Wednesday, 16 July 2014

गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह 20 हमारा रविवारा दिनांक 13 जुलाई 2014 से 14 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष आदरणीय कृष्‍णा नन्‍दन मौर्य

इस प्रकार गोपाल राम गहमर साहित्‍य समारोह 20 का दूसरा चरण हमारा रविवारा  दिनांक 13 जुलाई 2014 से 14 जुलाई 2014 अध्‍यक्ष आदरणीय कृष्‍णा नन्‍दन मौर्य एवं आप सब के सहयोग से पूर्ण हुआ हम आप सब रचनाकारों का हार्दिक अभिनंन्‍दन करते है तथा अापके स्‍वस्‍थ जीवन एवं उज्‍जवल भविष्‍य की कामना करते है।
इस समारोह में क्रमस गीता वर्मा जी,एस आर पल्‍लव जी, सुरश्‍ेा मिश्रा उत्‍साही जी, रेखा जोशी जी,नितिन सिकारवार पागल जी, कल्‍याणी झा जी,लक्ष्‍मण प्रसाद लाडीवाल जी, हितेश शर्मा जी, रमा वर्मा जी, डा0 हीरा लाल प्रजापित जी, करण एस पी जी, कान्‍ती शुक्‍ला जी, सतीश वर्मा जी, अखंड गहमरी ने अपनी रचना प्रस्‍तुत किया आप सब का हार्दिक आभार

इस कार्यक्रम की विजेता गीता वर्मा जी रही जो आगामी कार्यक्रम की अध्‍यक्षा रहेगी


Geeta Verma
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
विधा - गीत
मापनी-2122,1212,22
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत- आस है फिर से।
प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-आऊँ 2-आनी थी 3-एरा था।
आयोजन प्रमुख सम्मान्य अध्यक्ष श्री. कृष्ण नन्दन मौर्य जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर।
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आज मौसम उदास है फिर से
तू मेरे दिल के पास है फिर से!
पूरा सागर छलक गया लेकिन,
एक कतरे की प्यास है फिर से!
...
तू जो कह दे तो मैँ घटा बन के
तुझ को छू लूँ अभी बरस जाऊँ!
आये बैठे जरा सुने मुझको
जाने कितने ही गीत मैँ गाऊँ!
क्यूँ समर्पण का भाव आया है
तुझसे कैसी ये आस है फिर से!
क्या कहूँ कैसी जिंदगानी थी
तू नहीँ था तो क्या कहानी थी!
एक समन्दर था घिरा तूफाँ से
और कश्ती मेरी पुरानी थी!
तू जो आया तो जी उठी हूँ मैँ
मेरी साँसो मेँ साँस है फिर से!
क्या कहूँ किस कदर अँधेरा था
और निराशा ने मुझको घेरा था!
सारे मंजर मुझे डराते थे
और बस खौफ का बसेरा था!
तू जो आया है दीप बन करके
मेरे दिल मेँ उजास है फिर से!
………geet


S.r. Pallav
साहित्य समारोह - 20
द्वितीय चरण- गीत गजल-
शिल्प विधान -
1222 1222 1222 1222
काफिया- आते,
रदीफ- हैँ
अतिथि रचना -
मुहब्बत मेँ कभी ऐसे रँगी लमहे भी आते हैँ
कि दो पल को जमाने के सभी गम भूल जाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
मेरे पहलू मेँ आकर तुम
चलो भी दो कदम तो सँग
नजारे खुद ही राहोँ मेँ बहारोँ को बिछाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
कभी इन्तजार की घडियाँ
कभी बस प्यार की घडियाँ
यही है ख्वाब कुछ ऐसे जो हर दिल को लुभाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
कभी इस राहे उल्फत मेँ
तन्हाई मेँ , जवाँ रुत मेँ
हँसी रहबर के सँग गुजरे हुए दिन याद आते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
उन्हेँ चाहेँ भुलाना भी
खयालोँ मेँ न लाना भी
मगर उतना निकट आते कि जितना दूर जाते हैँ ।
मुहब्बत मेँ . . . . .
. . . . . . . . . . . . . पल्लव *

हमारा रविवार =२०
अध्यक्ष्य -आ .कृष्ण नंदन मौर्य जी के चरणो में
मात्रा भार =१६/१६
मुकरिया विधा
१== नारी देख आज हरशाये
सोच यहीं उलटा मन भाये
यही सोच रावण हैं जीता
क्या सख़ि साजन ,ना सखि सीता
२== देखों उपजा प्रेम अगाधा
आज्ञा मिली लक्ष्य हैं साधा
तेल तरल सृजन है तसली
क्या सख़ि साजन,ना सखि मछली
३==प्रथम मेल वाटिका करवाये
देखे वहा तभी शरमाये
सोच रही हूँ बनूं संगनी
क्या सख़ि साजन,ना सखि सुगनी
४== टूटा अपना जीवन नाता
सुन लो यही सत्य हैं भ्राता
मारा मुझको करा ना भक्षण
क्या सख़ि साजन,ना सखि लक्ष्मण
५== तेरा नाम सुना था पहले
मेरी गलती कुछ भी कह ले
खाओ झूठा हूँ मैं पगली
क्या सख़ि साजन,ना सखि कदली
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७१०६६१
९६३४७६३०७६

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
अध्‍यक्ष-- कृष्ण नन्दन मौर्य जी
विधा ग़ज़ल
मापनी/बहर --1222 1222 122
काफ़िया --आ
रदीफ़ -अब ज़िंदगी में
तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में
न हो हमसे खफा अब ज़िंदगी में
रहे तन्हा बिना तेरे सहारे
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में
बहुत रोये सनम तेरे लिये हम
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में
तड़प तुम यह हमारी देख ले अब
मिले जो इस दफा अब ज़िंदगी में
न कर शिकवा बहारों से सनम तू
नही वह बेवफा अब ज़िंदगी में
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार
विधा- ग़ज़ल,
मापनी- 1221 2212 2122
काफिया- आने
रदीफ़- की कोशिश
अध्‍यक्ष-- कृष्ण नन्दन मौर्य जी
शुरू हो गई है भुलाने की कोशिश ।
मुझे अपने दिल से मिटाने की कोशिश ।
नहीं बाज आते वो आदत से अपनी,
कदम दर कदम आजमाने की कोशिश ।
इरादे जुदा लग रहे हैं सनम के,
नहीं है फकत ये सताने की कोशिश ।
हमें इश्क ने ये तज़ुर्बा दिया है,
न करना कभी दिल लगाने की कोशिश ।
मिले तीरगी ज़िस्त में तो बताना,
करूँगा मैं खुद को जलाने की कोशिश ।
भूला दूँगा मैं रास्ता मैकदों का,
कभी आँखों से कर पिलाने की कोशिश ।
मेरी जान ले लेगी इक दिन तुम्हारी,
ये 'पागल' से दामन छुड़ाने की कोशिश ।

नितिन सिकरवार 'पागल'

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--२०
विधा-गजल
काफिया -आ , रदीफ-रहा ,
मापनी -२१२--२१२--२१२--२१२
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प्यार में सुनो सनम खोता रहा
कल्पना बीज यार मैं बोता रहा
समय तो भागता-भागता ही रहा
यार आराम से खूब सोता रहा
ठोकर लगी मैं सुधरने लगा यार
प्यार मैं क्यों पड़ा सोच रोता रहा
प्यार तो होता लुभावन बड़ा
दोस्त इस पर कुर्बान होता रहा
यार अब तुम सब मेरी हाल न पुछो
यार अपनी नसीब तो खोटा रहा
"कल्याणी झा"
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20 दूसरा चरण-
दोहे शिल्प विधान – दोहा छंद में १३,११ मात्राओं के चार चरण होते हैं ! विषम चरण का अंत गुरु से और सम चरण का गुरु लघु (२१) के तुकांत से करते हैं ! दोहे के विषम चरण में आंतरिक व्यवस्था 3-3 4 3, या 4-4 3 3 श्रेष्ठ मानी जाती है | विषम चरणों का प्रारम्भ जगण अर्थात १२१ मात्राभार वाले 'स्वतंत्र शब्द' से नहीं होता है !इसकी एक विशेष लय होती है !
मिलता मान असीम (दोहें)
भौतिक सुख घटता रहे, इसका काल ससीम
बढ़ता जाए आत्म सुख, मिलता रहे असीम |
आत्मा जिससे तृप्त हो, उससे नहीं थकान
जिससे मिलता सुख बहुत,उसको ले पहचान |
भौतिक सुख की चाहना, मन में रहे असीम
सीमित तन मन शक्ति को,समझे राम रहीम |
निजता में झाँके नहीं, सिमित करे सम्बन्ध,
ताका झाँकी तोड़ती, सीमा के तटबंध |
निजता में भी कर सके, निश्छल प्रेम प्रवेश
प्रेम पूर्ण व्यवहार हो, मन में रहे न द्वेष |
प्रेम पूर्ण व्यवहार से, मिलता मान असीम,
वरना निजता लांघना, रिश्ता करे ससीम |
-लक्ष्मण प्रसद लडीवाला

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
समारोह अध्यक्ष श्री कृष्ण नन्दन मौर्य जी को समर्पित निम्न रचना आप सबके समक्ष सादर प्रस्तुत कर रहा हूँ. कृपया स्नेहाशीष दें.
विधा - मत्तगयन्द सवैया
शिल्प विधान - चार चरणों का मात्रिक छंद, प्रत्येक चरण में भानस की सात आवृत्तियों के बाद दो गुरु. अर्थात "भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गा गा".
रचना परिचय - भगवान श्री कृष्ण के बृज से जाने के प्रसंग के एक अंश को निम्न मत्तगयंद सवैयों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उनके जाने की सूचना से राधा रानी व्याकुल हैं, मधुसूदन स्वयं व्याकुल हैं और निर्जीव सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी भी व्याकुल है।
जाय रहे बृज से नँदलाल सुनी बस हाल भुला रहिं राधा।
दौरि परी घट छोरि सखी बिन पादुप पंथ भुला रहिं राधा।
झूठ खिझाय रहे सबही मन धीरज खूब दिला रहिं राधा।
माखनचोर बसैं हियँही मन मा सब देव मना रहिं राधा।।
नन्द दुवार जुरी लखि भीर झुराय गयीं पथरा गयिं राधा।
देखि परे मुरलीधर तो कर जोरि उन्है बुलवा गयिं राधा।
होंठन बोलि सकीं न कुछौ हिय की पर पीर बता गयिं राधा।
प्रीत कि रीति निभाय गयीं अरु नैनन नीर छिपा गयिं राधा।।
आय गये अकरूर लिये रथ जानि गए मुरझा फिर कान्हा।
दौरि परे सब छोरि सखी दधि माखन खेल भुला फिर कान्हा।
जाय यशोमति अंक छिपे अरु आँचल में सिमटा फिर कान्हा।
ना जइहौं हम रोकि लियौ तुम बोलि गले चिपटा फिर कान्हा।।
द्वार दिखीं वृषभानुसुता झट दौरि परे सँकुचावत कान्हा।
अंदर अंदर रोय रहे प्रिय ढाँढस खूब दिलावत कान्हा।
आज गए बस आ जइहौं तुम देखि लिहो बतलावत कान्हा।
प्रीत कि रीति निभाय रहे प्रिय के मन को समझावत कान्हा।।
नित्य बजै पर आज भई चुप भीतर से अकुला रहि बंसी।
देखि रही चुपचाप परी सब पोरन नीर बहा रहि बंसी।
होंठ लगाय मुरारि लिये सब पीर हिये बिसरा रहि बंसी।
बाजि रही मुरलीधर के मन प्रीत कि रीत निभा रहि बंसी।।
- हितेश शर्मा “पथिक”, लखनऊ

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
अध्‍यक्ष-- आदरणीय कृष्ण नन्दन मौर्य जी को सादर समर्पित
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विधा - ग़ज़ल
काफ़िया - अता
रदीफ़ - हम क्या करें
मापनी - 2122 / 2122 / 212
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दिल कहीं लगता नहीं हम क्या करें |
चाँद भी ढलता नहीं हम क्या करें ||१||
चांदनी भी सो गई है रात में |
आसमां मिलता नहीं हम क्या करें ||२||
ढूंढती थी ये नजर जिसको सदा |
वो कहीं दिखता नहीं हम क्या करें ||३||
शाख से टूटा हुआ पत्ता कभी |
शाख पे जुड़ता नहीं हम क्या करें ||४||
आँख में आंसू भरे हों तो वहां |
ख्वाब भी पलता नहीं हम क्या करें ||५||
दर्द जो दिल में दबा है वो कभी |
आँख से बहता नहीं हम क्या करें ||६||
दिल जरा नाजुक कली सा है 'रमा' |
दर्द ये सहता नहीं हम क्या करें ||७||
~रमा वर्मा~

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
13 जुलाई रविवार प्रात: 10 बजे से 14 जुुलाई सोमवार प्रात: 10बजे तक
अध्‍यक्ष--समारोह 19 के बिजेता कृष्ण नन्दन मौर्य जी
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विधा - ग़ज़ल
काफ़िया - अड़के
रदीफ़ - यहाँ
मापनी - 2122 / 2122 / 2122 / 212
[ छूट ली है - ढ़ , सड़कें ]
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क्या मिलेगा रात दिन सब छोड़ कर पढ़के वहाँ II
माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ II
जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ,
जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ II
ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी ,
उनका दिल तक कर हसीनाओं को न धड़के यहाँ II
कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ ,
अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ II
कुछ कुसूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो ,
रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ II
उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें ,
जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ II
पहले थर्राते थे दरवाज़ो शज़र तूफाँ से सच ,
खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 20
विधा- गीत
शिल्प- मुखडे तथा अंतरोँ की सभी पंक्तियोँ की मापनी-
2122, 2122, 2122, 2122
मुखडे का तुकान्त- आना
अंतरोँ का तुकान्त-
1- आन बनकर
2- अजीले
3- अको मे
ँँँँँ
समारोह अध्यक्ष आदरणीय कृष्णनंदन मौर्य जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
हे विकल पथ के अकिंचन, धैर्य से पग तू बढाना।
ओढ साहिल पे खडे हैं, खार खल योगी का बाना।
तू सफल गर मंजिलोँ मेँ, हो गया इंसान बनकर।
तो समझ तेरा ये जीवन, बढ चला संज्ञान बनकर।
बस भ्रमित इन साहिलोँ पर, तू नजर को मत घुमाना।
ओढ...(1)
खीँच ले गर प्रीति बनकर, हुस्न के बंधन सजीले।
चंदनोँ सी लेप मे जो, छिप रहे नैना लजीले।
ओज कण को फिर सजग हो, दलदलोँ मे तू गिराना।
ओढ....(2)
बन गया अंजान हर नर, हिमशिखर की ठंडकों में।
मिट गयी इंसानियत अब, द्वेश पशुता बंधकों मेँ।
तू नवल प्रतिदान बनकर, कर्म पथ अपना सजाना।
औढ...(3)
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन-

गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह २०
शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
रविवार १३ जुलाई प़ात: १० बजे से सोमवार १४ जुलाई प़ात: १०बजे तक
समारोह अध्यक्ष -सम्मान्य श्री कृष्ण नंदन मौर्य जी को सादर समर्पित
ग़ज़ल
मात्रा भार-२१२२ २१२२ २
काफिया-आब
रदीफ़ -देखा है
आज फिर एक ख्वाब देखा है ।
कहीं खिलता गुलाब देखा है ।
आसमां की ऊंचाई छूने को
मैंने उड़ता उकाब देखा है ।
हरी फसलों के शेर लिखते हुए
किसान इक कामयाब देखा है ।
धूल की पैरहन पहन के भी खुश
ऐसा इक बेहिजाब देखा है ।
एक मजदूर माँ के बच्चे को
मैंने पढ़ते किताब देखा है ।
घने दरख्त के झुरमुट में अटक
झांकता माहताब देखा है ।
शुक्रिया की नमाज़ करते अदा
एक मुफलिस शबाब देखा है ।
सहर होने का इशारा लेकर
निकलता आफताब देखा है ।
खोया ज्यादा है और कम पाया
मैंने पिछला हिसाब देखा है ।
कान्ति शुक्ला


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन के अंतर्गत :
अध्‍यक्ष--समारोह 19 के बिजेता कृष्ण नन्दन मौर्य जी को सादर समर्पित ।
( अन्य स्नेहिल मित्रों के अवलोकानार्थ , प्रतिक्रिया आमंत्रण के अनुरोध के संग )
स्थायीभाव, करुण रस, आलाम्बन विभाव : प्रेयसी , उद्दीपन विभाव : वियोग व्यथा ।
मुखड़े का मात्रा भार : 28, अंतरें का मात्राभाव : 44.
शीर्षक : अब रूप ऐसा हमारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
ज्यों नाविक कोई,
मंझधार बीच,
दिशा बोध खोकर,
कोशिश में लगा,
पा जाये किनारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
जैसे क्लांत पुष्प,
धरा पर गिर कर,
चाह रखे दिल में,
रूष्ठ सौरभ को,
पा जाये दुबारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
जैसे विरही एक,
खोकर निज प्यार,
जीवन से विरत,
खोजे फिर भी,
जीने का कोई सहारा ।
खोकर प्यार तुम्हारा,
अब रूप ऐसा हुआ हमारा ।
: सतीश वर्मा
मुम्बई/ 13.07.2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--20
दूसरा चरण- हमारा रविवार --शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद लेखन
अध्‍यक्ष-- आदरणीय कृष्ण नन्दन मौर्य जी एवं सम्‍पूर्ण मंच को समर्पित
विधा ' गजल
काफिया -- आते
रदीफ --रहे
बहर 212 212 212 212
गीत गा कर उसे हम सुनाते रहे
हाल दिल का उसे हम बताते रहे
रात भी तो गुजरने लगी थी मगर
पास आये न बाते बनाते रहे
प्‍यार उन से करे हम कहाँ बैठ जब
चाँद से भ्‍ाी उसे हम छुपाते रहे
प्‍यार हमने किया प्‍यार उसने किया
वो मिटाते रहे हम निभाते रहे
माँग उसकी सजाई लहू से मगर
साथ चल ना सके हम बुलाते रहे
फिर मिलेगे कभी ना कभी हम यहाँ
आस के दीप मन में जलाते रहे
अखंड गहमरी
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''7777आप सब रचनाकारो को हार्दिक नमन

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