गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -22 दिनांक 24 जुलाई से 25 जुलाई के अंन्तगर्त शिल्प और शिल्पी कार्यक्रम अध्यक्ष आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी के सहयोग से समाप्त हुआ ।
इस कार्यक्रम के अन्तगर्त आदरणीय हितेश शर्मा जी, विनोद राजपूत जी, डा0शिप्रा शिल्पी जी,करण एस पी जी,नागेन्द्र सिह निरवाण जी, सुरेश कुमार मिश्रा जी,आलोक मित्तल जी, रमा वर्मा जी,रजनीश तपन जी, लक्ष्मण प्रसाद लाडीवाल जी ने अपनी रचनाए प्रस्तुत किया हम आप सब के आभारी है।
इस कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ शिल्प और शिल्पी का पुरस्कार आदरणीय हितेश शर्मा पथिक जी को दिया जाता है। हम आपके स्वस्थ जीवन एवं उज्जवल भविष्य की कामना करते है।
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
24 जुलाई गुरूवार 10 बजे से 25 जुलाई शुक्रवार 10 बजे तक
अध्यक्ष --आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी विद्वजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - घनाक्षरी छंद
शिल्प - चार चरणों का छंद, जिसके प्रत्येक चरण में ३१ वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण में यति १६,१५ वर्णों पर।
विशेष - निम्न रचना में सिंहावलोकन का प्रयोग भी है।
रचना:
गायेंगे जो प्रेम गीत प्रेम की फुहार भीग
प्रेम के गुलाबी रंग रँग आप जायेंगे।
जायेंगे बँधे किसी की प्रेम डोर से परन्तु
बंधनों में होंगे जो अनूप भाव भायेंगे।
भायेंगे खिले से फूल भायेगी बहार किन्तु
चाह के भी भावना बता न आप पायेंगे।
पायेंगे खुशी कि मंद मंद मुस्करायेंगे व
भूल रीत भूल राग प्रेम गीत गायेंगे।
- हितेश शर्मा "पथिक"
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
24 जुलाई गुरूवार 10 बजे से 25 जुलाई शुक्रवार 10 बजे तक
अध्यक्ष --आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी विद्वजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
24 जुलाई गुरूवार 10 बजे से 25 जुलाई शुक्रवार 10 बजे तक
अध्यक्ष --आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित निम्न रचना आप सभी विद्वजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - घनाक्षरी छंद
शिल्प - चार चरणों का छंद, जिसके प्रत्येक चरण में ३१ वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण में यति १६,१५ वर्णों पर।
विशेष - निम्न रचना में सिंहावलोकन का प्रयोग भी है।
रचना:
गायेंगे जो प्रेम गीत प्रेम की फुहार भीग
प्रेम के गुलाबी रंग रँग आप जायेंगे।
जायेंगे बँधे किसी की प्रेम डोर से परन्तु
बंधनों में होंगे जो अनूप भाव भायेंगे।
भायेंगे खिले से फूल भायेगी बहार किन्तु
चाह के भी भावना बता न आप पायेंगे।
पायेंगे खुशी कि मंद मंद मुस्करायेंगे व
भूल रीत भूल राग प्रेम गीत गायेंगे।
- हितेश शर्मा "पथिक"
शिल्प - चार चरणों का छंद, जिसके प्रत्येक चरण में ३१ वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण में यति १६,१५ वर्णों पर।
विशेष - निम्न रचना में सिंहावलोकन का प्रयोग भी है।
रचना:
गायेंगे जो प्रेम गीत प्रेम की फुहार भीग
प्रेम के गुलाबी रंग रँग आप जायेंगे।
जायेंगे बँधे किसी की प्रेम डोर से परन्तु
बंधनों में होंगे जो अनूप भाव भायेंगे।
भायेंगे खिले से फूल भायेगी बहार किन्तु
चाह के भी भावना बता न आप पायेंगे।
पायेंगे खुशी कि मंद मंद मुस्करायेंगे व
भूल रीत भूल राग प्रेम गीत गायेंगे।
- हितेश शर्मा "पथिक"
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह-22
विधा-गीत
शिल्प- गीत की सभी पंक्तियोँ की मापनी-16/14
मुखडे का तुकान्त- तुकान्त-लगता है।
अंतरोँ का तुकान्त - आली, गया, अन में, ओली।
आदरणीय अध्यक्ष पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित
----------------------------------------------------------------------
मेरे बचपन के गाँव की कुछ मधुर स्मृतियाँ गीत के रूप में कागज पर उतर आयीं हैं।
----------------------------------------------------------------------------------------------------
जबसे छूटा गाँव सुहाना , शहर बेगाना लगता है।
किससेे कह दें दिल का आंगन सूना सूना लगता है।
विधा-गीत
शिल्प- गीत की सभी पंक्तियोँ की मापनी-16/14
मुखडे का तुकान्त- तुकान्त-लगता है।
अंतरोँ का तुकान्त - आली, गया, अन में, ओली।
आदरणीय अध्यक्ष पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित
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मेरे बचपन के गाँव की कुछ मधुर स्मृतियाँ गीत के रूप में कागज पर उतर आयीं हैं।
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जबसे छूटा गाँव सुहाना , शहर बेगाना लगता है।
किससेे कह दें दिल का आंगन सूना सूना लगता है।
छूट गये सब संगी साथी, छूट गयी सब हरियाली,
छूट गये सब खेत बाग वन, पनघट की मीठी गाली।
सांझ ढ़ले का सूरज भी अब कितना सूना लगता है।
दो लम्हों का आया सावन, रेत उड़ाकर बीत गया,
बरस बरस कर रिमझिम सावन, सूना दिल भी रीत गया।
भीड़ भरी राहों में इंसा कितना सूना लगता है।
पीली चूनर ओढ़े सरसों, मँहके बेला आंगन में,
बन के मयूरा नाच उठे मन, तुम गाओ जब सावन में।
लवों पर नहीं आतीं सब बातें कितना सूना लगता है।
पनघट की वो हँसी ठिठोली, छूटी मस्तों की टोली
मेलों की वो रौनक प्यारी, छूट गयी मीठी बोली।
बासंती मौसम भी बिलकुल, पतझड सूना़ लगता है।
-विनोद
छूट गये सब खेत बाग वन, पनघट की मीठी गाली।
सांझ ढ़ले का सूरज भी अब कितना सूना लगता है।
दो लम्हों का आया सावन, रेत उड़ाकर बीत गया,
बरस बरस कर रिमझिम सावन, सूना दिल भी रीत गया।
भीड़ भरी राहों में इंसा कितना सूना लगता है।
पीली चूनर ओढ़े सरसों, मँहके बेला आंगन में,
बन के मयूरा नाच उठे मन, तुम गाओ जब सावन में।
लवों पर नहीं आतीं सब बातें कितना सूना लगता है।
पनघट की वो हँसी ठिठोली, छूटी मस्तों की टोली
मेलों की वो रौनक प्यारी, छूट गयी मीठी बोली।
बासंती मौसम भी बिलकुल, पतझड सूना़ लगता है।
-विनोद
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
विधा - ग़ज़ल
मापनी/बह्र- १२२२ /१२२२
काफिया- आ
रदीफ- क्या है
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
विधा - ग़ज़ल
मापनी/बह्र- १२२२ /१२२२
काफिया- आ
रदीफ- क्या है
मुझे आखिर हुआ क्या है ?"
दिलो-जाँ ये वफ़ा क्या है ?"
तुम्ही को चाहती हूँ मैं,
बता मेरी खता क्या है?"
जली हूँ इश्क में हर पल
बता तेरी रज़ा क्या है?"
रही चल साँस तेरे बिन
बड़ी इससे सज़ा क्या है?"
न आना था न आये तुम
बताओ फिर दग़ा क्या है?"
अँधेरा भा रहा मुझको,
उज़ाले की सदा क्या है ?"
खुली आँखे रही मर कर
अज़ब ये इंतहाँ क्या है ?"..........Dr.SHIPRA
दिलो-जाँ ये वफ़ा क्या है ?"
तुम्ही को चाहती हूँ मैं,
बता मेरी खता क्या है?"
जली हूँ इश्क में हर पल
बता तेरी रज़ा क्या है?"
रही चल साँस तेरे बिन
बड़ी इससे सज़ा क्या है?"
न आना था न आये तुम
बताओ फिर दग़ा क्या है?"
अँधेरा भा रहा मुझको,
उज़ाले की सदा क्या है ?"
खुली आँखे रही मर कर
अज़ब ये इंतहाँ क्या है ?"..........Dr.SHIPRA
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह-22
विधा-गीत
शिल्प- गीत की सभी पंक्तियोँ की मापनी-16/14
मुखडे का तुकान्त-अन मे
अंतरोँ का तुकान्त
1-आई/आर करें
2-आज धरे/अलूँ
3-अती/अनोँ की
विधा-गीत
शिल्प- गीत की सभी पंक्तियोँ की मापनी-16/14
मुखडे का तुकान्त-अन मे
अंतरोँ का तुकान्त
1-आई/आर करें
2-आज धरे/अलूँ
3-अती/अनोँ की
आदरणीय अध्यक्ष पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित
आज बहारेँ सज के आयीँ,तन अन्तस मन आँगन मेँ।
वर्षोँ बाद पिया हैँ आये,सखी फुहारित सावन मेँ।
झूम उठे मकरंद बाग में,कली कली है मुस्काई।
पुष्प दलोँ में यौवन उमडा,क्यारी क्यारी अँगडाई।
तनें और शाखाएँ हँसकर,मौसम का मनुहार करेँ।
हरी पत्तियाँ सूर्य कणोँ से,ऊर्जा ले श्रृंगार करेँ।
झूम उठी सखि मै प्रीतम सँग,जगी प्रीति अब पाहन मेँ।
देख सखी मेरे ये कंगन,पिया प्रेम का साज़ धरे।
मंगल सूत्र पडा जो गल में,कान्त शक्ति सरताज धरे।
सखियोँ के सँग झूलन को मै, कर सुहाग श्रृंगार चलूँ।
तब पिय बैठ दूर से देखेँ,यही आश की छाँव पलूँ।
मिलते रहेँ नैन से नैना,बैठ हिडोला वाहन मेँ।
बन्द दिलों मे दीप सजाकर, भाव समर्पण का रखती।
प्रीति सदा पावन मै रखकर,मधुरित जीवन को करती।
हे परमेश्वर जग के पालक,प्यास बनूँ पिय नयनोँ की।
सीता सदा बिराजे हिय मेँ,लाज रखूँ पति गहनोँ की।
नम्र शिष्ट सेवार्थ गुणोँ से,भरूँ खुशी घर आँगन मेँ।
ँ
करन एस पी
आज बहारेँ सज के आयीँ,तन अन्तस मन आँगन मेँ।
वर्षोँ बाद पिया हैँ आये,सखी फुहारित सावन मेँ।
झूम उठे मकरंद बाग में,कली कली है मुस्काई।
पुष्प दलोँ में यौवन उमडा,क्यारी क्यारी अँगडाई।
तनें और शाखाएँ हँसकर,मौसम का मनुहार करेँ।
हरी पत्तियाँ सूर्य कणोँ से,ऊर्जा ले श्रृंगार करेँ।
झूम उठी सखि मै प्रीतम सँग,जगी प्रीति अब पाहन मेँ।
देख सखी मेरे ये कंगन,पिया प्रेम का साज़ धरे।
मंगल सूत्र पडा जो गल में,कान्त शक्ति सरताज धरे।
सखियोँ के सँग झूलन को मै, कर सुहाग श्रृंगार चलूँ।
तब पिय बैठ दूर से देखेँ,यही आश की छाँव पलूँ।
मिलते रहेँ नैन से नैना,बैठ हिडोला वाहन मेँ।
बन्द दिलों मे दीप सजाकर, भाव समर्पण का रखती।
प्रीति सदा पावन मै रखकर,मधुरित जीवन को करती।
हे परमेश्वर जग के पालक,प्यास बनूँ पिय नयनोँ की।
सीता सदा बिराजे हिय मेँ,लाज रखूँ पति गहनोँ की।
नम्र शिष्ट सेवार्थ गुणोँ से,भरूँ खुशी घर आँगन मेँ।
ँ
करन एस पी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह--22
प्रथम चरण--शिल्प और शिल्पी, अध्यक्ष-आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
विधा-दोहा
छंद विधान-दोहा एक मात्रिक छंद है जिसके प्रथम व तृतीय चरण में 13-13 तथा दूसरे व चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होतीं हैं।अंत में लघु होना आवश्यक है।
******************************************************************
******************
दोहे-
1.
पावन बंधन प्रेम का, राखी का त्योहार ।
भाई-बहिना सम नहीं, रिश्ता इस संसार।।
2.
राखी कहना वीर से,मेरी यह फरियाद ।
भूला तू अपनी बहन, पर तू मुझको याद।।
3.
कच्चा धागा प्रेम का, भेज रही हूँ खास।
चाहे जितनी दूर तू ,मन तो तेरे पास ।।
4.
बंधन रक्षा-सूत्र का, है सदियों की रीत ।
बहिना का रक्षा-कवच, इसमें अनुपम प्रीत।।
( नागेन्द्र सिंह निरवाण )
प्रथम चरण--शिल्प और शिल्पी, अध्यक्ष-आदरणीय पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
विधा-दोहा
छंद विधान-दोहा एक मात्रिक छंद है जिसके प्रथम व तृतीय चरण में 13-13 तथा दूसरे व चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होतीं हैं।अंत में लघु होना आवश्यक है।
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दोहे-
1.
पावन बंधन प्रेम का, राखी का त्योहार ।
भाई-बहिना सम नहीं, रिश्ता इस संसार।।
2.
राखी कहना वीर से,मेरी यह फरियाद ।
भूला तू अपनी बहन, पर तू मुझको याद।।
3.
कच्चा धागा प्रेम का, भेज रही हूँ खास।
चाहे जितनी दूर तू ,मन तो तेरे पास ।।
4.
बंधन रक्षा-सूत्र का, है सदियों की रीत ।
बहिना का रक्षा-कवच, इसमें अनुपम प्रीत।।
( नागेन्द्र सिंह निरवाण )
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२२
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी
विधा -ग़ज़ल -
बहर=सम मात्रिक =गागा गागा गागा गागा
काफ़िया -अते
रदीफ़ -रहना
अध्यक्ष --आदरनिये -श्रेष्ठ पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी
विधा -ग़ज़ल -
बहर=सम मात्रिक =गागा गागा गागा गागा
काफ़िया -अते
रदीफ़ -रहना
अध्यक्ष --आदरनिये -श्रेष्ठ पुष्पेन्द्र यादव जी को समर्पित
जब तक करुणा पिघल जाये ,चाव दरश के पलते रहना
मिल न सकें जब प्रभु का मंदिर ,दीपक तब तक जलते रहना (१)
निकल पड़े जब मंजिल पाने ,मानवता साथ निभाना हैं
जब तक लक्ष्य मिलें नहि तुमको ,पथ पर राही चलते रहना (२)
मन चाहा पा लेने को हैं ,यह जीवन मिलता मानव हैं
राह निराली युग की देखों ,तुम सत्य मार्ग पर बढतें रहना (३)
उस गागर की उम्र बड़ी हैं ,पनघट पर प्यासें को जोहें
जब तक प्यास बुझे नहि सबकी ,हिमगिरि तुम नित गलते रहना (४)
जल धारा भी पूज्य वहीँ हैं ,जो धरती अम्बर को जोड़ें
अवतरण नहीं जब तक माँ का ,भागीरथ सा भगते रहना (५)
कौन डिगा दे नियत हमारी ,हम चिर ज्योति पुंज के सुत हैं
नाथ मिले नहि जब तक हमको ,मेरे प्राण पिघलते रहना (६)
हमको सतत प्रकाश दिला दो ,मूल्य चुकाने हम प्रस्तुत हैं
बिखर गया हूँ इस दुनिया में ,नाम सभी यह जपते रहना (७)
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
Alok Mittal
मिल न सकें जब प्रभु का मंदिर ,दीपक तब तक जलते रहना (१)
निकल पड़े जब मंजिल पाने ,मानवता साथ निभाना हैं
जब तक लक्ष्य मिलें नहि तुमको ,पथ पर राही चलते रहना (२)
मन चाहा पा लेने को हैं ,यह जीवन मिलता मानव हैं
राह निराली युग की देखों ,तुम सत्य मार्ग पर बढतें रहना (३)
उस गागर की उम्र बड़ी हैं ,पनघट पर प्यासें को जोहें
जब तक प्यास बुझे नहि सबकी ,हिमगिरि तुम नित गलते रहना (४)
जल धारा भी पूज्य वहीँ हैं ,जो धरती अम्बर को जोड़ें
अवतरण नहीं जब तक माँ का ,भागीरथ सा भगते रहना (५)
कौन डिगा दे नियत हमारी ,हम चिर ज्योति पुंज के सुत हैं
नाथ मिले नहि जब तक हमको ,मेरे प्राण पिघलते रहना (६)
हमको सतत प्रकाश दिला दो ,मूल्य चुकाने हम प्रस्तुत हैं
बिखर गया हूँ इस दुनिया में ,नाम सभी यह जपते रहना (७)
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३०७६
Alok Mittal
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
****************************************************
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
****************************************************
विधा - गज़ल
मापनी- २२२२ २२२२
फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन
काफिया - आ
रदीफ नहीं लिया है
*******************************
दिल उसका जब हमने तोडा
रोता उसको हमने छोड़ा
तनहा तनहा लगता था वो
उससे फिर इक नाता जोड़ा .
इन आँखों से पूछो तो तुम
तुमने जब से मुंह है मोड़ा
भूल गए जब जब तुम हमको
दिल रोया था थोड़ा थोड़ा
तुम अब जाना तो कह देना
न बनेगें रस्ते का रोड़ा
----"आलोक"----
मापनी- २२२२ २२२२
फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन
काफिया - आ
रदीफ नहीं लिया है
*******************************
दिल उसका जब हमने तोडा
रोता उसको हमने छोड़ा
तनहा तनहा लगता था वो
उससे फिर इक नाता जोड़ा .
इन आँखों से पूछो तो तुम
तुमने जब से मुंह है मोड़ा
भूल गए जब जब तुम हमको
दिल रोया था थोड़ा थोड़ा
तुम अब जाना तो कह देना
न बनेगें रस्ते का रोड़ा
----"आलोक"----
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
****************************************************
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी,
अध्यक्ष --आ. पुष्पेन्द्र यादव जी को सादर समर्पित
****************************************************
विधा - गज़ल
मापनी- २२२२ २२२२ २२२
काफिया - आया
रदीफ - है
****************************************
देखो कैसा प्यारा मौसम आया है
खुशियों से दिल का आंगन महकाया है
रातों में खामोशी सी गहराई है
चांद न जाने ऐसे क्यूँ शरमाया है
तेरी चाहत नें बख्शे थे ख्वाब मुझे
तुझको पास न पाने का गम छाया है
आँसू भी डर जाते है हालातों से
दर्द जुबां पर आने से घबराया है
अक्सर मुश्किल होती उल्फत की राहें
फिर भी हमने तेरा प्यार निभाया है
~रमा वर्मा~
मापनी- २२२२ २२२२ २२२
काफिया - आया
रदीफ - है
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देखो कैसा प्यारा मौसम आया है
खुशियों से दिल का आंगन महकाया है
रातों में खामोशी सी गहराई है
चांद न जाने ऐसे क्यूँ शरमाया है
तेरी चाहत नें बख्शे थे ख्वाब मुझे
तुझको पास न पाने का गम छाया है
आँसू भी डर जाते है हालातों से
दर्द जुबां पर आने से घबराया है
अक्सर मुश्किल होती उल्फत की राहें
फिर भी हमने तेरा प्यार निभाया है
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-22
शिल्प और शिल्पी के अंर्तगत प्रस्तुत है एक गीत
शिल्प विधान ~मुखड़े तथा प्रत्येक पूरक पंक्ति का मात्रा भार -16,16
मुखड़े तथा अंतरो का तुकांत~आम न पूछो।
अध्यक्ष सम्मानीय पुष्पेँद्र यादव जी के सम्मुख सादर प्रस्तुत~
शिल्प और शिल्पी के अंर्तगत प्रस्तुत है एक गीत
शिल्प विधान ~मुखड़े तथा प्रत्येक पूरक पंक्ति का मात्रा भार -16,16
मुखड़े तथा अंतरो का तुकांत~आम न पूछो।
अध्यक्ष सम्मानीय पुष्पेँद्र यादव जी के सम्मुख सादर प्रस्तुत~
रहने दो गुमनाम न पूछो।
यारो मेरा नाम न पूछो।
1-
दौलत का जब नशा चढ़ेगा।
हर नाते का भाव बढ़ेगा।
लेकिन मै अनमोल मुहब्बत।
यारो मेरा दाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम..,.
2-
क्यूँ अपने अंदाज बदल दूँ।
कल तक था जो,आज बदल दूँ।
बदलेगी जब रूह यार तो,
क्या होगा अंजाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
3-
फेँक रहा है रोटी कोई।
ढूँढ रहा है रोटी कोई।
खुद पर रोती औरत देखी,
बदला है आवाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
4-अब न पूछो जात हमारी।
जीत तुम्हारी,मात हमारी।
उड़ न जाये सुबह की लाली,
डरी डरी है,शाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
यारो मेरा नाम न पूछो।
1-
दौलत का जब नशा चढ़ेगा।
हर नाते का भाव बढ़ेगा।
लेकिन मै अनमोल मुहब्बत।
यारो मेरा दाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम..,.
2-
क्यूँ अपने अंदाज बदल दूँ।
कल तक था जो,आज बदल दूँ।
बदलेगी जब रूह यार तो,
क्या होगा अंजाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
3-
फेँक रहा है रोटी कोई।
ढूँढ रहा है रोटी कोई।
खुद पर रोती औरत देखी,
बदला है आवाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
4-अब न पूछो जात हमारी।
जीत तुम्हारी,मात हमारी।
उड़ न जाये सुबह की लाली,
डरी डरी है,शाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --22
अध्यक्ष --माननीय श्री पुष्पेन्द्र यादव जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी, कुंडलिया छंद- लक्ष्मण लडीवाला
अध्यक्ष --माननीय श्री पुष्पेन्द्र यादव जी की प्रतिष्ठा में प्रस्तुत
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी, कुंडलिया छंद- लक्ष्मण लडीवाला
विधान -एक दोहा (प्रत्येक में १३+११ मात्रा) व एक रोला (प्रत्येक में
११+१३ मात्रा) के संयोग से निर्मित कुंडलिया “छः चरणों से युक्त छंद है
जिसके प्रत्येक चरण में चौबीस मात्राएँ होती हैं |कुंडलिया छंद में दूसरे
चरण का उत्तरार्ध तीसरे चरण का पूर्वार्ध होता है|जिस शब्द या शब्द-समूह से
यह प्रारंभ होता है उसी शब्द या शब्द-समूह से इसका समापन भी किया जाता है |
पनघट खाली हो रहे, रहा नही अब नीर,
इधर बाढ़ से दूर तक,दिखे न नदियाँ तीर |
दिखे न नदियाँ तीर,जलमग्न है थल सारा
गिरी मनुज पर गाज,प्रकृति से मानव हारा
उत्तरकाशी गाँव, बन गए जैसे मरघट
बचा न कोई प्राण, रह गए सुने पनघट |
(2)
नदिया सब बेहाल है, नहीं मनुज का ध्यान,
वृक्ष सभी अब कट गए, नहीं रहे खलिहान |
नहीं रहे खलिहान, रहे किसान अब भूखा
प्रकृति का नहीं ध्यान,गाँव में पढता सूखा
प्रकृति करे संकेत, मनुष्य गया क्यों सठिया,
रोजी रोटी भूख, सभी दे सकती नदिया |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाल
-------------------------------------------------------------आप सभी का हार्दिक आभार -------------
पनघट खाली हो रहे, रहा नही अब नीर,
इधर बाढ़ से दूर तक,दिखे न नदियाँ तीर |
दिखे न नदियाँ तीर,जलमग्न है थल सारा
गिरी मनुज पर गाज,प्रकृति से मानव हारा
उत्तरकाशी गाँव, बन गए जैसे मरघट
बचा न कोई प्राण, रह गए सुने पनघट |
(2)
नदिया सब बेहाल है, नहीं मनुज का ध्यान,
वृक्ष सभी अब कट गए, नहीं रहे खलिहान |
नहीं रहे खलिहान, रहे किसान अब भूखा
प्रकृति का नहीं ध्यान,गाँव में पढता सूखा
प्रकृति करे संकेत, मनुष्य गया क्यों सठिया,
रोजी रोटी भूख, सभी दे सकती नदिया |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाल
-------------------------------------------------------------आप सभी का हार्दिक आभार -------------
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