इस प्रकार आदरणीय अध्यक्ष रजनीश तपन जी एवं आप सब के सहयोग से गोपाल
राम गहमरी साहित्य समारोह -19 दिनांक 06से 07 जुलाई 2014 का दूसरा चरण हमारा रविवार पूर्ण
हुआ। हम समस्त गहमरक्षेत्र वासीयों की तरफ से समस्त रचनाकारों एवं
अध्यक्ष,महोदय का आभार प्रकट करते है तथा आप सबके स्वस्थ जीवन एवं
उज्ज्वल भविष्य के लिये प्रार्थना करतें है।
समारोह में सामिल रचनाकार रचनाकारों के नाम क्रमस: कृष्णा नन्दन मौर्य, रमा वर्मा, रजीनश तपन, हितेश शर्मा, लक्ष्मण प्रसाद लाडीवाल,अखंड गहमरी,धन्नजंय गहमरी, अवधेश कुमार विमल जी, धाीरज श्रीवास्तव जी, अभिनव अरूण जी,करण एस पी जी, डा0 हीरा लाल प्रजापति जी,सुरेश मिश्रा उत्साही जी, एवं प्रियंका पांडे जीआप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
गीत
टेक का मात्राभार-30
अंतरे का मात्राभार- 24
टेक का तुकांत- आता है
पहले अंतरे का तुकांत- अलते
दूसरे अंतरे का तुकांत- तें
तीसरे अंतरे का तुकांत-अल
..........
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
निकल घरों से
साँझ सुरमई ढलते–ढलते।
नदिया की लहरों की लय पर
चलते–चलते।
संग तुम्हारे
सपने बुनना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
साहिल से लगती नावें
उडुगन की पाँते।
सुर्ख क्षितिज सी अंतहीन
कितनी ही बातें।
मीत
तुम्हारे लब से सुनना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
संन्ध्या के अरुणिम मुख पर
ज्यों झुकता बादल।
तेरे चेहरे पर
मेरे हाथों का संबल।
आँचल के संग
मन का उड़ना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
– कृष्ण नन्दन मौर्य.
154, मौर्य नगर, पल्टन बाजार
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश, भारत-23000
Rama Verma
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 19
हमारा रविवार के अंतर्गत
विधा- “चौपाई”
चौपाई : इस मात्रिक छन्द के दो चरण होते हैं,
प्रत्येक में १६-१६ मात्राएँ होती हैं |
हर चरण में ८ मात्राओं के बाद यति होती है |
चरणान्त में दो गुरु 2 होते हैं |
---------------------------------------------------------------आप सब रचनाकरों का हार्दिक आभार आपका दिन शुभ हो--------
समारोह में सामिल रचनाकार रचनाकारों के नाम क्रमस: कृष्णा नन्दन मौर्य, रमा वर्मा, रजीनश तपन, हितेश शर्मा, लक्ष्मण प्रसाद लाडीवाल,अखंड गहमरी,धन्नजंय गहमरी, अवधेश कुमार विमल जी, धाीरज श्रीवास्तव जी, अभिनव अरूण जी,करण एस पी जी, डा0 हीरा लाल प्रजापति जी,सुरेश मिश्रा उत्साही जी, एवं प्रियंका पांडे जीआप सबका हार्दिक आभार एंव आगे भी आपके सहयोग की आशा रहेगी ।
हमारा रविवार के विजेता कृष्ण नन्दन मौर्य
कृष्ण नन्दन मौर्य
गीत टेक का मात्राभार-30
अंतरे का मात्राभार- 24
टेक का तुकांत- आता है
पहले अंतरे का तुकांत- अलते
दूसरे अंतरे का तुकांत- तें
तीसरे अंतरे का तुकांत-अल
..........
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
निकल घरों से
साँझ सुरमई ढलते–ढलते।
नदिया की लहरों की लय पर
चलते–चलते।
संग तुम्हारे
सपने बुनना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
साहिल से लगती नावें
उडुगन की पाँते।
सुर्ख क्षितिज सी अंतहीन
कितनी ही बातें।
मीत
तुम्हारे लब से सुनना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
संन्ध्या के अरुणिम मुख पर
ज्यों झुकता बादल।
तेरे चेहरे पर
मेरे हाथों का संबल।
आँचल के संग
मन का उड़ना
कितना मन को भाता है।
जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है।
– कृष्ण नन्दन मौर्य.
154, मौर्य नगर, पल्टन बाजार
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश, भारत-23000
Rama Verma
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 19
हमारा रविवार के अंतर्गत
विधा- “चौपाई”
चौपाई : इस मात्रिक छन्द के दो चरण होते हैं,
प्रत्येक में १६-१६ मात्राएँ होती हैं |
हर चरण में ८ मात्राओं के बाद यति होती है |
चरणान्त में दो गुरु 2 होते हैं |
समारोह अध्यक्ष आदरणीय रजनीश तपन जी को सादर समर्पित।
=================
१)
नटवर नागर कृष्ण मुरारी,
मेरी चिंता हरलो सारी |
कब से राह निहारूँ तेरी,
आ जाओ अब करो न देरी ||
***************************
२)
कहदो कैसे तुझे रिझाऊं,
तेरा दर्शन कैसे पाऊँ |
भाँति-भाँति' के जतन करूँ मैं ,
दुनिया से अब नहीं डरूँ मैं ||
*****************************
३)
मोरे मन कान्हा ही भावे,
तनिक कहीं भी चैन न आवे |
कैसे उनका दर्शन पाऊँ ,
अपने मन की प्यास बुझाऊँ ||
******************************
४)
सपनो में वृन्दावन जाऊं ,
कान्हा के संग रास रचाऊं |
मैं भी काश सुमन बन जाती,
चरण धूरि कान्हा की पाती ||
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह~19
हमारा रविवार
विधा ~गीत
शिल्प विधान
मुखड़े तथा पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार ~16,16
मुखड़े का तुकांत~आर कहाँ है
अंतरोँ का तुकांत,निम्नवत~1-आरी,2-आपेँ,3-आहोँ मे,4-अहरी,,5-अन है
आदरणीय अखंड गहमरी जी के सम्मुख सादर निवेदित~
1=================
१)
नटवर नागर कृष्ण मुरारी,
मेरी चिंता हरलो सारी |
कब से राह निहारूँ तेरी,
आ जाओ अब करो न देरी ||
***************************
२)
कहदो कैसे तुझे रिझाऊं,
तेरा दर्शन कैसे पाऊँ |
भाँति-भाँति' के जतन करूँ मैं ,
दुनिया से अब नहीं डरूँ मैं ||
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३)
मोरे मन कान्हा ही भावे,
तनिक कहीं भी चैन न आवे |
कैसे उनका दर्शन पाऊँ ,
अपने मन की प्यास बुझाऊँ ||
******************************
४)
सपनो में वृन्दावन जाऊं ,
कान्हा के संग रास रचाऊं |
मैं भी काश सुमन बन जाती,
चरण धूरि कान्हा की पाती ||
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह~19
हमारा रविवार
विधा ~गीत
शिल्प विधान
मुखड़े तथा पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार ~16,16
मुखड़े का तुकांत~आर कहाँ है
अंतरोँ का तुकांत,निम्नवत~1-आरी,2-आपेँ,3-आहोँ मे,4-अहरी,,5-अन है
आदरणीय अखंड गहमरी जी के सम्मुख सादर निवेदित~
मन रोगी,उपचार कहाँ है।
काया पर,अधिकार कहाँ है?
1-वाणी बोल बोल के हारी।
गाते सुर की है लाचारी।
गीत गुलाबोँ सा महकेँगे'
सोच रही है दुनिया सारी।
मन रोगी....
2- अलग अलग सब राग अलापेँ
पीणा की गहराई नापेँ।
शव्द बोल के रह जातेँ हैँ
आँचल से आँखोँ को ढापेँ।
जीवन मे प्रतिकार कहाँ है।
मन रोगी....
3-धोखा है चलती राहोँ मे।
हम देखेँ उन्ही निगाहोँ मे।
जब चोट मिले अपनो से ही।
है दुवा निकलती आहोँ मे
अब वंदन भी स्वीकार कहाँ है
मन रोगी....
4-चंचल मन है काया ठहरी।
अवसादोँ की छाया गहरी।
सुबह सबेरे रवि जब आये
दिखे नही है धूप सुनहरी
शीतल चली,बयार कहाँ है।
मन रोगी....
5-पीर पालता मानव मन है
समरसता का ये जीवन है।
कंस समाया है अंतर मे
सभी ह्रदय मे इक रावन है।
राम बने ,आसार कहाँ है
मन रोगी ....
झंकृत होता तार कहाँ है।
काया पर,अधिकार कहाँ है?
1-वाणी बोल बोल के हारी।
गाते सुर की है लाचारी।
गीत गुलाबोँ सा महकेँगे'
सोच रही है दुनिया सारी।
मन रोगी....
2- अलग अलग सब राग अलापेँ
पीणा की गहराई नापेँ।
शव्द बोल के रह जातेँ हैँ
आँचल से आँखोँ को ढापेँ।
जीवन मे प्रतिकार कहाँ है।
मन रोगी....
3-धोखा है चलती राहोँ मे।
हम देखेँ उन्ही निगाहोँ मे।
जब चोट मिले अपनो से ही।
है दुवा निकलती आहोँ मे
अब वंदन भी स्वीकार कहाँ है
मन रोगी....
4-चंचल मन है काया ठहरी।
अवसादोँ की छाया गहरी।
सुबह सबेरे रवि जब आये
दिखे नही है धूप सुनहरी
शीतल चली,बयार कहाँ है।
मन रोगी....
5-पीर पालता मानव मन है
समरसता का ये जीवन है।
कंस समाया है अंतर मे
सभी ह्रदय मे इक रावन है।
राम बने ,आसार कहाँ है
मन रोगी ....
झंकृत होता तार कहाँ है।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 19।
"हमारा रविवार" के अंतर्गत समारोह अध्यक्ष आदरणीय रजनीश "तपन" जी को अपनी निम्न रचना समर्पित कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - गीत
"हमारा रविवार" के अंतर्गत समारोह अध्यक्ष आदरणीय रजनीश "तपन" जी को अपनी निम्न रचना समर्पित कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - गीत
शिल्प विधान :
प्रत्येक पंक्ति में मात्राभार - 30
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियों का तुकान्त - "आह चलो"
अंतरों के तुकान्त क्रमशः - ऊर सखे, अम जाने से, आये, अहीं, आरे हैं।
उठो हिन्दवी उषा नयी है मन में भर उत्साह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
थकन भरे तन को झकझोरो लक्ष्य अभी है दूर सखे,
ध्येय प्राप्ति तक हो प्रयत्न में तन मन धन भरपूर सखे
है आलस्य सबल रिपु अपना करूँ तुम्हें आगाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
रक्त मूल्य सब खो देता है धमनी में जम जाने से,
सागर खारा हो बैठा है एक जगह थम जाने से,
बहती नदिया पूजी जाती ओ मेरे मल्लाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
कृतिम कागज़ी सुमन भला कब पंथ सुवासित कर पाये,
ऊँचे ताड़ वृक्ष पथिकों को कब देते शीतल साये,
दुर्ग रेत के ढह जाते सह पाते नहीं प्रवाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
रावण को दस शीश मिले पर राम पराजित हुए नहीं,
सघन विकट तम नष्ट हुआ जब नन्हा दीपक जला कहीं,
लक्ष्य करो संधान मिलेंगी खुशियाँ तुम्हे अथाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
करते जो विश्वास स्वयं पर कभी न हिम्मत हारे हैं,
उनका मार्गप्रदर्शन करते सूरज चाँद सितारे हैं,
विजय तिलक जयकारे पाते बनता समय गवाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
उठो हिन्दवी उषा नयी है मन में भर उत्साह चलो
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
- सादर,
हितेश शर्मा "पथिक"
प्रत्येक पंक्ति में मात्राभार - 30
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियों का तुकान्त - "आह चलो"
अंतरों के तुकान्त क्रमशः - ऊर सखे, अम जाने से, आये, अहीं, आरे हैं।
उठो हिन्दवी उषा नयी है मन में भर उत्साह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
थकन भरे तन को झकझोरो लक्ष्य अभी है दूर सखे,
ध्येय प्राप्ति तक हो प्रयत्न में तन मन धन भरपूर सखे
है आलस्य सबल रिपु अपना करूँ तुम्हें आगाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
रक्त मूल्य सब खो देता है धमनी में जम जाने से,
सागर खारा हो बैठा है एक जगह थम जाने से,
बहती नदिया पूजी जाती ओ मेरे मल्लाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
कृतिम कागज़ी सुमन भला कब पंथ सुवासित कर पाये,
ऊँचे ताड़ वृक्ष पथिकों को कब देते शीतल साये,
दुर्ग रेत के ढह जाते सह पाते नहीं प्रवाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
रावण को दस शीश मिले पर राम पराजित हुए नहीं,
सघन विकट तम नष्ट हुआ जब नन्हा दीपक जला कहीं,
लक्ष्य करो संधान मिलेंगी खुशियाँ तुम्हे अथाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
करते जो विश्वास स्वयं पर कभी न हिम्मत हारे हैं,
उनका मार्गप्रदर्शन करते सूरज चाँद सितारे हैं,
विजय तिलक जयकारे पाते बनता समय गवाह चलो।
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
उठो हिन्दवी उषा नयी है मन में भर उत्साह चलो
सात अश्व चढ़ दिनकर आये उठो कर्म की राह चलो।।
- सादर,
हितेश शर्मा "पथिक"
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19*** हमारा रविवार
समारोह अध्यक्ष श्री रजनीश तपन जी की प्रतिष्ठा में सुधि पाठकों के अवलोकनार्थ
*विषय - विधा दोहे छंद
*शिल्प विधान – दोहा छंद में १३,११,१३,११ मात्राओं के चार चरण अर्थात २४-२४ मात्राओं की दो पंक्तियों में रचित | दोहे के लिए "गागर में सागर" की कहावत लागू होती है !
विषम चरण अतुकांत और सम चरण तुकांत होते हैं !सम चरणों के अंत में पताका अर्थात २१ (गुरु लघु) मात्रा क्रम होता है !
विषम चरणों का प्रारम्भ जगण अर्थात १२१ मात्राभार वाले 'स्वतंत्र शब्द' से नहीं होता है !इसकी एक विशेष लय होती है !
तुकांत क्रमशः - प्रस्तुत दोहों में चरणान्त आय,आज,अंध, अंज, ओग,अर्क, और, है |
समारोह अध्यक्ष श्री रजनीश तपन जी की प्रतिष्ठा में सुधि पाठकों के अवलोकनार्थ
*विषय - विधा दोहे छंद
*शिल्प विधान – दोहा छंद में १३,११,१३,११ मात्राओं के चार चरण अर्थात २४-२४ मात्राओं की दो पंक्तियों में रचित | दोहे के लिए "गागर में सागर" की कहावत लागू होती है !
विषम चरण अतुकांत और सम चरण तुकांत होते हैं !सम चरणों के अंत में पताका अर्थात २१ (गुरु लघु) मात्रा क्रम होता है !
विषम चरणों का प्रारम्भ जगण अर्थात १२१ मात्राभार वाले 'स्वतंत्र शब्द' से नहीं होता है !इसकी एक विशेष लय होती है !
तुकांत क्रमशः - प्रस्तुत दोहों में चरणान्त आय,आज,अंध, अंज, ओग,अर्क, और, है |
रहे ह्रदय में ठौर (दोहे)
===========
संस्कारी बच्चे बने,बुजुर्ग बने सहाय,
चले राह सन्मार्ग पर, वैभव बढ़ता जाय |
मान बढे सहयोग से, संकट हल हो जाय,
सद्गुण अरु सम्पन्नता,दिन दिन बढती जाय |
साथ रहे तो लाभ है, युवा मानते आज,
आजादी भी चाहते, ये तनाव का साज |
बंधिश इतनी ही रहे, टूटे नहि तटबंध
वीणा जैसे तार ये, जुड़े रहे सम्बन्ध |
मन में भरे विकार से, आपस में हो रंज
इसी वजह परिवार में, कसते रहते तंज |
एकल घर परिवार में, पले बढे जो लोग,
रहते है अवसाद में, सतत सतावे रोग |
दो पीढ़ी के मध्य में, रहे सोच में फर्क
जब तब ये करते रहे,देखो खूब वितर्क |
तालमेल बैठे नहीं, लगे ह्रदय को जर्क,
ऐसे घर परिवार में,बढ़ता जाए तर्क |
बंधी रहती जब तलक, संबंधों की डोर,
रहता सबका मान तब, रहे ह्रदय में ठौर |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
===========
संस्कारी बच्चे बने,बुजुर्ग बने सहाय,
चले राह सन्मार्ग पर, वैभव बढ़ता जाय |
मान बढे सहयोग से, संकट हल हो जाय,
सद्गुण अरु सम्पन्नता,दिन दिन बढती जाय |
साथ रहे तो लाभ है, युवा मानते आज,
आजादी भी चाहते, ये तनाव का साज |
बंधिश इतनी ही रहे, टूटे नहि तटबंध
वीणा जैसे तार ये, जुड़े रहे सम्बन्ध |
मन में भरे विकार से, आपस में हो रंज
इसी वजह परिवार में, कसते रहते तंज |
एकल घर परिवार में, पले बढे जो लोग,
रहते है अवसाद में, सतत सतावे रोग |
दो पीढ़ी के मध्य में, रहे सोच में फर्क
जब तब ये करते रहे,देखो खूब वितर्क |
तालमेल बैठे नहीं, लगे ह्रदय को जर्क,
ऐसे घर परिवार में,बढ़ता जाए तर्क |
बंधी रहती जब तलक, संबंधों की डोर,
रहता सबका मान तब, रहे ह्रदय में ठौर |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
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हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी एवं समस्त अग्रज रचनाकारो एवं गुरूजन को समर्पित
विधा---गीत
मुखडा का मात्रा भार पहली पंक्ति 17
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 19
हमारा रविवार के अन्तरगत।
विधा- गीत
शिल्प विधान- मुखडे तथा अंतरो की पंक्तियों की मपनी-
212, 212, 212, 212
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त- आ गया।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- अता रहा।
2- अती रही।
3- आगता।
ँँँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय रजनीश तपन जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँ
आज स्वप्नों शहर मेँ रहा घूमता, ये जमाना कहाँ से कहाँ आ गया।
खल परिन्दी अदायें बसी अंग मे,
बन दरिन्दा गली हर नगर छा गया।
घाव देता रहा दर्द सहता रहा।
वो तुफानी हवस मे मचलता रहा।
मुड गयी जिन्दगी इस कदर साथिया,
मातृ बहनों की भी अस्मिता खा गया।
आज...(1)
हुस्न की आग मन मे सुलगती रही।
बन्द ज्वाला बदन मे भभकती रही।
मिट गयी अंध तन आज शर्मो हया,
ये खुलासा जमी पर नजर आ गया।
आज...(2)
रात दिन शाम सोते हुए जागता।
जीर्ण फटती रजाई यहाँ तागता।
काश कमजोर धागा न होता बना,
फिर तो लगता गुलों मे सुजन छा गया।
आज...(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी एवं समस्त अग्रज रचनाकारो एवं गुरूजन को समर्पित
विधा---गीत
मुखडा का मात्रा भार पहली पंक्ति 17
दूसरी पंक्ति 12
अतरा का मात्रा भार प्रत्येक पंक्ति 12
मुखडे का तुक --आरा
प्रथम अही दिवतीय --अली तृतीय - अहे
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
शिकवा नहीं किसी से
शिकायत भी है नहीं
रुठी हमारी किस्मत
छुप गई है वो कही
कैसे बुलाउ उसको यारो
रो रो जिसे पुकारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
किया जिससे भी प्यार
वो ही दूर हो चली
बढ़ायूँ हाथ मै गर
मुरझाये खिली कली
अब क्या कहूँ मै तुमसे कोई
देता नहीं सहारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
बाते अपने दिल की
कहो किससे हम कहे
भूल गये है हसना
कहो कितना गम सहे
चलता रहेगा अखंड कब तक
मिलता नहीं सहारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19
हमारा रविवार
बिषय - गजल
काफिया- आते
रदीफ - रहे
समारोह अध्यक्ष -आदरणीय रजनीश तपन जी को सादर समर्पित
अतरा का मात्रा भार प्रत्येक पंक्ति 12
मुखडे का तुक --आरा
प्रथम अही दिवतीय --अली तृतीय - अहे
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
शिकवा नहीं किसी से
शिकायत भी है नहीं
रुठी हमारी किस्मत
छुप गई है वो कही
कैसे बुलाउ उसको यारो
रो रो जिसे पुकारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
किया जिससे भी प्यार
वो ही दूर हो चली
बढ़ायूँ हाथ मै गर
मुरझाये खिली कली
अब क्या कहूँ मै तुमसे कोई
देता नहीं सहारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
बाते अपने दिल की
कहो किससे हम कहे
भूल गये है हसना
कहो कितना गम सहे
चलता रहेगा अखंड कब तक
मिलता नहीं सहारा
मेरा जीवन नदी की धारा
मिलता नहीं किनारा
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19
हमारा रविवार
बिषय - गजल
काफिया- आते
रदीफ - रहे
समारोह अध्यक्ष -आदरणीय रजनीश तपन जी को सादर समर्पित
गीत के रस मे शब्दों की मिश्री घुलाते रहे .
तुम गजल बन गयी हम गुनगुनाते रहे .
दिल का कोना दरकता तुम्हारे बीना
बिखरा कर हसी हम गुनगुनाते रहे .
मन उपवन सूखा सावन की आस में
प्यार गुलसन लिए आशू बहाते रहे.
तुम धून बन गयी तरंग मे ढल गयी
हम लिखते रहे फिजा में बिखराते रहे .
सूना हो न जाए मित आगन प्रीत का
तेल लहु से नब्जो की बाती जलाते रहे.
प्यार बंधन मे बंधकर आओगे 'गजल'
खिदमत में कदमो तले खूद को बिछाते रहे .
धनञ्जय उपाध्याय 'गजल'
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19
हमारा रविवार
बिषय - गजल
काफिया- अन
रदीफ - देखिये
तुम गजल बन गयी हम गुनगुनाते रहे .
दिल का कोना दरकता तुम्हारे बीना
बिखरा कर हसी हम गुनगुनाते रहे .
मन उपवन सूखा सावन की आस में
प्यार गुलसन लिए आशू बहाते रहे.
तुम धून बन गयी तरंग मे ढल गयी
हम लिखते रहे फिजा में बिखराते रहे .
सूना हो न जाए मित आगन प्रीत का
तेल लहु से नब्जो की बाती जलाते रहे.
प्यार बंधन मे बंधकर आओगे 'गजल'
खिदमत में कदमो तले खूद को बिछाते रहे .
धनञ्जय उपाध्याय 'गजल'
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19
हमारा रविवार
बिषय - गजल
काफिया- अन
रदीफ - देखिये
मापनी- राजभा-राजभा-राजभा-राजभा (212-212-212-212)
समारोह अध्यक्ष -आदरणीय रजनीश तपन जी के समक्ष सादर
---------------------------------------------------------------
आज दंगों से जलता वतन देखिये।
हर तरफ है पतन ही पतन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
धर्म के नाम पर लूट ही लूट है;
लूटने वालों को है नमन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
जुल्म हीं जुल्म हैं निर्बलों पर यहाँ;
आह चीखों से गूँजा गगन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
छीन ली भ्रष्टता ने हँसी देश की;
सिसकी लेता हुआ ये चमन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
स्वार्थ की खाइयाँ और गहरी हुईं;
आदमी आदमी में जलन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
पश्चिमी सभ्यता में ढला इण्डिया;
आज नारी का नंगा बदन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
देश की अस्मिता को लगा दाब पर;
मौन बैठा है संसद भवन देखिये।।
----------------------------------------------------------------------
---अवशेष कु्मार विमल, सम्पादक-शेषामृत
मो. 9837024505
*गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह -19 विधा - गीत
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियो का स्थाई तुकांत- अली अली गई। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:1-आती थी 2-ओरी है।3-ऊटी थी।4-अंका।मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार- 16-10 के क्रम मेँ। प्रत्येक अंतरे का मात्रा भार-16-14 के क्रम मेँ। समारोह अध्यक्ष सम्मान्य श्री रजनीश तपन जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर।
--**--**--**--**--**--
देख गाँव का भ्रष्ट आचरण
कमली चली गई!
समारोह अध्यक्ष -आदरणीय रजनीश तपन जी के समक्ष सादर
---------------------------------------------------------------
आज दंगों से जलता वतन देखिये।
हर तरफ है पतन ही पतन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
धर्म के नाम पर लूट ही लूट है;
लूटने वालों को है नमन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
जुल्म हीं जुल्म हैं निर्बलों पर यहाँ;
आह चीखों से गूँजा गगन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
छीन ली भ्रष्टता ने हँसी देश की;
सिसकी लेता हुआ ये चमन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
स्वार्थ की खाइयाँ और गहरी हुईं;
आदमी आदमी में जलन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
पश्चिमी सभ्यता में ढला इण्डिया;
आज नारी का नंगा बदन देखिये।।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
देश की अस्मिता को लगा दाब पर;
मौन बैठा है संसद भवन देखिये।।
----------------------------------------------------------------------
---अवशेष कु्मार विमल, सम्पादक-शेषामृत
मो. 9837024505
*गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह -19 विधा - गीत
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियो का स्थाई तुकांत- अली अली गई। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:1-आती थी 2-ओरी है।3-ऊटी थी।4-अंका।मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का मात्रा भार- 16-10 के क्रम मेँ। प्रत्येक अंतरे का मात्रा भार-16-14 के क्रम मेँ। समारोह अध्यक्ष सम्मान्य श्री रजनीश तपन जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर।
--**--**--**--**--**--
देख गाँव का भ्रष्ट आचरण
कमली चली गई!
हँसती गाती रही हमेशा
अक्सर ही इतराती थी!
संग सुमन के रही खेलती
मन ही मन हर्षाती थी!
उस उपवन के माली से ही
मसली कली गई!
देख गाँव.....
माथ पकड़ कर झिनकन रोता
रोती बहुत कटोरी है!
हाय विधाता क्या कर डाला
किसकी सीनाजोरी है!
बड़की छुटकी बचीँ भाग्य से
मँझली छली गई!
देख गाँव.....
मुखिया जी सब जान रहे थे
किसने अस्मत लूटी थी!
और बिचारी क्योँकर आखिर
अन्दर से वह टूटी थी!
देशी दारू थी पहले ही
मछली तली गई!
देख गाँव.....
थोड़ा सा वह हिम्मत करती
और बजाती जो डंका!
रावण तो मरता ही मरता
खूब जलाती वह लंका
कैसे कह दूँ ठीक किया औ
पगली भली गई!
देख गाँव.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19 में सादर ,प्रस्तुति !
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष ---आदरणीय श्री रजनीश तपन जी एवं सुविज्ञ साथी गण !
===================================
विधा : ग़ज़ल
काफ़िया : अल
रदीफ़ : जाऊंगा
अरकान \ बहर - २१२२ ११२२ ११२२ २२
फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फेलुन
ग़ज़ल -
तुझको ऐ ज़िन्दगी, इक रोज़ मैं छल जाऊँगा |
मौत का हाथ पकड़ लूँगा निकल जाऊँगा|
अक्सर ही इतराती थी!
संग सुमन के रही खेलती
मन ही मन हर्षाती थी!
उस उपवन के माली से ही
मसली कली गई!
देख गाँव.....
माथ पकड़ कर झिनकन रोता
रोती बहुत कटोरी है!
हाय विधाता क्या कर डाला
किसकी सीनाजोरी है!
बड़की छुटकी बचीँ भाग्य से
मँझली छली गई!
देख गाँव.....
मुखिया जी सब जान रहे थे
किसने अस्मत लूटी थी!
और बिचारी क्योँकर आखिर
अन्दर से वह टूटी थी!
देशी दारू थी पहले ही
मछली तली गई!
देख गाँव.....
थोड़ा सा वह हिम्मत करती
और बजाती जो डंका!
रावण तो मरता ही मरता
खूब जलाती वह लंका
कैसे कह दूँ ठीक किया औ
पगली भली गई!
देख गाँव.....
रचना - धीरज श्रीवास्तव
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19 में सादर ,प्रस्तुति !
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष ---आदरणीय श्री रजनीश तपन जी एवं सुविज्ञ साथी गण !
===================================
विधा : ग़ज़ल
काफ़िया : अल
रदीफ़ : जाऊंगा
अरकान \ बहर - २१२२ ११२२ ११२२ २२
फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फेलुन
ग़ज़ल -
तुझको ऐ ज़िन्दगी, इक रोज़ मैं छल जाऊँगा |
मौत का हाथ पकड़ लूँगा निकल जाऊँगा|
सख्त हालात ने पत्थर सा बना रक्खा है ,
प्यार का जज़्बा दिखाओगे पिघल जाऊंगा |
सोने चाँदी के हज़ारों से न सींचो मुझको ,
मैं ग़रीबों की दुआओं से ही पल जाऊंगा |
बंद मुट्ठी का भरम रहने दो तारी कुछ रोज़ ,
और कुछ रोज़ उम्मीदों में बहल जाऊंगा |
लुत्फ़े आगाज़े सफ़र में हूँ तू आगाह न कर ,
चोट खाऊंगा मुहब्बत में संभल जाऊंगा |
मत सुना चाँद सितारों की कहानी मुझको ,
कोई बच्चा तो नहीं हूँ जो बहल जाऊंगा |
मुझसे टकरा के लहर ने जो कहा है सागर ,
मैं अगर तुमसे कहूँगा तो बदल जाऊंगा |
शह्र की रोशनी आँखों में चुभा करती है,
जेह्न से गाँव मिटा दूँ तो मैं जल जाऊँगा |
बस इसी सोच में महबूब को देखा ही नहीं ,
गौर से देख लूं उसको तो मचल जाऊंगा |
- अभिनव अरुण
प्यार का जज़्बा दिखाओगे पिघल जाऊंगा |
सोने चाँदी के हज़ारों से न सींचो मुझको ,
मैं ग़रीबों की दुआओं से ही पल जाऊंगा |
बंद मुट्ठी का भरम रहने दो तारी कुछ रोज़ ,
और कुछ रोज़ उम्मीदों में बहल जाऊंगा |
लुत्फ़े आगाज़े सफ़र में हूँ तू आगाह न कर ,
चोट खाऊंगा मुहब्बत में संभल जाऊंगा |
मत सुना चाँद सितारों की कहानी मुझको ,
कोई बच्चा तो नहीं हूँ जो बहल जाऊंगा |
मुझसे टकरा के लहर ने जो कहा है सागर ,
मैं अगर तुमसे कहूँगा तो बदल जाऊंगा |
शह्र की रोशनी आँखों में चुभा करती है,
जेह्न से गाँव मिटा दूँ तो मैं जल जाऊँगा |
बस इसी सोच में महबूब को देखा ही नहीं ,
गौर से देख लूं उसको तो मचल जाऊंगा |
- अभिनव अरुण
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 19
हमारा रविवार के अन्तरगत।
विधा- गीत
शिल्प विधान- मुखडे तथा अंतरो की पंक्तियों की मपनी-
212, 212, 212, 212
तुकान्त विधान-
मुखडे का तुकान्त- आ गया।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- अता रहा।
2- अती रही।
3- आगता।
ँँँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय रजनीश तपन जी एवं आदरणीय अखण्ड गहमरी जी को सादर समर्पित।
ँँँ
आज स्वप्नों शहर मेँ रहा घूमता, ये जमाना कहाँ से कहाँ आ गया।
खल परिन्दी अदायें बसी अंग मे,
बन दरिन्दा गली हर नगर छा गया।
घाव देता रहा दर्द सहता रहा।
वो तुफानी हवस मे मचलता रहा।
मुड गयी जिन्दगी इस कदर साथिया,
मातृ बहनों की भी अस्मिता खा गया।
आज...(1)
हुस्न की आग मन मे सुलगती रही।
बन्द ज्वाला बदन मे भभकती रही।
मिट गयी अंध तन आज शर्मो हया,
ये खुलासा जमी पर नजर आ गया।
आज...(2)
रात दिन शाम सोते हुए जागता।
जीर्ण फटती रजाई यहाँ तागता।
काश कमजोर धागा न होता बना,
फिर तो लगता गुलों मे सुजन छा गया।
आज...(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -19 की सूचना
हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी
===================================
विधा : ग़ज़ल
काफ़िया : इन
रदीफ़ : गए रे
अरकान : 2212 122 2212 122
===================================
यों रास्ते में हाथों के दान छिन गए रे ॥
देने चले थे उल्टा लेकर के रिन गए रे ॥
गंदी पवित्रता में दो डुबकियाँ लगाकर ,
मन-आत्म से हो पावन तन से मलिन गए रे ॥
गर्मी ने आस्माँ से बरसाई आग दिल से ,
बारिश के दिन बेचारे बूँदों के बिन गए रे ॥
थी नींद दूर कोसों और रात घंटों लंबी ,
हम जितने भी थे इक-इक सब तारे गिन गए रे ॥
दुश्मन पे ख़ैर कोई करता नहीं मगर अब ,
अपनों पे भी भरोसा करने के दिन गए रे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
==================================
हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी
===================================
विधा : ग़ज़ल
काफ़िया : इन
रदीफ़ : गए रे
अरकान : 2212 122 2212 122
===================================
यों रास्ते में हाथों के दान छिन गए रे ॥
देने चले थे उल्टा लेकर के रिन गए रे ॥
गंदी पवित्रता में दो डुबकियाँ लगाकर ,
मन-आत्म से हो पावन तन से मलिन गए रे ॥
गर्मी ने आस्माँ से बरसाई आग दिल से ,
बारिश के दिन बेचारे बूँदों के बिन गए रे ॥
थी नींद दूर कोसों और रात घंटों लंबी ,
हम जितने भी थे इक-इक सब तारे गिन गए रे ॥
दुश्मन पे ख़ैर कोई करता नहीं मगर अब ,
अपनों पे भी भरोसा करने के दिन गए रे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१९
हमारा रविवार ==६.७.२०१४
विधा -चौपाई
लेखन विधा -गा गा गा गा गा गा गा गा
१=कलयुग का अब कौन भरोषा /
पाखंडी हैं खात खगोशा //
२=जब तक राम बनें नहि कोई /
रावण नाश कहाँ से होई //
३= बहन -सुता नहि कबहूँ सुरक्षित \
हर -पल ,हर -पग हॉत उपेक्षित //
४=आज कहें हम सुन लो भाई \
हर घर की रोवत हैं माई \\
५=कौन उपाय करें हम मिलकर /
दर्द मिटें रह ले सब हिलकर //
६=जान दुशासन को हम पाये \
मिलकर हम सब मार भगाये \\
७=वापस शाख हमारी आये \
मान प्रतिष्ठा तबहि बच पाये \\
८=जब तक कदम उठत नहि मोरा \
करत प्रकोप रहत घंघोरा \\
९= घुट -घुट मरत रहें इस युग में \
जीवित हम हैं अब किस तम में \\
१०=आलस त्याग चलें हम अब तो \
विपदा करत निवास नहीं तब तो \\
११=नारि पराई माँ सम देखा \
बदलत तुरतहि तुम्हरी रेखा \\
१२=गुरु -तात जबहि सम माना \
सब सुत बनिहैं राम समाना \\
१३=जबसे कुलक्षण करत निवासा \
मात -पिता की टूटी आशा \\
१४= नारि दिसम्बर जो नर पाये \
नारि वहीं घर स्वर्ग बनाये \\
१५=जब अप्रैल बनें है नारी \
नाश करें मर्यादा सारी \\
१६=नारी में गुण बहुत समाया \
नर -तन तब हमको मिल पाया \\
१७=अवगुण की भी नारि खजाना \
तबहि नारि मंथरा जाना \\
१८=इस युग में नारी की माया \
कोई जान नहीं हैं पाया \\
१९= क्षण में माता वह बन जाये \
क्षण में नारि विनाश कराये \\
२०=तिरियाँ बसत-हसत हैं वैसे \
बिन बदली के मौसम जैसे \\
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी
पंच चामर छंद में एक प्रयास
,पञ्च-चामर छन्द **
*इस छन्द के प्रत्येक चरण मॆं लघु गुरू (१+२) की आठ बार आवृत्ति होती है, दो दो चरणॊं की या फ़िर चार चार चरणॊं की तुकान्तता भी होनी चाहिये,इस तरह प्रत्येक चरण मॆं २४ मात्रायें स्वयं ही हो जाती हैं
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -१९
हमारा रविवार ==६.७.२०१४
विधा -चौपाई
लेखन विधा -गा गा गा गा गा गा गा गा
१=कलयुग का अब कौन भरोषा /
पाखंडी हैं खात खगोशा //
२=जब तक राम बनें नहि कोई /
रावण नाश कहाँ से होई //
३= बहन -सुता नहि कबहूँ सुरक्षित \
हर -पल ,हर -पग हॉत उपेक्षित //
४=आज कहें हम सुन लो भाई \
हर घर की रोवत हैं माई \\
५=कौन उपाय करें हम मिलकर /
दर्द मिटें रह ले सब हिलकर //
६=जान दुशासन को हम पाये \
मिलकर हम सब मार भगाये \\
७=वापस शाख हमारी आये \
मान प्रतिष्ठा तबहि बच पाये \\
८=जब तक कदम उठत नहि मोरा \
करत प्रकोप रहत घंघोरा \\
९= घुट -घुट मरत रहें इस युग में \
जीवित हम हैं अब किस तम में \\
१०=आलस त्याग चलें हम अब तो \
विपदा करत निवास नहीं तब तो \\
११=नारि पराई माँ सम देखा \
बदलत तुरतहि तुम्हरी रेखा \\
१२=गुरु -तात जबहि सम माना \
सब सुत बनिहैं राम समाना \\
१३=जबसे कुलक्षण करत निवासा \
मात -पिता की टूटी आशा \\
१४= नारि दिसम्बर जो नर पाये \
नारि वहीं घर स्वर्ग बनाये \\
१५=जब अप्रैल बनें है नारी \
नाश करें मर्यादा सारी \\
१६=नारी में गुण बहुत समाया \
नर -तन तब हमको मिल पाया \\
१७=अवगुण की भी नारि खजाना \
तबहि नारि मंथरा जाना \\
१८=इस युग में नारी की माया \
कोई जान नहीं हैं पाया \\
१९= क्षण में माता वह बन जाये \
क्षण में नारि विनाश कराये \\
२०=तिरियाँ बसत-हसत हैं वैसे \
बिन बदली के मौसम जैसे \\
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
हमारा रविवार -- 6जुलाई प्रात: 10 बजे से 7 जुलाई प्रात: दस बजे तक
विषय ---शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छन्दं इत्यादि
अध्यक्ष्ा---रजनीश तपन जी
पंच चामर छंद में एक प्रयास
,पञ्च-चामर छन्द **
*इस छन्द के प्रत्येक चरण मॆं लघु गुरू (१+२) की आठ बार आवृत्ति होती है, दो दो चरणॊं की या फ़िर चार चार चरणॊं की तुकान्तता भी होनी चाहिये,इस तरह प्रत्येक चरण मॆं २४ मात्रायें स्वयं ही हो जाती हैं
रगण जगण रगण जगण रगण + गुरु
यानि, १२१ २१२ १२१ २१२ १२१ +२ ..
तुकान्त क्रमशः अरे, अजे,अरा,अरो
महाकराल कंठ नाग रौद्ररूप को धरे
पिनाक धारि के सदा अकाल काल को हरे
सदा रहे शिवोन्मुखी न पाप ताप सों जरे
प्रभो बिसारि मोह मान दीन वंदना करे
प्रचंड वेग गंग की जटा गुथी रहे रजे
गले सुहाय मुंडमाल भाल चंद्रमा सजे
कराल कालरुद्र रूप मान देवता भजे
अपार रूपराशि देख लाख चंद्रमा लजे
त्रिनेत्र क्रोध ताप बीच कामदेव भी जरा
धराधरेन्द्र नंदिनी बनी प्रिया उन्हें वरा
हुआ परास्त काल तो प्रचंड दैत्य भी डरा
विमोह मान त्याग के सती पिता तभी तरा
भजूं शिवा शिवो प्रभो अपार बंध को हरो
विराग द्वेष मेटि के सप्रेम भाव को भरो
बिसारि पाप मोर दास मान दोष ना धरो
कहां बुलाय के जपूं हिया सदा बसा करो
-------प्रियंका
यानि, १२१ २१२ १२१ २१२ १२१ +२ ..
तुकान्त क्रमशः अरे, अजे,अरा,अरो
महाकराल कंठ नाग रौद्ररूप को धरे
पिनाक धारि के सदा अकाल काल को हरे
सदा रहे शिवोन्मुखी न पाप ताप सों जरे
प्रभो बिसारि मोह मान दीन वंदना करे
प्रचंड वेग गंग की जटा गुथी रहे रजे
गले सुहाय मुंडमाल भाल चंद्रमा सजे
कराल कालरुद्र रूप मान देवता भजे
अपार रूपराशि देख लाख चंद्रमा लजे
त्रिनेत्र क्रोध ताप बीच कामदेव भी जरा
धराधरेन्द्र नंदिनी बनी प्रिया उन्हें वरा
हुआ परास्त काल तो प्रचंड दैत्य भी डरा
विमोह मान त्याग के सती पिता तभी तरा
भजूं शिवा शिवो प्रभो अपार बंध को हरो
विराग द्वेष मेटि के सप्रेम भाव को भरो
बिसारि पाप मोर दास मान दोष ना धरो
कहां बुलाय के जपूं हिया सदा बसा करो
-------प्रियंका
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