तुत मुक्तक
सूनी मेरे मन की गलियाँ रहती पंथ निहार
कब आओगे कब डारोगे इन पर प्रीत फुहार
आये न बालमवा भेजी एक निगोड़ी चिठिया
बरसी प्रीत आँखों से तब बन कर मेघ मल्हार
------------------पारुल'पंखुरी'
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
हमारा मुक्‍तक
विषय --आँख /नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीयश्री महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर
(अतिथि रचना )
*मुक्तक*
डाल से टूटकर फूल है कब खिला
ढूँढते ही रहे पर कहाँ रब मिला
आँसुओं से भरी आँख ने ये कहा
जिन्दगी में सभी को कहाँ सब मिला
लव कुमार 'प्रणय'


गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-20
हमारा मुक्तक 11 से 13 जुलाई 2014
आदरणीय अध्यक्ष श्री महेश चंद्र जैन ज्योति जी को समर्पित ।
विषय-नयन/समानार्थी ।
चलो नयन से नयन लड़ाते हैं ।
नयन लड़ाकर नयन चुराते हैं ।
नयन चुराकर के नयनों से फिर,
नयन चोर की रपट कराते हैं ।
-नारायण गौरव ।

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 20
विषय - ऑखे/ नयन/ नेत्र
अध्यक्ष - माननीय महेश जैनज्योति जी
देखकर फिर सघन जलधर
विकल बरसे नयन झरझर ।
खिल उठे फिर प्रेम-मधुबन
अश्रु बरसो आज निर्झर ।।
डा. उमेश चन्द्र श्रीवास्तव
लखनऊ

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
हमारा मुक्‍तक
विषय --आँख /नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीयश्री महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित
सुख किसी साधन के नीचे मरा पड़ा है,
लिहाज आंख के पानी में ही डूब मरा है,
शर्म गुमशुदगी की फेहरिस्त में है कहीं,
जमीर नोटों के ढेर तले कुचला पड़ा है।
(पवन गोयल )

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -२ओ
पहला चरण -हमारा मुक्तक-११ जुलाई २०१४ से १३ जुलाई प्रातः तक
विषय :-आँखें/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्द्र ज्योति जी
गुरु पूर्णिमा पर सद्गुरु भगवान के श्री चरणों में कोटिशः नमन के साथ
===============================================
नहीं पहुंच पा रही आज,बाबा! मैं तेरे द्वारे;
विवशता है क्षमा करो,बरस रहे नैन हमारे।
तुम हो करुणा-सागर,हम अबोध तेरी संतान ;
बचे रहें सब दोषों से,बरसें सदा आशीष तुम्हारे। ।
मीना मिश्रा

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -२०
हमारा मुक्तक-११ जुलाई शुक्रवार प़ात: १० बजे से १३ जुलाई प्रातः १० बजे तक
शीर्षक(विषय)-आँखें/नयन /नेत्र
समारोह अध्यक्ष -सम्मान्य श्री महेश चन्द्र जैन ज्योति जी को सादर समर्पित
साथ चले दोनों हमजोली,
सुबह दिवाली ,शामें होली,
शब्दों से भी परे प्रीत है ,
समझे नयन,नयन की बोली!
*********धीरेन्द्र कुमार जोशी


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
पहला चरण- हमारा मुक्‍तक --11 जुलाई शुक्रवार प्रात: 10 बजे से 13 जुुलाई प्रात: 10बजे तक
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित ।
न चाहते हुये भी हमे उनसे प्यार हो गया
लब खुले भी नही आँखों से इज़हार हो गया
खुदा बचाये इस नामुराद मुहब्बत से हमे
न जाने कैसे दिल फिर इसका शिकार हो गया
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
पहला चरण- हमारा मुक्‍तक --11 जुलाई शुक्रवार प्रात: 10 बजे से 13 जुुलाई प्रात: 10बजे तक
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित ।
( साथ ही अन्य प्रबुद्ध मित्रों के अवलोकनार्थ , प्रतिक्रिया आमंत्रण के संग )
शीर्षक : नयन ।
नयनों में मधुशाला झलके, अधरों पर खिले फूल पूनम के,
मुख पर दमके चंद्र ज्योत्सना , मुसकराओ जब तुम हल्के हल्के ।
जली वर्तिका बुझे दीप की, एक मुस्कान ये आभास दे गई
चंचल चपल कामिनि के मुख पर रह रह कर ज्यों दामिनि चमके ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई / 11.07.2014

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
सभी सम्मान्य विद्वजनों की समालोचनार्थ ।
* अतिथि रचना *
---------------
नयन की बात को नैना समझते ,
कभी बचते कभी ये जा उलझते ,
चतुर इतने छिपाते कुछ भी नहीं ,
बडे नाजुक , पलों में ये बरसते ।
-----
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।

शुक्रवार से शनिवार =मुक्तक
विषय -आँख /नयन नेत्र
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२०
अध्यक्ष =माननीय महेश चाँद जैन जी को समर्पित
मेरे मन का निबंध मौन की आँखों ने पढ़ लिया
तुम्हारी यादों ने असर मेरे दिल पर कर दिया
तैर आई हैं नयनों में तरल सी परछाइयाँ
उनकों भी संभाल अपने रुमाल में रख लिया
डॉ अर्चना गुप्ता

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
हमारा मुक्‍तक
विषय --आँख /नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीयश्री महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित
दिल ही नहीं तुमने नैनो का काजल भी चुराया है
इंतजार मे मुझको , तुमने दिन रात खूब रुलाया है
चित चोर कहलाते हो चोरी करना काम है तुम्हारा
प्रीत का नाम न लेना , तुमने दिल मेरा दुखाया है ।
..................अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु '

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
पहला चरण- हमारा मुक्‍तक --11 जुलाई शुक्रवार प्रात: 10 बजे से 13 जुुलाई प्रात: 10बजे तक
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी
अश्रु के मोती निरंतर चक्षु से गिरते रहे
रेत प्यासी हिरनियों की प्यास से झरते रहे
मिल न पाया आज भी सुख का किनारा
जिंदगी की दौड़ में हम बावरे फिरते रहे
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-२०
पहला चरण -हमारा मुक्तक -११, ११ जुलाई से १३ जुलाई २०१४ ,१० बजे प्रात: तक|
विषय-आँखें/नयाँ/नेत्र|समारोह अध्यक्ष- माननीय Mahesh Jainjyoti साहब
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आँखें देखती हैं सुख को,
आँखें देखती हैं दुःख को,
जिनकी आँखें नहीं होती,
नहीं देख सकें हैं सुख को||


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित
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तुम्हें पसंद किया मेरे नयना
बन जाओ तुम यार मेरे सजना
देखो मुझे न तुम और सताओ
चाहूँ हर हाल में तेरी बनना
"कल्याणी झा"

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -20
शीर्षक -नयन/आँखे/नेत्र
समारोह अध्यक्ष आदरणीय महेश जैन ज्योति जी के समक्ष प्रस्तुत
*****-*
कुदरत ने ख़ास ही सांचे में फुरसत में तुमको ढाला है
जब से देखा है एक नज़र मुश्किल से दिल सम्भाला है
शहद घुला है बातों में और कस्तूरी है साँसों में
तेरे होठ छलकते पैमाने तेरी आँखों में मधुशाला है
***
कैलाश भारद्वाज
फरीदाबाद
उद्धव देवली/१२-७-२०१४|


गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
हमारा मुक्तक
शीर्षक--आँख, नयन,चछु आदि।
समारोह अध्यक्ष श्री जैन ज्योति जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत------
प्रखर वेदना--- पर मनन है नयन में।
असीम प्रेम है--- मेरे प्यारे सजन में।
विरह में जीवन-- बिताये हैं लेकिन।
आनंदित हुआ बस उन्हीं के लगन में।

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -२०
हमारा मुक्तक-११ जुलाई शुक्रवार प़ात: १० बजे से १३ जुलाई प़ात १० बजे तक
शीर्षक(विषय)-आँखें/नयन /नेत्र
समारोह अध्यक्ष -सम्मान्य श्री महेश चन्द्र जैन ज्योति जी को सादर समर्पित
उभरीं हैं स्मृति की अनगिन परछाइयां ।
कोकिल की तान वही हेमिल अमराईंयां ।
बीते क्षण तिरने लगे नेत्रों की सीपी में -
विजन तले सपन छलें बोझिल तनहाईंयां ।
कान्ति शुक्ला

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
हमारा मुक्‍तक
विषय --आँख /नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीयश्री महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित
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बंद जो जुवां हो तो बोलती हैं आँखे....!
दिल का हर राज खोलती हैं आँखे....!
"संतोष' गम हो या ख़ुशी हर बक्त
एक नए अंदाज़ में बोलती है आँखे....!

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह~20
हमारा मुक्तक
शीर्षक~आँख ,नयन,चछु,नयन आदि।
समारोह अध्यक्ष श्री जैन ज्योति जी की प्रतिष्ठा मे प्रस्तुत~
***
एक आँख मे दो दो पानी।
एक खुशी,इक करुण कहानी
होती कब पहचान किसी को।
अंतस मे है कौन कहानी।

गोपाल गहमरी साहित्य समारोह-२०
शीर्षक -आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-सम्मान्य Mahesh Jainjyoti जी को समर्पित-
मौन भी मुखर हो जाता है
छंदों की लय में लहराता है
जब हीरे पन्ने सी आँखों में
कोई भाव उतर इठलाता है !
© पारुल
११जुलाई१४

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२०
विषय -आँख /नयन नेत्र
अध्यक्ष =माननीय Mahesh Jainjyoti जी को सादर समर्पित
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साँझ ढले जब आएँगे ..प्रियतम !
श्रृंगार अनुपम शर्माएंगे प्रियतम !
उतावले नयन राह निहारें आकुल ..
हर आहट तुम्हें बताएंगे प्रियतम !!
-------------अलका गुप्ता---------------

शुक्रवार से शनिवार =मुक्तक
विषय -आँख /नयन नेत्र
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२०
अध्यक्ष =माननीय महेश चाँद जैन जी को समर्पित
विधा =मुक्तक
व्यथा बसी जो मेरे उर में तेरे लिए आनंद हुई
अविरल धार नयन निर्झर की तेरे हित मकरंद हुई
मान कवि यशगान किया इतना ही पर ज्ञान मुझे
व्यथा उमड मसि रूप धरे पन्नों पर आकर छंद हुई
-----प्रियंका

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 20,
शीर्षक:-आँखें,नयन,नेत्र आदि
समारोह अध्यक्ष:-माननीय महेश जैन ज्योति जी को सादर समर्पित
हमारा मुक्तक
जब तक आँखें खुली हुई हैं,दुनियाँ शीश झुकाती है ।
जीवन भर हमको साँसों की,सरगम गीत सुनाती है ।
हीरा पन्ना कंचन होती,जब तक आँखें रहें खुलीं,
आँखें बन्द हुईं तो काया,मिट्टी की हो जाती है ।।
सतीश 'मधुप'
घिरोर (मैनपुरी)

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
पहला चरण- हमारा मुक्‍तक --11 जुलाई शुक्रवार प्रात: 10 बजे से 13 जुुलाई प्रात: 10बजे तक
विषय ''-आँखे/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्‍द्र जैन ज्‍योति जी
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ज्यों आँखें मलते उठते हो यों ही भीतर से जागो तुम ॥
मैं आईना हूँ अपने सच से मत बचकर के भागो तुम ॥
क़सीदे से कहीं उम्दा लगे ऐसी रफ़ू मारो ,
फटे दामन को कथरी की तरह मत हाय तागो तुम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२०
विषय -आँख /नयन नेत्र
अध्यक्ष =माननीय Mahesh Jainjyoti जी को सादर समर्पित
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बड़े गहरे नयन तेरे न जाने क्या क्या कहते हैं
कभी गर चोट खाए दिल तो ये चुपचाप बहते हैं
कभी उठते कभी झुकते हाल कह जाते हैं सारा
किसी की याद में जालिम बड़े गुमसुम से रहते हैं
~रमा वर्मा~



श्री गोपल राम गहमरी साहित्य समारोह ~20
अध्यक्ष ~ माननीय श्री महेश चन्द्र जैन ज्योति जी को सादर समर्पित~
विषय~ आँखे ,नयन ,नेत्र आदि
स्नेह नयन प्रीति में बरसे
विन्दु सार जग में रस टपके
रसिक नयन व्याकुल मधुवन में
चंचल नयन चहुं दिश भटके ॥
कुन्दन> जय हिन्द!

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -२ओ
पहला चरण -हमारा मुक्तक-११ जुलाई २०१४ से १३ जुलाई प्रातः तक
विषय :-आँखें/नयन/नेत्र
अध्यक्ष-माननीय महेश चन्द्र ज्योति जी
गुरु पूर्णिमा पर सद्गुरु भगवान के श्री चरणों में कोटिशः नमन के साथ
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नहीं पहुंच पा रही आज,बाबा! मैं तेरे द्वारे;
विवशता है क्षमा करो,बरस रहे नयन हमारे।
तुम हो करुणा-सागर,हम अबोध तेरी संतान ;
बचे रहें सब दोषों से,बरसें सदा आशीष तुम्हारे। ।
मीना मिश्रा
आप सब रचनाकारों का हार्दिक आभार''''''''''''''''''''''''''''''''''''''अखंड गहमरी