Sunday, 20 July 2014

20 जुलाई 2014 रविवार हमारी जिन्‍दगी हमारी यादें का संकलन

अपनी यादे - मेरे जीवन की अविस्मर्णीय घटना
बात सन 1975 की है | अग्रवाल युवा संगठन के महासचिव के रूप में मेरे नेतृत्व में
बाजारों से एक जुलुस उस घर के बाहर प्रदर्शन कर रहा था जहाँ दहेज़ न मिलने पर एक नवयुवती की जहर दे हत्या करदी थी | दुसरे दिन राजस्थानपत्रिका व अन्य समाचार
पत्रों में हमारी जुलुस की फोटो सहित समाचार चर्चा का विषय बन गया | कुछ दिन बाद
मेरे ननिहाल के शादी समारोह में प्रीतिभोज में उस समय लागू सीमा से अधिक संख्या
में जीमण को रोकने पुलिस आयी | किसी ने छोटे भाई के पास दिल्ली में मेरे माँ-बाप को शिकायत की “तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण बाबू ने पुलिस भेज कर रंग में भंग किया है | शहर में दहेज विरोधी पोस्टर भी लक्ष्मण का नाम है |पुलिस भेजने की कार्यवाही में मेरा
हाथ न होने पर भी मुझ पर उंगलियाँ उठती रही जो मै भुलाए नहीं भूल पाता हूँ |
तसल्ली यहीहै कि दहेज़ के हत्यारे पति को सात साल की जेल हो गयी |

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

आत्म कथा सत्य पर आधारित।
मेरा नाम- विनय कुमार सिंह
मोबाईल न0- 9792497553
              मेरी जिंदगी सदा ही खट्टी मीठी यादों से भरी रही, मैंने कभी भी ओ नहीं पाया जो मैंने चाह या जिसके लिए प्रयास किया। बचपन से मुझे बहुत ही पढ़ने लिखने का शौक था परन्तु घर की माली हालत कुछ ऐसी रही की ये सपने भी अधूरे रह गए। बाल्य अवस्था से ही मुझे मन में उमड़ते शब्दों को कलम द्वारा कागज पे उतारने का जूनून था।
                 मै अपने ख्यालों को लिखकर रखने लगा। एक बार की बात है जब मै 10वी कक्षा में पढ़ता था , एक रोज मै पढाई करते समय एक डायरी में ऐसे ही हल्का गजल लिख रहा था जिनके शब्दों में थोड़ी गहरे थी उसी समय मेरे चाचा जी के एक मित्र आ गए मैंने झट से डायरी छुपा ली, चाचा जी के मित्र ने हमे डायरी छुपाते देख ली और हमसे डायरी मांग ली मै डर गया क्योंकि आज मेरी चोरी पकड़ी गयी थी मैंने डरते डरते डायरी उनको दे दी ओ बोल बोल के मेरे लिखे सब्दो को पढ़ने लगे और उनके द्वारा मेरा जम के उपहास किया जाने लगा इतने में मेरे चाचा जी भी आ गए तो उनके मित्र ने ओ डायरी उनको दिखाई और कहा की साहबजादे पढाई के आड़ में इश्कबाजी कर रहें है! चाचा जी ने मुझे बहुत फटकार लगाई और कहा की तुम पढाई लिखाई छोड़ दो और कोई कम करो साथ ही उन्होंने पत्र द्वारा पिताजी को भी बता दिया । तब मुझे लगा की मैंने अपने पिताजी का भी भरोसा खो दिया ओ इतनि मेहनत करके हमे पढ़ा रहे है और हम ये सब कर रहे है। तब से हमे दुबारा कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हुई बस भावनाए प्रति दिन मेरे अन्दर अंगड़ाई लेती थी पर दर जाता था। उसके बाद जब मै नौकरी करने लगा तब फिर लालसा जगी की अब खुलकर लिखे। फिर समस्या वही की मुझे पढ़ेगा कोन।
             इसके बाद मैंने एक परम मित्र की सलाह पर साहित्यकारों की धरती गहमर के माध्यम से जुड़ा जहाँ पर मुझे आप सभी महान बिभुतियों से सराहना मिली और सच पूछिए तो आज मुझे लगता है की पहली बार मै अपनी इक्षा से जीने की कोशिश कर रहा हूँ। इसके लिए इस साहित्यकारों की धरती गहमर पेज का मई मन से आभार ब्यक्त करना चाहूँगा।

अपनी यादे के तहत
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ये उस समय की बात हैं जब मैं १० साल की थी ,मैं अपने सहेलियों के साथ खेल रही थी कि मैंने देखा कि गुड़िया जो कि मेरे ही उम्र कि थी कल (चापाकल) पर पानी लेने के लिए आई |उसने कल को जोड़ से चलाकर हेंडल छोड़ दी नतीजा ये हुआ कि हेंडल सीधे उसके मुंह में लगा और उसका दाँत टूट गया |वो रोने लगी उसकी रोने कि आवाज सुनकर उसकी दादी आ गई उसका घर पास में ही था |उसकी दादी पुछि क्या हुआ क्यों रो रही हो |मैं खेलना छोड़कर दौड़ कर कल पर गई उसी कि गलती मैने भी दोहरा दी ताकि उसकी दादी समझ सके कि उसे चोट कैसे लगा |मेरा भी हाल वही हुआ जो गुड़िया का हुआ था मेरे भी दाँत टूट गया और मुंह से खून निकलने लगा |


'हमारी ज़िन्दगी , हमारी यादें' के अंतर्गत :
एक संस्मरण : एक रोचक प्रसंग :
ज़िंदगी में समस्याये आती ही रहती हैं । ज़िन्दगी हैं तो समस्यायें हैं. समस्यायें हैं, इसलिये ज़िन्दगी है। अपने पारिवारिक जीवन में भी समस्याओं का कई बार सामना करना पड़ता है, विशेषकर पत्नी भी यदा कदा समस्या का कारण बन जाती हमें है। हमारी विवेकशीलता इस पर है कि समस्या का समाधन हम कितनी और कैसी चतुरता से करते हैं ।
बात काफी पहले की है, मेरी नई नई शादी हुई थी । और जैसा शुरु में हर पति का स्वभाव होता है कि अपनी पत्नी को कुछ नये नये उपहार , ‘सरप्राइज गिफ्ट’ के नाम से दे कर उसे खुश करने का । ऐसी ही भावना से उत्प्रेरित होकर मैं ने भी इस तरह का उपहार श्रीमती जी को देना शुरु किया । मगर ये क्या , जब भी मैं ऐसा करता, वो उसका मूल्य पुछती और सही सही मूल्य बतलाने पर चिल्लाने सी लगती ‘ ठग गये न , पहले तो आपको कोई चीज पसंद करने आती नही , उस पर हमेशा ठग जाते हैं ।‘ मुझे उनकी ये बातें बहुत नागावार लगतीं । उनकी नाराज़गी से बचने के लिये एक नया रास्ता अपनाया मैं ने । जो भी तोहफा मैं लाता, उसका दाम बहुत कम करके उन्हें बतलाता, करीब करीब तीन चौथाई । फिर भी उनका वही रवैया रहता ‘ ठग गये न , मैं हमेशा कहती हूँ , अकेले शॉपिंग पर मत जाया करो । एक तो आपकी चीजें पसंद करने नहीं आती और उस पर से हमेशा ठग जाते हैं ।‘
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था , इस तरह की बातें सुन कर भी उपहार लाना जारी रखा और दाम हमेशा बहुत कम कर के बतलाता उन्हें, मगर श्रीमती जी का वही रवैया रहता । ऐसे ही उनका जन्मदिन था , मैं ने बड़े शौक से उनके लिये एक कीमती साड़ी खरीदी और बहुत प्यार के साथ उन्हें भेंट किया , 1000 रू. की साड़ी का दाम 500 रू. बतलाया। सोचा इस बार वह बहुत खुश होगीं और मेरी पसंद और खरीददारी को दाद देगीं वों, पर फिर भी हाय खुदा, उनकी वही वक्रोक्ति ‘ठग गये न, आपकी पसंद भी कितनी घटिया है, हर जगह ठग जाते हैं' सुनने को मिली ।
पर इस बार मैं भी तैयार था , मंद मंद मुस्कराते हुये कहा उंनसे ‘ डार्लिंग, तुम ठीक कहती, मेरी पसंद बहुत ही घटिया है और मैं हर जगह ठग जाता हूँ । आखिर तुम्हें भी तो मैं ने ही पसंद किया था।‘
इतना सुनते ही पत्नी जी के चेहरे का रंग उड़ गया, जो देखते ही बनता था । और वो दिन और आज का दिन श्रीमती से फिर कभी भी ऐसी बात सुनने को नहीं मिली कि ‘आपकी पसंद घटिया होती है या आप हर जगह ठग जाते हो ।‘ यह मेरे लिये एक बहुत ही तस्कीन की बात रही और है, एक बड़ी समस्या से मुक्ति।
घर के ही एक अन्य संस्मरण के साथ , अगले अंक में । धन्यवाद सुविज्ञ मित्रों को ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई / 20.07.2014

हमारी जिन्‍दगी हमारी यादें
यह बात 24 जून 1989 की है मेरे पिता जी जनपद देवरिया के पडरौना में तैनात थे। हम लोग वही से अपनी कार यू0पी0के0 4038 से पडरौना से अपनी मौसी की शादी में भाग लेने धरहरा मुँगेर जा रहे थे। हमारे साथ हमारी माता जी, दो भाई, मामा और वह मौसी जिनकी शादी थी और उनकी एक मित्र रूबी थी। हम लोग सुबह 6 बजे पडरौना से निकल कर 12 बजे गोपालगंज बिहार के पास पहुँचे थे उसी समय हम लोगो की कार खराब हो गयी हमारे मामा गोपालगंज बिहार से लाये मगर शा वह कार किसी तरह को गोपालगंज के अपने गैरेज में लाया मगर वह कार को पूरी तरह से ठीक करने में 2 दिन का समय मागा चूकि हम लोग शादी में जाना था सेा उसने कहा कि गोपलगंज शहर सहित पूरे बिहार के माहौल ठीक नहीं है आप लोगो को पूरी रात बिहार में यात्रा करनी है जो काफी कठिन होगा आप लोग वापस लौट जाये मैं 100 किलोमीटर तक जाने लायक कर देता हॅू। हम लोग वापस लौटने लगे मगर दुर्भाग्‍य देखीये जिस जगह में दिन में कार खराब हुई थी वही फिर खराब हो गयी रात के 9 बज रहे थे हम लोग परेशान उस समय हम लोगी गाडी में विवाह में देने हेतु 2 लाख नगद एवं लगभग 20 भर जेवर थे और अन्‍य सामान हम लोग परेशान हो गये अौरते रोने लगी, तब हम लोगो किसी तरह सडक के किनारे बसे गाँव में पहुँचे और मदद मॉंगी वह लोग तुरन्‍त बाहर निकले और गॉंव से एक किलोमीटर दूर सडक पर आये तथा सारा सामन निकल कर एक बैलगाडी पर लादे हम लोगो को बैठाया और खेतो के सहारे गोपालगंज स्‍टेशन चल दिये मौसम पूरी तहर खराब था आसमान में काले बादल अधेरी रात डरावना माहैाल मगर वह 10 की संख्‍या में हथियारो से लैस होकर चल रहे थे अभी हम आधे रास्‍ते पहुॅचे ही थे कि कुछ लूटेरो ने हमें घेर लिया मगर साथ चल रहे लोगो ने उनका मुकाबल किया जिसमें कुछ लोग घायल होगये हमारी आवाजे और चीखे सुन कर पास के गाँव के लोग निकल कर बाहर आये तब तक लूटेरे भाग गये थे, हम गाडी में घायलो को लाद कर गोपालगंज रेलवे आये वहा भी पूरी तरह सन्‍नाटा केवल एक दुकान झोपडी में खुली थी हम लोग भूख से व्‍याकुल थे, उसने हम लोगों को उस समय 30 रूपया प्‍लेट चावल दाल सब्‍जी बना कर खिलाया, खाने में पत्‍थरो का बोलबाला था मगर चंडाल पेट सब हजम करने को तैयार। रेलवे स्‍टेशन से पुलिस को सूचना दिया गया वही से घयलो केा अस्‍पताल और हम लोगो को एक पैसेजर ट्रेन से पडरौना भेजा गया। हम लोग सुबह 6 बजे 24 घंटे में जिन्‍दगी की एक खौफनाक सफर करके लौटे मगर हम लोगो का मन आज भी उन गोपाल गंज बिहार के लोगो के प्रति श्रधा से झुक जाता है।किस प्रकार उन्‍होने अपनी जान पर खेल कर हमें तथा हमारे सामानो को बचाया ओर सुरक्षित पहुँचा और उसके एवज में ईलाज तक के पैसे लेने से इन्‍कार कर दिये।
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर



॥अपनी यादें, अपनी जिन्दगी॥
------कहाँ है संवेदना ?------
गलती उन दोनों की नहीं थी कि उन्होने अपने स्कूटर से मेरी बच्ची को टक्कर मारी बल्कि गलती तो मेरी 7 साल की बच्ची की थी कि वह उन दो पढ़े-लिखे नौजवानों के स्कूटर से टकरा गई । मैने अपनी फूल सी नाजुक,
कोमल कली की इस धृष्टता के लिए उन दोनों के आगे हाथ जोड़ दिए, कहा कि-अपनी बिटिया की तरफ से मैं माफी माँगता हूँ,वह तो बेचारी बच्ची है, अभी रो भी रही है, उसकी वजह से आपको ब्रेक लगाना पड़ा, कीमती समय गंवाना पड़ा, उसके लिए मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। बस इतना सुनना था कि वे दोनों सीना फुलाकर, जयी मुस्कान लिए अपने स्कूटर पर चलते बने और मैं अपनी रोती लाडो को चुप कराने लगा, साथ ही मन ही मन
दुख भी मनाने लगा कि काश जाते-जाते, वे मुझसे एक बार पूछ लेते-भाईसाहब, बच्ची को ज्यादा चोट तो नही आयी ?


हमारी ज़िन्दगी हमारी यादें
उसकी शादी के बाद एक यादगार पत्र
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प्राण प्रिय...
आज काफी समय बाद ख़त लिख रहा हूँ। तुम्हारे नये पते के बारे में शहर के नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं जानता हूँ इसलिए इस उम्मीद से फेसबुक पर भेज रहा हूँ कि अगर भूल से भी तुम फेसबुक पर आओ तो शायद तुम्हें नज़र पड़ जाए। कल फिर कुछ पुरानी यादों को कुरेदने के लिए उसी जगह पहुँच गया जहाँ हम अक्सर मिला करते थे। कुछ 10 मिनट ही हुई होंगी मुझे उस चाय वाले भईया की दुकान पर बैठे हुए कि तुम्हारी प्रिय सहेली वहाँ पहुँच गई। अरे वही जो अक्सर गालिब के शहर जाती रहती है, उसने मुझे पहले कभी नही देखा था मगर आश्चर्य की बात है कि कल उसने आते ही मुझे मेरे नाम से पुकार कर पूँछा- ‘‘एन. एस. , अब क्यों आये हो तुम यहाँ....?’’
एक अन्जान लड़की ने मुझे ‘एन. एस.’ कह कर बुलाया ये बात मुझे बिल्कुल हज़म नहीं हुई और फिर मुझे भी पूँछना ही पड़ा कि वो कौन है और मुझे कैसे जानती है..? जैसे ही उसने अपना नाम बताया, मुझे सब कुछ याद आ गया। ये वही लड़की थी जिसके बारे में तुम अक्सर बात किया करती थीं। ये वही थी जिसे तुमने मेरे मुक्तक और मेरी कहानियाँ सुनाईं। इसी ने तो मेरी हर रचना को अद्भुत और सबसे अलग बताते हुए कई बार तुमसे कहा था कि मुझे भी तेरे ‘एन. एस.’ से मिलना है। कुछ ही महीने पहले की तो बात है, तुम्हारी ये सहेली मुझसे मिलने को ऐसे बेताब थी कि जैसे ये किसी फिल्म अभिनेता या भारतीय क्रिकेट टीम के किसी खिलाड़ी से मिलना चाहती हो। मगर कल का नज़ारा बिल्कुल अलग था, उसे मुझसे मिल कर कोई खुशी नहीं हुई बल्कि उसे बहुत दुःख हुआ। इतना दुःख कि उसकी आखें भर आईं... फिर उसने जाते-जाते मुझसे कहा- ‘‘न जाने क्यों मुझे यकीन था कि तुम अब भी हर सन्डे की शाम को इस रैस्टोरेंट में आते होगे, उससे मिलने नहीं, उसे ढूँढने....’’ इतना कह कर वो रोते हुए वहाँ से चली गई।
उसके जाने के बाद वो चाय वाले भईया और उनकी दुकान पर बैठ वो कुछ लोग जो शायद मुझे जानते थे मेरी ओर इस तरह हमदर्दी भरी नज़र से देखने लगे कि जैसे मानो उन्हें मालूम हुआ हो कि मैं कुछ ही दिनों में मरने वाला हूँ और वो चाह कर भी मेरी मदद न कर पा रहे हों।
तेरे बिन एक ग़म है जि़ंदगी में,
वो कुछ तो है जो कम है जि़ंदगी में.......
तुम्हारा ‘पागल’

अपनी यादे अपनी जिन्‍दगी
एक घटना जो कभी नहीं भूल सकती
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बात २००४ की है , जब मैं अपनी तीन साल की बेटी के साथ अकेले बिलासपुर से नागपुर आ रही थी | ट्रैन सुबह ४ बजे बिलासपुर से छूटती थी , पापा और भैया मुझे ट्रैन में बिठा कर चले गए थे | चूँकि मायके से ससुराल जा रही थी तो स्वाभाविक था कि मन बहुत भारी था, और समय भी सुबह का था तो पता ही नहीं चला कि कब नींद लग गई | करीब ८-९ बजे नींद खुली तो देखा कि मेरा सूटकेश गायब था | काफी ढूंढने पर भी नहीं मिला तो मैं परेशान हो गई | मुझे परेशानी से ढूंढते देख आस पास के यात्रियों ने भी पुरे डब्बे में तलाश करने में मेरी मदद करनी शुरू कर दी | मगर सूटकेश नहीं मिला | रो रोकर मेरा हाल बुरा हो रहा था| चाहते हुए भी मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी | आसपास के यात्रियों ने शिकायत दर्ज करने के लिए टी. सी. को बुलाया | टी.सी ने कहा कि पहले पूरी ट्रैन में तलाश करते है शायद मिल जाए | किसी तरह लोगों पर विश्वास करके मैंने अपनी बेटी को उनके पास छोड़ा और टी.सी. के साथ पूरी ट्रैन में तलाशी के लिए गई , मगर सब बेकार,,,चोरी की कम्प्लेन लिख ली गई | किसी से मोबाइल मांग कर घर पर चोरी की खबर की | दस घंटे का सफर काटना मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो गया था आज भी जब वो दिन याद आता है तो सिहर जाती हूँ | और भगवान से यही प्रार्थना करती हूँ कि ऐसी घटना किसी के साथ न घटे | पुलिस रिकॉर्ड में मेरे केश की फाइल शायद बंद हो गई हो पर मेरी स्मृति में वो फाइल आज भी खुल जाती है जब मैं ट्रैन में सवार होती हूँ | सफर तो आज भी ज्यादातर अकेली ही करती हूँ ,, मगर ट्रैन में सवार होते ही ये घटना आँखों के सामने ताजा हो जाती है और मेरी आँखे अपने सामान की निगरानी करने लगती है |
~रमा वर्मा~

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