इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह संख्या -21 दिनांक 17 से 18 जुलाई प्रथम चरण शिल्प और शिल्प अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के भागीरथी प्रयास से सम्पन्न हुआ हम सभी रचनाकारों का आभार व्यक्त करते हुए आपके स्वस्थ जीवन एंव उज्जवल भविष्य की कामना करते है
इस समारोह में - पुष्पेन्द्र यादव विनय कुमार सिंह "बालि"जी, आलोक मित्त जी, हितेश शर्मा जी,महेश जैन 'ज्योति' जी, रमा वर्मा जी, रजनीश तपन जी,नितिन सिकरवार पागल जी, कान्ती शुक्ला जी, प्रियंका पांडे जी,धीरज श्रीवास्तव जी, सुषमा जोशी दूबे जी, करण एस पी जी, सुनील कुमार जश्न जी, अखंड गहमरी ने हिस्सा लिया आप सब का पुन: हार्दिक आभार
इस समारोह के बिजेता आदरण्ीाय पुष्पेन्द्र यादव जी रहे
इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह संख्या -21 दिनांक 17 से 18 जुलाई प्रथम चरण शिल्प और शिल्प अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के भागीरथी प्रयास से सम्पन्न हुआ हम सभी रचनाकारों का आभार व्यक्त करते हुए आपके स्वस्थ जीवन एंव उज्जवल भविष्य की कामना करते है
इस समारोह में - पुष्पेन्द्र यादव विनय कुमार सिंह "बालि"जी, आलोक मित्त जी, हितेश शर्मा जी,महेश जैन 'ज्योति' जी, रमा वर्मा जी, रजनीश तपन जी,नितिन सिकरवार पागल जी, कान्ती शुक्ला जी, प्रियंका पांडे जी,धीरज श्रीवास्तव जी, सुषमा जोशी दूबे जी, करण एस पी जी, सुनील कुमार जश्न जी, अखंड गहमरी ने हिस्सा लिया आप सब का पुन: हार्दिक आभार
इस समारोह के बिजेता आदरण्ीाय पुष्पेन्द्र यादव जी रहे
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
विधा:- दोहा
शिल्प:- दोहा मात्रिक छंद है, जिसके प्रथम और
तृतीय चरण में 13-13 एवं द्वितीय
एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
- श्रावण मास, भगवान शिव और पावस ऋतु पर केन्द्रित कुछ दोहे प्रस्तुत हैं...
*************************
आशुतोष अवधूत शिव, हर-हर भोलेनाथ।
नीलकंठ मर्दन-मदन, बंदहुं पद धरि माथ।।
त्याग तपस्या साधना, शिव जीवन के मूल।
परहित विषपायी बने, चुने जगत के शूल।।
पावस की हर बूँद ज्यो, मेरे उर की पीर।
बंजारा बादल बना, मनवा हुआ अधीर।।
पिय के हिय की हे सखी, मैं जानूँ हर बात।
मन डरपत सुनि घनगरज, कठिन विरह की रात।।
रतनारे लोचन सजल, हृदय अनकही पीर।
बिन प्रियतम लू सम लगे, शीतल मंद समीर।।
- पुष्पेन्द्र यादव
Vinay Kumar Singh
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
विधा:- दोहा
शिल्प:- दोहा मात्रिक छंद है, जिसके प्रथम और
तृतीय चरण में 13-13 एवं द्वितीय
एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
- श्रावण मास, भगवान शिव और पावस ऋतु पर केन्द्रित कुछ दोहे प्रस्तुत हैं...
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आशुतोष अवधूत शिव, हर-हर भोलेनाथ।
नीलकंठ मर्दन-मदन, बंदहुं पद धरि माथ।।
त्याग तपस्या साधना, शिव जीवन के मूल।
परहित विषपायी बने, चुने जगत के शूल।।
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
विधा:- दोहा
शिल्प:- दोहा मात्रिक छंद है, जिसके प्रथम और
तृतीय चरण में 13-13 एवं द्वितीय
एवं चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
- श्रावण मास, भगवान शिव और पावस ऋतु पर केन्द्रित कुछ दोहे प्रस्तुत हैं...
*************************
आशुतोष अवधूत शिव, हर-हर भोलेनाथ।
नीलकंठ मर्दन-मदन, बंदहुं पद धरि माथ।।
त्याग तपस्या साधना, शिव जीवन के मूल।
परहित विषपायी बने, चुने जगत के शूल।।
पावस की हर बूँद ज्यो, मेरे उर की पीर।
बंजारा बादल बना, मनवा हुआ अधीर।।
पिय के हिय की हे सखी, मैं जानूँ हर बात।
मन डरपत सुनि घनगरज, कठिन विरह की रात।।
रतनारे लोचन सजल, हृदय अनकही पीर।
बिन प्रियतम लू सम लगे, शीतल मंद समीर।।
- पुष्पेन्द्र यादव
बंजारा बादल बना, मनवा हुआ अधीर।।
पिय के हिय की हे सखी, मैं जानूँ हर बात।
मन डरपत सुनि घनगरज, कठिन विरह की रात।।
रतनारे लोचन सजल, हृदय अनकही पीर।
बिन प्रियतम लू सम लगे, शीतल मंद समीर।।
- पुष्पेन्द्र यादव
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण- शिल्प/शिल्पी
विद्या- गीत/गजल
मापनी-1222,1222,1222,...........
काफिया- 'आना'
रदीफ- 'वही'
अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के सन्मुख अर्पित।
विद्या- गीत/गजल
मापनी-1222,1222,1222,...........
काफिया- 'आना'
रदीफ- 'वही'
अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी के सन्मुख अर्पित।
'दिल' ढूंढता है, फिर से फसाना वही,
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
जब पहली नजर का हुआ था असर
खता थी न मेरी , न उनको खबर ।
वो जो आलम इशारों का होने लगा
मुहब्बत की बजने लगी जब गजर ।।
उनकी गलियों में फिर आना जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
वो हमे देखकर मुस्कुराने लगे
मेरे ख्वाबों में भी रोज आने लगे।
वो चाहत का पल जो हंसी कम न था
कर इशारा हमे जब बुलाने लगे।।
उनका खिड़की से पर्दा उठाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
इजहारे 'मुहब्बत' जो हमने किया
इकरारे 'करम' फिर उनका हुआ।
जिंदगानी की रंगत बदल सी गयी
मेरी बाँहों में आना जो उनका हुआ।।
इक दूजे में फिर खो जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
दिल ढूंढता है फिर से फसाना वही।।...........
विनय कुमार सिंह "बालि"
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
जब पहली नजर का हुआ था असर
खता थी न मेरी , न उनको खबर ।
वो जो आलम इशारों का होने लगा
मुहब्बत की बजने लगी जब गजर ।।
उनकी गलियों में फिर आना जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
वो हमे देखकर मुस्कुराने लगे
मेरे ख्वाबों में भी रोज आने लगे।
वो चाहत का पल जो हंसी कम न था
कर इशारा हमे जब बुलाने लगे।।
उनका खिड़की से पर्दा उठाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
इजहारे 'मुहब्बत' जो हमने किया
इकरारे 'करम' फिर उनका हुआ।
जिंदगानी की रंगत बदल सी गयी
मेरी बाँहों में आना जो उनका हुआ।।
इक दूजे में फिर खो जाना वही
रूठने की अदा वो, मनाना वही ।
दिल ढूंढता है फिर से फसाना वही।।...........
विनय कुमार सिंह "बालि"
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--21
अध्यक्षा आरणीया गीता वर्मा जी के समक्ष मेरी एक कोशिश
-----------------------------------------------
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी - ग़ज़ल
अध्यक्षा आरणीया गीता वर्मा जी के समक्ष मेरी एक कोशिश
-----------------------------------------------
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी - ग़ज़ल
2 1 2 2 -1 2 1 2 -2 2
फ़ायलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन
काफिया -- आब
रदीफ़ -- कितने थे
भेजे जो वो गुलाब कितने थे
देखे तो वो नवाब कितने थे
हमने पूछा सवाल जब उनसे
पास उनके जवाब कितने थे
चाह कर भी न मुस्कराए वो
सोच उन पर अजाब कितने थे
आज भी याद कर रहा हूँ वो
उनकी आँखों में ख्वाब कितने थे
जिंदगी का भरोसा क्या है जब
रोग उनके खराब कितने थे
रोज उनका उधार लेना था
जाने उनके हिसाब कितने थे
----"आलोक"----
फ़ायलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन
काफिया -- आब
रदीफ़ -- कितने थे
भेजे जो वो गुलाब कितने थे
देखे तो वो नवाब कितने थे
हमने पूछा सवाल जब उनसे
पास उनके जवाब कितने थे
चाह कर भी न मुस्कराए वो
सोच उन पर अजाब कितने थे
आज भी याद कर रहा हूँ वो
उनकी आँखों में ख्वाब कितने थे
जिंदगी का भरोसा क्या है जब
रोग उनके खराब कितने थे
रोज उनका उधार लेना था
जाने उनके हिसाब कितने थे
----"आलोक"----
गोपाल राम गहमरी समारोह - 21
प्रथम चरण - शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आदरणीया Geeta Verma जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें।
विधा - मत्तगयन्द सवैया
प्रथम चरण - शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आदरणीया Geeta Verma जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें।
विधा - मत्तगयन्द सवैया
शिल्प - यह चार पंक्तियों का मात्रिक छंद है जिसमें हर पंक्ति में सात भगण
व अन्त में दो गुरु होते हैं। अर्थात् हर पंक्ति में वर्णक्रम निम्न
प्रकार होता है:
भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गागा।
रचना की भूमि -
श्री कृष्ण के जन्म प्रसंग को तीन सवैयों में व्यक्त किया है। तीनों सवैयों की अन्तिम पंक्ति को स्थायी रखने का प्रयोग भी है रचना में।
रचना:
जन्म लियो घनघोर निसा खुलि वज्र कपाट गये अति भारी।
देवकि सों वसुदेव कहैं अब आइ गये दिन हैं सुखकारी।
पन्थ बनाय दईं जमुना अरु शेष करैं प्रभु की रखवारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
नन्द दुआर जुरी सखि भीर भये अति हर्षित गाँव जँवारी।
आँगन सोहर गूँजि रहे सब ग्वालिनि गाय रहीं सुकुमारी।
मातु जसोमति देखि रहीं मुसकाय रहें पलना त्रिपुरारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
शीतल मन्द बयार झुलाय रही झुलना किलकैं बनवारी।
नाचत मस्त मयूर खिले सब फूल सखी महकी फुलवारी।
बाल गुपाल निहाल प्रसन्न कदम्ब हँसैं वृषभानुकुमारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
- हितेश शर्मा "पथिक"
Mahesh Jainjyoti
भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गागा।
रचना की भूमि -
श्री कृष्ण के जन्म प्रसंग को तीन सवैयों में व्यक्त किया है। तीनों सवैयों की अन्तिम पंक्ति को स्थायी रखने का प्रयोग भी है रचना में।
रचना:
जन्म लियो घनघोर निसा खुलि वज्र कपाट गये अति भारी।
देवकि सों वसुदेव कहैं अब आइ गये दिन हैं सुखकारी।
पन्थ बनाय दईं जमुना अरु शेष करैं प्रभु की रखवारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
नन्द दुआर जुरी सखि भीर भये अति हर्षित गाँव जँवारी।
आँगन सोहर गूँजि रहे सब ग्वालिनि गाय रहीं सुकुमारी।
मातु जसोमति देखि रहीं मुसकाय रहें पलना त्रिपुरारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
शीतल मन्द बयार झुलाय रही झुलना किलकैं बनवारी।
नाचत मस्त मयूर खिले सब फूल सखी महकी फुलवारी।
बाल गुपाल निहाल प्रसन्न कदम्ब हँसैं वृषभानुकुमारी।
कौन भला बिधि बाँचि सकूँ मनमोहन की महिमा अति न्यारी।।
- हितेश शर्मा "पथिक"
Mahesh Jainjyoti
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
--------
विधा:- घनाक्षरी छंद
शिल्प:- 47मात्रिक छंद । रगण 212
एवम् जगण 121 की क्रमागत 5
आवृत्तियाँ व अँत में एक गुरू ।
------------------------
बाग में कली कहीं जहाँ उगें
नहीं कहो न ,
कौन से उपाय से खिलें
प्रसून डाल के ।
टूट जाँय तार जो सितार के
बजे कभी न ,
ढोल फूट जो गया बजें न
बोल ताल के ।
जो न बेटियाँ रहीं वधू मिले
कहीं न सोच ,
क्या जवाब दीजिये सपूत के
सवाल के ।
बेटियाँ हवा समान भावनी
सुहावनीय ,
मारिये कभी न 'ज्योति 'पालिये
सँभाल के ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
***
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आद.
गीता वर्मा जी के प्रति...
--------
विधा:- घनाक्षरी छंद
शिल्प:- 47मात्रिक छंद । रगण 212
एवम् जगण 121 की क्रमागत 5
आवृत्तियाँ व अँत में एक गुरू ।
------------------------
बाग में कली कहीं जहाँ उगें
नहीं कहो न ,
कौन से उपाय से खिलें
प्रसून डाल के ।
टूट जाँय तार जो सितार के
बजे कभी न ,
ढोल फूट जो गया बजें न
बोल ताल के ।
जो न बेटियाँ रहीं वधू मिले
कहीं न सोच ,
क्या जवाब दीजिये सपूत के
सवाल के ।
बेटियाँ हवा समान भावनी
सुहावनीय ,
मारिये कभी न 'ज्योति 'पालिये
सँभाल के ।
***
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
***
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-21
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आ.गीता वर्मा जी को समर्पित
==================================
विधा - गज़ल
मापनी/बहर --१२२२ / १२२२/ १२२२/ १२२२
काफ़िया --आया
रदीफ़ - नहीं करते
******************************************************
प्रथम चरण:- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा आ.गीता वर्मा जी को समर्पित
==================================
विधा - गज़ल
मापनी/बहर --१२२२ / १२२२/ १२२२/ १२२२
काफ़िया --आया
रदीफ़ - नहीं करते
******************************************************
सितमगर जिंदगी पर यूँ सितम ढाया नहीं करते !
किया है प्यार तो फिर जान तडफाया नहीं करते !!१!!
मिटाना चाहते हो फासले तो पास आ जाओ !
खयालों में सताकर प्यार को पाया नहीं करते !!२!!
हमारी ख्वाहिशें हम मर मिटें तेरी पनाहों में !
किसी की चाहतों को यार ठुकराया नहीं करते !!३!!
सुहाना सा समां है पर नजारे हैं बड़े गुमशुम !
विरह के गीत सावन में कभी गाया नहीं करते !!४!!
जमाने ने दिया जो जख्म वो ताजा हुआ फिर से !
लुटा है दिल सरे बाजार बतलाया नहीं करते !!५!!
फसाने जिंदगी के किस तरह तुमको सुनायें हम !
चुराकर चाँद को घर बार दमकाया नहीं करते !!६!!
चले आओ जुदाई डस रही मेरे खयालों को !
किसी के ख्वाब पर हक यार जतलाया नहीं करते !!७!!
~रमा वर्मा~
किया है प्यार तो फिर जान तडफाया नहीं करते !!१!!
मिटाना चाहते हो फासले तो पास आ जाओ !
खयालों में सताकर प्यार को पाया नहीं करते !!२!!
हमारी ख्वाहिशें हम मर मिटें तेरी पनाहों में !
किसी की चाहतों को यार ठुकराया नहीं करते !!३!!
सुहाना सा समां है पर नजारे हैं बड़े गुमशुम !
विरह के गीत सावन में कभी गाया नहीं करते !!४!!
जमाने ने दिया जो जख्म वो ताजा हुआ फिर से !
लुटा है दिल सरे बाजार बतलाया नहीं करते !!५!!
फसाने जिंदगी के किस तरह तुमको सुनायें हम !
चुराकर चाँद को घर बार दमकाया नहीं करते !!६!!
चले आओ जुदाई डस रही मेरे खयालों को !
किसी के ख्वाब पर हक यार जतलाया नहीं करते !!७!!
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -21
प्रथम चरण
हमारा रविवार
विधा ~गीत
मुखड़े तथा सभी पूरक पँक्तियोँ का मात्रा भार~16 -16
मुखड़े का तुकांत~आना भी है
अंतरोँ का तुकांत क्रमशः निम्न प्रकार है~1-आलू देखो,2-एंशन है,3-आन बिकेँगे,4-देखेँगे,5-अत बदली
समारोह अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी की प्रतिष्ठा मे~<>
खाना और बचाना भी है।
सारे फर्ज निभाना भी है।
1-
मँहगा होता आलू देखो।
फिसले जैसे बालू देखो।
दुनिया भर मे यही तमाशा।
रहे हमेशा ,चालू देखो।
रो,रो कर मुस्काना भी है।
सारे फर्ज.....
2-
फीस किताबोँ का,टेँशन है।
गयी नौकरी बस पेँशन है।
तन की हालत बिगड़ी बिगड़ी,
बिला वजह का संस्पेँशन है।
सोचा तो,पछताना भी है।
सारे फर्ज....
3-
खेत बिके,खलिहाल बिकेँगे।
घर के सब सामान बिकेँगे।
अगर जरूरत आन पड़ी तो,
दुनिया मे ईमान बिकेंगे।
आखिर शान बचाना भी है।
सारे फर्ज....
4-
सुख के लम्हे कब देखेँगे।
आज नही,अब कल देखेँगे।
अभी भरोसा किस्मत पर है,
जब देखेँगे, तब देखेँगे।
रुकते क्योँ हो,जाना भी है।
सारे फर्ज....
5-
आज तपन की हालत बदली।
दर्पन देखा,सूरत बदली।
समय सभी है देखा मैने ।
क्या करता मै,किस्मत बदली।
मन को आस दिलाना भी है।
सारे फर्ज ...।
प्रथम चरण
हमारा रविवार
विधा ~गीत
मुखड़े तथा सभी पूरक पँक्तियोँ का मात्रा भार~16 -16
मुखड़े का तुकांत~आना भी है
अंतरोँ का तुकांत क्रमशः निम्न प्रकार है~1-आलू देखो,2-एंशन है,3-आन बिकेँगे,4-देखेँगे,5-अत बदली
समारोह अध्यक्षा आदरणीया गीता वर्मा जी की प्रतिष्ठा मे~<>
खाना और बचाना भी है।
सारे फर्ज निभाना भी है।
1-
मँहगा होता आलू देखो।
फिसले जैसे बालू देखो।
दुनिया भर मे यही तमाशा।
रहे हमेशा ,चालू देखो।
रो,रो कर मुस्काना भी है।
सारे फर्ज.....
2-
फीस किताबोँ का,टेँशन है।
गयी नौकरी बस पेँशन है।
तन की हालत बिगड़ी बिगड़ी,
बिला वजह का संस्पेँशन है।
सोचा तो,पछताना भी है।
सारे फर्ज....
3-
खेत बिके,खलिहाल बिकेँगे।
घर के सब सामान बिकेँगे।
अगर जरूरत आन पड़ी तो,
दुनिया मे ईमान बिकेंगे।
आखिर शान बचाना भी है।
सारे फर्ज....
4-
सुख के लम्हे कब देखेँगे।
आज नही,अब कल देखेँगे।
अभी भरोसा किस्मत पर है,
जब देखेँगे, तब देखेँगे।
रुकते क्योँ हो,जाना भी है।
सारे फर्ज....
5-
आज तपन की हालत बदली।
दर्पन देखा,सूरत बदली।
समय सभी है देखा मैने ।
क्या करता मै,किस्मत बदली।
मन को आस दिलाना भी है।
सारे फर्ज ...।
(कहीँ कहीँ मात्रा पतन संभव)
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--21
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी ।।
विधा- गजल,
मापनी- १२२२, १२२२, १२२२, १२२.
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी ।।
विधा- गजल,
मापनी- १२२२, १२२२, १२२२, १२२.
काफ़िया- आ,
रदीफ़- कर.
अध्यक्षा---आरणीया गीता वर्मा जी के सम्मुख सादर..
नहीं हूँ अब तुम्हारी मैं मुझे इतना बता कर,
बहुत रोई वो अपने हाथों की मेंहदी दिखा कर।
तुम्हारी हर निशानी छीन ली ज़ालिम जहाँ ने,
मुझे ढांपा नए कपडे नए ज़ेवर उढ़ा कर।
बहुत मजबूर हूँ कोई बता दे क्या करूँ मैं,
किसी का प्यार हूँ कोई चला दुल्हन बना कर।
दबी शहनाइयों की गूँज में दिल की सदायें,
मैं करती भी तो क्या करती कोई हल्ला मचा कर।
बहुत सुन्दर सजाया अर्थी को लोगों ने मेरी,
कहारों से कहा फिर ले चलो डोली उठा कर।
सुनो 'पागल' तुम्हारी ख्वाहिशों को विधवा कर के,
मुझे वर ले गया वो माँग सिन्दूरी सजा कर।
नितिन सिकरवार 'पागल'
रदीफ़- कर.
अध्यक्षा---आरणीया गीता वर्मा जी के सम्मुख सादर..
नहीं हूँ अब तुम्हारी मैं मुझे इतना बता कर,
बहुत रोई वो अपने हाथों की मेंहदी दिखा कर।
तुम्हारी हर निशानी छीन ली ज़ालिम जहाँ ने,
मुझे ढांपा नए कपडे नए ज़ेवर उढ़ा कर।
बहुत मजबूर हूँ कोई बता दे क्या करूँ मैं,
किसी का प्यार हूँ कोई चला दुल्हन बना कर।
दबी शहनाइयों की गूँज में दिल की सदायें,
मैं करती भी तो क्या करती कोई हल्ला मचा कर।
बहुत सुन्दर सजाया अर्थी को लोगों ने मेरी,
कहारों से कहा फिर ले चलो डोली उठा कर।
सुनो 'पागल' तुम्हारी ख्वाहिशों को विधवा कर के,
मुझे वर ले गया वो माँग सिन्दूरी सजा कर।
नितिन सिकरवार 'पागल'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह - २१
प़थम चरण -शब्द और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा-आदरणीया गीता वर्मा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
मापनी - 2122 1222 1222 2
काफ़िया -अत
रदीफ़ -क्यों है
प़थम चरण -शब्द और शिल्पी
समारोह अध्यक्षा-आदरणीया गीता वर्मा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
मापनी - 2122 1222 1222 2
काफ़िया -अत
रदीफ़ -क्यों है
बेरुख़ी से तेरी मुझको रफ़ाक़त क्यों है ।
बेवफ़ा वक़्त में एहसास की दौलत क्यों है ।
सोच मेरी है ,जुबां मेरी , तसव्वुर मेरा
फिर भी इजहारे-हक़ीक़त से दहशत क्यों है ।
चाँदनी चुपके से दस्तक है दिल पे दे जाती
मेरी रातों के अँधेरों पे इनायत क्यों है ।
आईना चाँद का , फुर्क़त , ये अक्स यादों के
आज माजी के नजारों में नफासत क्यों है ।
यकीने-वाहमी के फूल तो मुरझा ही गए
मेरे दामन में अब ख़ारों की नियामत क्यों है ।
कान्ति शुक्ला
( रफाकत = मैत्री भाव , फुर्कत = वियोग , अक्स =चित्र , माजी =अतीत ,नफासत =स्वच्छता , यकीने-वाहमी = पारस्परिक विश्वास ,नियामत = अनुग्रह )
बेवफ़ा वक़्त में एहसास की दौलत क्यों है ।
सोच मेरी है ,जुबां मेरी , तसव्वुर मेरा
फिर भी इजहारे-हक़ीक़त से दहशत क्यों है ।
चाँदनी चुपके से दस्तक है दिल पे दे जाती
मेरी रातों के अँधेरों पे इनायत क्यों है ।
आईना चाँद का , फुर्क़त , ये अक्स यादों के
आज माजी के नजारों में नफासत क्यों है ।
यकीने-वाहमी के फूल तो मुरझा ही गए
मेरे दामन में अब ख़ारों की नियामत क्यों है ।
कान्ति शुक्ला
( रफाकत = मैत्री भाव , फुर्कत = वियोग , अक्स =चित्र , माजी =अतीत ,नफासत =स्वच्छता , यकीने-वाहमी = पारस्परिक विश्वास ,नियामत = अनुग्रह )
* गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21,
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत*
विधा- दुर्मिल सवैया या चन्द्रकला छंद
लक्षण- आठ सगण, वर्ड संख्या 24
प्रथम दो छंद में तुकांत अरु
तीसरे छंद में तुकान्त अरो
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत*
विधा- दुर्मिल सवैया या चन्द्रकला छंद
लक्षण- आठ सगण, वर्ड संख्या 24
प्रथम दो छंद में तुकांत अरु
तीसरे छंद में तुकान्त अरो
मन के सब संशय छोडि सकूँ अब ये भवसागर पार करूँ
पल बीत रहा घटते दिन देख दुखी मन भीतर आज जरुं
तजि जाल बवाल सभी अब मैं प्रभु पावन नामहि आस धरुं
इस जीवन से कुछ लाभ लिया नहि आगम से भगवान् डरूं
प्रभु नाम लिया नहि सोच रहा भवसागर में नहि जाय परूँ
अब आपन दोष कहूँ किससे प्रभु आपहि नाम सहाय करूँ
प्रभुआपन आज बिसारि सकूँ मनमानस तोहि बसाय मरुँ
जग के सगरे विष छोड़ सकूँ मनभावन हाथ प्रसाद धरुं
प्रभु आय बसों मन में हमरे मन आँगन पावन आज करो
मन गागर रीत रहा कब से अब पावन वारिहि डारि भरो
बन कोमल मोहक पावन सी अनमोल सुगंध सुवास झरो
रट लागि रही तुमरे जप की अब मानस भीतर धाम धरो
~~~~~~प्रियंका
पल बीत रहा घटते दिन देख दुखी मन भीतर आज जरुं
तजि जाल बवाल सभी अब मैं प्रभु पावन नामहि आस धरुं
इस जीवन से कुछ लाभ लिया नहि आगम से भगवान् डरूं
प्रभु नाम लिया नहि सोच रहा भवसागर में नहि जाय परूँ
अब आपन दोष कहूँ किससे प्रभु आपहि नाम सहाय करूँ
प्रभुआपन आज बिसारि सकूँ मनमानस तोहि बसाय मरुँ
जग के सगरे विष छोड़ सकूँ मनभावन हाथ प्रसाद धरुं
प्रभु आय बसों मन में हमरे मन आँगन पावन आज करो
मन गागर रीत रहा कब से अब पावन वारिहि डारि भरो
बन कोमल मोहक पावन सी अनमोल सुगंध सुवास झरो
रट लागि रही तुमरे जप की अब मानस भीतर धाम धरो
~~~~~~प्रियंका
*
गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21, विधा-गीत। मुखड़े एवं
पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत -ईत सखी। प्रत्येक अंतरे का तुकांत
क्रमश:-1-अहक रहा।2-आती है।3-ओड़ दिया।4-एल नहीँ। प्रत्येक पंक्तियोँ का
मात्राभार -16 - 14 के क्रम पर। समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी की
प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत*
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रोज रात आँखोँ मेँ आकर
करता नृत्य अतीत सखी!
एक बहुत ही दिल से प्यारा
मेरा भी था मीत सखी!
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रोज रात आँखोँ मेँ आकर
करता नृत्य अतीत सखी!
एक बहुत ही दिल से प्यारा
मेरा भी था मीत सखी!
याद अभी तक प्रथम छुअन है
तन मन अब तक महक रहा!
सुर्ख लबोँ से जहाँ छुआ था
सच कहती हूँ दहक रहा!
जैसे बात अभी कल की पर
गया साल भर बीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
मुझको जब ये धवल चाँदनी
आँगन मेँ नहलाती है!
महक साँस मेँ तब पुरवाई
उसकी लेकर आती है!
उर से निकल रागिनी भी फिर
गा उठती है गीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
लोक लाज के कारण मैँने
उसके दिल को तोड़ दिया!
आना जाना राह से उसकी
बिल्कुल मैँने छोड़ दिया!
चुपके चुपके आँसू बनकर
बहती है अब प्रीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
कहने वाले सच कहते हैँ
भाग्य बिना है मेल नहीँ!
आज समझ मेँ आया मुझको
प्यार प्यार है खेल नहीँ!
जीत उसे मैँ हार गयी वो
गया हारकर जीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव
ए - 259 संचार विहार कालोनी मनकापुर गोँडा उ.प्र पिन- 271308
फोन - 08858001681
तन मन अब तक महक रहा!
सुर्ख लबोँ से जहाँ छुआ था
सच कहती हूँ दहक रहा!
जैसे बात अभी कल की पर
गया साल भर बीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
मुझको जब ये धवल चाँदनी
आँगन मेँ नहलाती है!
महक साँस मेँ तब पुरवाई
उसकी लेकर आती है!
उर से निकल रागिनी भी फिर
गा उठती है गीत सखी!
एक बहुत ही दिल.....
लोक लाज के कारण मैँने
उसके दिल को तोड़ दिया!
आना जाना राह से उसकी
बिल्कुल मैँने छोड़ दिया!
चुपके चुपके आँसू बनकर
बहती है अब प्रीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
कहने वाले सच कहते हैँ
भाग्य बिना है मेल नहीँ!
आज समझ मेँ आया मुझको
प्यार प्यार है खेल नहीँ!
जीत उसे मैँ हार गयी वो
गया हारकर जीत सखी!
एक बहुत ही दिल से.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव
ए - 259 संचार विहार कालोनी मनकापुर गोँडा उ.प्र पिन- 271308
फोन - 08858001681
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--21
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्द/रचना
अध्यक्ष---आरणीया गीता वर्मा जी ...
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्द/रचना
अध्यक्ष---आरणीया गीता वर्मा जी ...
कह-मुकरी विधा
कह-मुकरी मूलतः दो सखियों के बीच की वार्ता पर आधारित विधा है । इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में १५ या १६ मात्राएँ होती हैं । इसके प्रथम तीन चरणों में एक सखी द्वारा दूसरी सखी से अपने साजन के कुछ लक्षण बताए जाते हैं, उन लक्षणों को सुनकर दूसरी सखी द्वारा पहली सखी से उत्तरविषयक (ए सखि साजन ?) प्रश्न किया जाता है और तब पहली सखि लजाकर अपने कहे से मुकर जाती है तथा साजन के बजाय कहे लक्षणों से मिलता-जुलता कुछ और उत्तर दे देती है ।
मात्रा भार -
लघु जिस पर कोई मात्रा न हो या छोटी मात्रा हो एक मात्रा गिनी जायेगी। गुरु यानी बड़ी मात्रा, इसकी २ मात्राएँ गिनी जांयेंगीं
इस विधा पर अमीर खुसरो द्वारा सर्वाधिक काम किया गया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की।
तारे गिन गिन रातें कटती
बिन उसके ना सुबहे होती
सारे दिन लगाता चक्कर
क्या सखि साजन ??
नहीं दिवाकर !! $ 1 $
तन मन को वो बहका जाये
सोचूँ तो नैना झुक जाये
मिल जाये तो रच दूँ गीत
के सखि साजन ?????
ना सखि प्रीत। ........ $ 2 $
उससे ही सांसो के तार
वो ही जीवन का आधार
उस बिना ना जाये जिया
क्या सखि साजन ???
न सखि हिया .......... $ 3 $
देख देख उसको शरमाऊँ
बिन उसके घर सूना सूना
सुख दुःख सारे उसको अर्पण
क्या सखि साजन ???
ना सखि दर्पण। .... $ 4 $
रंग रँगीली है वो सुन्दर
झांके वो घूँघट से बाहर
ले जाये साजन की निंदिया
ऐ सखि सजनी ??
ना री बिंदिया !! $ 5 $
सुषमा दुबे
कह-मुकरी मूलतः दो सखियों के बीच की वार्ता पर आधारित विधा है । इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में १५ या १६ मात्राएँ होती हैं । इसके प्रथम तीन चरणों में एक सखी द्वारा दूसरी सखी से अपने साजन के कुछ लक्षण बताए जाते हैं, उन लक्षणों को सुनकर दूसरी सखी द्वारा पहली सखी से उत्तरविषयक (ए सखि साजन ?) प्रश्न किया जाता है और तब पहली सखि लजाकर अपने कहे से मुकर जाती है तथा साजन के बजाय कहे लक्षणों से मिलता-जुलता कुछ और उत्तर दे देती है ।
मात्रा भार -
लघु जिस पर कोई मात्रा न हो या छोटी मात्रा हो एक मात्रा गिनी जायेगी। गुरु यानी बड़ी मात्रा, इसकी २ मात्राएँ गिनी जांयेंगीं
इस विधा पर अमीर खुसरो द्वारा सर्वाधिक काम किया गया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की।
तारे गिन गिन रातें कटती
बिन उसके ना सुबहे होती
सारे दिन लगाता चक्कर
क्या सखि साजन ??
नहीं दिवाकर !! $ 1 $
तन मन को वो बहका जाये
सोचूँ तो नैना झुक जाये
मिल जाये तो रच दूँ गीत
के सखि साजन ?????
ना सखि प्रीत। ........ $ 2 $
उससे ही सांसो के तार
वो ही जीवन का आधार
उस बिना ना जाये जिया
क्या सखि साजन ???
न सखि हिया .......... $ 3 $
देख देख उसको शरमाऊँ
बिन उसके घर सूना सूना
सुख दुःख सारे उसको अर्पण
क्या सखि साजन ???
ना सखि दर्पण। .... $ 4 $
रंग रँगीली है वो सुन्दर
झांके वो घूँघट से बाहर
ले जाये साजन की निंदिया
ऐ सखि सजनी ??
ना री बिंदिया !! $ 5 $
सुषमा दुबे
गोपाल राम गहमरी 'शिल्प शिल्पी' साहित्यिक समारोह- 21
विधा- गीत
शिल्प विधान- मुखडे की सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरोँ की सभी पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/16
तुकान्त विधान- मुखडे का तुकान्त- ओड दिया।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- आरे।
2- ई है।
3- अंक हो गया।
ँँँ
समारोह अध्यक्षा सम्मान्य आदरणीया ''गीत वर्मा'' जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
प्रेम प्रकृति का पावन बंधन, आत्म सुखोँ से जोड दिया।
ऋतु पावस का मस्त झकोरा, पिया पंथ रुख मोड दिया।
विधा- गीत
शिल्प विधान- मुखडे की सभी पूरक पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
अंतरोँ की सभी पंक्तियोँ का मात्राभार- 16/16
तुकान्त विधान- मुखडे का तुकान्त- ओड दिया।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- आरे।
2- ई है।
3- अंक हो गया।
ँँँ
समारोह अध्यक्षा सम्मान्य आदरणीया ''गीत वर्मा'' जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
प्रेम प्रकृति का पावन बंधन, आत्म सुखोँ से जोड दिया।
ऋतु पावस का मस्त झकोरा, पिया पंथ रुख मोड दिया।
धूर्त नयन उर हंस निहारेँ,
गगन मेघ से झरत फुहारे।
बागोँ मे मोरोँ की बोली,
कर हिय घाव जिया को जारेँ।
दादुर की वह टर्र टर्र ने,
विरह राग मन जोड दिया।
ऋतु.....(1)
मधुमासोँ नें दस्तक दी है,
वर्षा कर श्रंगार सजी है।
हरित धरा भी आज मचलकर,
ले अनंग को साथ खडी है।
व्योम दामिनी की दमको ने,
तन मन सब झंझोड दिया।
ऋतु.....(2)
अंग दहन जस लंक हो गया,
रक्त चाप भी रंक हो गया।
भीग गयी थी तपित श्वाँस से,
दाहित मन अब पंक हो गया।
स्वप्न सुखोँ के ओज बिन्दु नेँ,
शीर्ष शिथिल तन छोड दिया।
ऋतु......(3)
ँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
गगन मेघ से झरत फुहारे।
बागोँ मे मोरोँ की बोली,
कर हिय घाव जिया को जारेँ।
दादुर की वह टर्र टर्र ने,
विरह राग मन जोड दिया।
ऋतु.....(1)
मधुमासोँ नें दस्तक दी है,
वर्षा कर श्रंगार सजी है।
हरित धरा भी आज मचलकर,
ले अनंग को साथ खडी है।
व्योम दामिनी की दमको ने,
तन मन सब झंझोड दिया।
ऋतु.....(2)
अंग दहन जस लंक हो गया,
रक्त चाप भी रंक हो गया।
भीग गयी थी तपित श्वाँस से,
दाहित मन अब पंक हो गया।
स्वप्न सुखोँ के ओज बिन्दु नेँ,
शीर्ष शिथिल तन छोड दिया।
ऋतु......(3)
ँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह 21
गीता वर्मा जी को समर्पित
एक गीत का प्रयास । मापनी .मुफाईलुन चार बार 1222 चार बार ।ज़िहाफत के साथ
गीता वर्मा जी को समर्पित
एक गीत का प्रयास । मापनी .मुफाईलुन चार बार 1222 चार बार ।ज़िहाफत के साथ
.मुखडा
किया वादा निभाऊँगा ,मैँ वापस लौट आऊँगा
लगाऊँगा तुझे सीने तुझे दुल्हन बनाऊँगा
.
प्रथम अँतरा
चरागोँ का सफर भी है अँधेरोँ की नज़र भी है
तुझे जो आग तड़पाये मिरी जानम इधर भी है
सराबोँ की गली से भी मैँ सावन खीँच लाऊँगा
किया वादा ...
अँतरा 2
वही मँदिर की दहलीजेँ तिरा झुकता हुआ माथा
भरे नयनोँ की स्याही से ह्रदय लिखता वही गाथा
वही मजबूरियाँ वापस तुझे ना फिर सुनाऊँगा
किया वादा ...
.
.अँतरा 3
पड़े थे कब से खाली ये नगर सूने तमन्ना के
सजे हैँ आज पलकोँ पर गुहर कितने तमन्ना के
यही मरती हुई हसरत मुहब्बत फिर जगाऊँगा
किया वादा निभाऊँगा ..
जश्न
गुहर _मोती
सराब_मृगमरीचिका , जलका भ्रम
किया वादा निभाऊँगा ,मैँ वापस लौट आऊँगा
लगाऊँगा तुझे सीने तुझे दुल्हन बनाऊँगा
.
प्रथम अँतरा
चरागोँ का सफर भी है अँधेरोँ की नज़र भी है
तुझे जो आग तड़पाये मिरी जानम इधर भी है
सराबोँ की गली से भी मैँ सावन खीँच लाऊँगा
किया वादा ...
अँतरा 2
वही मँदिर की दहलीजेँ तिरा झुकता हुआ माथा
भरे नयनोँ की स्याही से ह्रदय लिखता वही गाथा
वही मजबूरियाँ वापस तुझे ना फिर सुनाऊँगा
किया वादा ...
.
.अँतरा 3
पड़े थे कब से खाली ये नगर सूने तमन्ना के
सजे हैँ आज पलकोँ पर गुहर कितने तमन्ना के
यही मरती हुई हसरत मुहब्बत फिर जगाऊँगा
किया वादा निभाऊँगा ..
जश्न
गुहर _मोती
सराब_मृगमरीचिका , जलका भ्रम
गोपालराम गहमरी "शब्द शिल्पी" साहित्य समारोह - 21,
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी एवं समस्त मंच तथा गुरूजनों को समर्पित
विधा ---गजल
काफिया --ओने
रदीफ --नहीं देती
बहर -
1222 1222 1222 1222
किसी की याद रातो मे हमें सोने नहीं देती
कसम उसने दिया था जो हमे रोने नहीं देती
समारोह अध्यक्षा आदरणीय गीत वर्मा जी एवं समस्त मंच तथा गुरूजनों को समर्पित
विधा ---गजल
काफिया --ओने
रदीफ --नहीं देती
बहर -
1222 1222 1222 1222
किसी की याद रातो मे हमें सोने नहीं देती
कसम उसने दिया था जो हमे रोने नहीं देती
चली थी साथ मेरे जो कभी इक हमसफर बन कर
न जाने पास अपने क्यों हमें होने नहीं देती
सिखाया था हमें जिसने जमाने में रहें कैसे
वही अब प्यार भी हमको वहाँ बोने नहीं देती
नहीं है प्यार मुझसे अब मगर नफरत जरा देखो
किसी को लाश भी मेरी वो अब ढोने नहीं देती
हमारे गीत में छुपकर हमेशा वो चली आती
बने आवाज दिल की सुर हमें खोने नही़ं देती
अखंड गहमरी
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न जाने पास अपने क्यों हमें होने नहीं देती
सिखाया था हमें जिसने जमाने में रहें कैसे
वही अब प्यार भी हमको वहाँ बोने नहीं देती
नहीं है प्यार मुझसे अब मगर नफरत जरा देखो
किसी को लाश भी मेरी वो अब ढोने नहीं देती
हमारे गीत में छुपकर हमेशा वो चली आती
बने आवाज दिल की सुर हमें खोने नही़ं देती
अखंड गहमरी
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