Friday, 8 August 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 24 शिल्‍प और शिल्‍पी दिनाँक 07 अगस्‍त 2014 से 08 अगस्‍त 2014 अध्‍यक्ष हितेश शर्मा जी

इस प्रकार गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह--24 के शिल्‍प और शिल्‍पी कार्यक्रम दिनॉंक 7 अगस्‍त 2014 से 08 अगस्‍त 2014 अध्‍यक्ष आदरणीय हितेश शर्मा जी के प्रयासो समाप्‍त हुआ, हम सभी रचनाकारों का हार्दिक स्‍वागत करते हुए उनके उज्‍जवल भविष्‍य एवं स्‍वस्‍थ जीवन की कामना करते है।
रमा वर्मा,करण एस पी, अर्चना पांडे, सुरेश कुमार मिश्रा, विनय कुमार सिह, ओलक मित्‍तल, कृष्‍णा नंन्‍द मोैर्य , विनोद राजपूत,  रेखा जोशी , हितेश शर्मा पथिक, डा0 शिप्रा शिल्‍पी , लक्ष्मण रामानुज लडीवाला, वकील कुशवाहा 'आकाश महेशपुरी', डा0 कमलेश द्विवेदी, भारतीय जैन, धीरज श्रीवास्‍तव, महेश जैन ज्‍योति, अखंड गहमरीRama Verma
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -24, प्रथम चरण
कार्यक्रम --शिल्‍प और शिल्‍पी
समारोह अध्यक्ष सम्माननीय Hitesh Sharma जी को सादर समर्पित
विधा-दोहा
शिल्प विधान- दोहा चार चरणों का मात्रिक छंद है जिसके प्रथम व तृतीय चरण में 13-13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होतीं हैं।अंत में लघु होना आवश्यक है।
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राखी के त्यौहार की.........रौनक चारों ओर |
कच्चे धागों से बनी..........पक्की है ये डोर ||
बहन बसी परदेश में.......मन भाई के पास |
राखी भेजे डाक से.......मिल जाने की आस ||
हर बहना इस दिन करे,अपना बचपन याद |
भैया से उपहार की.......करती थी फरियाद ||
सब त्योहारों से बड़ा..........राखी का त्यौहार |
कच्चे धागों में भरा........रहे बहन का प्यार ||
भैया तुम रखना सदा....इस राखी की लाज |
इस बंधन के बीच में........रहे न कोई राज ||
बचपन की नादानियाँ........मेरी करना माफ |
रीत निभाना प्रीत की,रखना दिल को साफ़ ||
बहन कामना ये करे........लेकर मंगल थाल |
रोली चावल से सजा........रहे वीर का भाल ||
रंग बिरंगी राखियां.......और बहन का प्यार |
सजी कलाई वीर की.....सफल हुआ त्यौहार ||
सदा बढे यश वीर का.....यही बहन की आस |
मिले सफलता हर कदम...करे यही अरदास ||
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 24
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
विधा- गजल
काफिया- आद
रदीफ- हज़रत की।
बहर- 1222 / 1222 / 1222 / 1222
ँँँँ
समारोह अध्यक्ष समान्य आदरणीय हितेश शर्मा पथिक जी को सादर समर्पित एक गजल का प्रथम प्रयास ।
ँँँ
कभी दैरो हरम मे थी बडी मर्जाद हज़रत की,
मगर अब मयक़दोँ में जीस्त है बर्बाद हज़रत की।
सभी कोई लिए बैठा यहाँ हाँथों मे' मयख़ाना,
सुनूँ किससे यहाँ तामीज़ जिन्दाबाद हज़रत की।
पडा है रिन्द हर घर मे निहा इंसान अक्सोँ मेँ,
कज़ा अब जल्द आयेगी वो' मुर्दाबाद हज़रत की।
लगी है तश्नगी ऐसी नयन मदिरा के प्यालोँ की,
लुटेगी आज फिर इज्जत किसी नाबाद हज़रत की।
हुआ दुश्वार है जीना यहाँ जालिम निगाहोँ बिच,
उडायें नींद हर दिन वो किसी आबाद हज़रत की।
परीशां हो ''करन'' रोता कहाँ जाये ये' मुफलिस अब,
नियति के मार से खेती हुई बर्बाद हज़रत की।
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)
मो.- 09619070195
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 24
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
शिल्प - प्रस्तुत गीत 32 मात्राओं का है, 16 मात्रा पर यति 16 पर विराम.मुखडा और अन्तरा,सभी की मात्रायें समान हैं.
मुखडा का तुक है-श्याम,धाम आदि.
अन्तरे के तुक इस प्रकार हैं-1.निभाते,जाते 2.प्यार का, द्वारिका 3.अम्बर,रामेश्वर 4.हाथ,बद्रीनाथ
अध्यक्ष-श्री हितेश शर्मा जी को समर्पित
**** मेरे चारों धाम तुम्हीं हो. *****
सीता हूँ मैं राम तुम्हीं हो मीरा मैं घनश्याम तुम्हीं हो.
कोई पूछे,यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो.
जग में मेरे अपने बनकर
जब-जब साथ निभाते हो तुम.
सच कहती हूँ मेरी खातिर
'जगन्नाथ' बन जाते हो तुम.
मेरी उन्नति और प्रगति के रथ की गति अविराम तुम्हीं हो.
कोई पूछे,यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो.
मेरा मन मंदिर बन जाता
जब मैं गाती गीत प्यार का.
जहाँ तुम्हारे दर्शन होते
मुझको लगती वही 'द्वारिका'.
धर्म तुम्हीं हो अर्थ तुम्हीं हो मोक्ष तुम्हीं हो काम तुम्हीं हो.
कोई पूछे,यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो.
मेरा मन धरती जैसा है
जिस पर छाये तुम अम्बर हो.
रोम-रोम में तुम्हीं रमे हो
मेरे मन के 'रामेश्वर' हो.
इस जीवन की भोर तुम्हीं हो इस जीवन की शाम तुम्हीं हो.
कोई पूछे,यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो.
जब तुम मेरे सिर पर रखते
आशीषों का हाथ तुम्हारा.
रूप दिखाई देता मुझको
बिल्कुल 'बद्रीनाथ' तुम्हारा.
मेरे सारे सत्कर्मों का मंगलमय परिणाम तुम्हीं हो.
कोई पूछे,यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो....................
Sureshkumar Mishra
राम गोपाल गहमरी समारोह=२४
आ .परमपूज्य हितेश शर्मा जी के चरणो में समर्पित
कार्यक्रम -शिल्प और शिल्पी
विधा गीत
तुकांत -आने लगे
बहर=२१२ २१२ २१२ २१२
जब सुता हो रही हो कहीं पर विदा
उर नयन द्वार से छलछलाने लगे
हो रहीं हों कई जब विदा बेटियां
क्यों न करुणा रुदन वह मचाने लगे
मात ममता मधुर रस पिलाया तुम्हें
स्नेह समतामयी तो खिलाया तुम्हें
लाड से प्यार में तुम दुलारी गयी
नेह की गोद में तुम सँवारी गयी
भावना उरभिमा ही विदा ले अगर
क्यों न ममतामयी तड़फड़ाने लगे
@@@@@@@@@@@@
बेटियां ले रहीं भावभीनी विदा
पर रहेगी ह्रदय में बसी सर्वदा
हैं विवशता तुम्हें हम विदा कर रहें
अब विछुड़ते हुए यह नयन झर रहे
लो सुकोमल ह्रदय दे रहा हूँ तुम्हें
पीर दिल की यही अब सुनाता तुम्हे
मानवी हैं द्रवित पीर पहचानना
आज से तुम सभी दर्द को जानना
स्नेह संवेदना ले पहुँचना वहाँ
नीर धारा विवशता बहाने लगे
@@@@@@@@@@@
प्यार देना सभी को वहाँ पर सदा
बाँटना शील सौजन्य की तुम सुधा
प्रेम संवेदना धैर्य करुणा क्षमा
तुम जगाना सभी में ख़ुशी की समा
त्याग -तप और बलिदान की भावना
बेटियो के लिए हैं यही कामना
हर जगह तो मिलें राक्षशी नर तुम्हें
स्नेह से तुम दिखाना सही पथ उन्हें
जागृति तुम करो मर्म की कामना
प्रेम पियूष सब को पिलाने लगे
@@@@@@@@@@@@
बेटियां अब विवश आज नारी बहुत
नारिया तो नहीं अब दुलारी बहुत
नारि बंदी बनी कैद तन -मन रहा
आज नभ औ धरा भेदता ही रहा
सीख दी जो तुम्हें भूल जाना नहीं
आज नारी धर्म तुम घटाना नहीं
कष्ट में मुस्कराना पड़ेगा तुम्हें
स्वर्ग घर को बनाना पड़ेगा तुम्हें
विश्व की बेटियो के लिए आज हम
नरक का द्वार नर ही बनाने लगे
@@@@@@@@@@@@
सुरेश कुमार उत्साही
९९१७०१०६६१
९६३४७६३७६


गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 24
प्रथम चरण ****
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
समरोह अध्यक्ष - श्री हितेश शर्मा जी के सन्मुख समर्पित
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बिधा-- गजल
मापनी/ बहर - 2121,2211,2122,212
रदीफ़- में
काफ़िय- अ
नासबूर हूँ मै इस कदर तेरी याद में
निसार कर दिया शुकूंन तेरी याद में।
नसीम जब भी आया आग सी धधक उठी
दिल नामुराद जल उठा अंधेरी रात में।
ताक का ये हश्र है दीखता है कुछ नहीं
ना रही कोई वजन अब मेरी बात में।
जदा दिल भी क्या करें तर्स से भरा हुआ
किस कदर जिया करे वो काली रात में।
नब्ज मेरा थम गया साँस भी अटक गयी
लो आब भी अब ना बची मेरी निगार में
लब्ज ओ खामोश है जो कह गए बात कुछ
नदीम भी मिले नहीं मेरी बारात में।
नासबूर-- अधीर, ब्याकुल
नसीम-- मंद समीर
ताक-- चोट खाया हुआ, तर्स-- भय ,आतंक
निगार-- चित्र, छबि, प्रेमिका ,नदीम- घनिष्ट मित्र
@@@ विनय बाली सिंह @@@ जय हिन्द, नमन

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 24
प्रथम चरण ****
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
समरोह अध्यक्ष - श्री हितेश शर्मा जी के सन्मुख समर्पित
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विधा - गीतिका
मात्रा भार - १८
काफिया - आती और अती
रदीफ़ - नहीं
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नींद उसको अब तो आती नहीं !
वो तो रात भर भी सोती नहीं !!
ख्वाब आते कब क्या मालूम है !
जैसे बात कभी जानती नहीं !!
जुल्म सहते सहते भूली है वो !
इसलिए रास्ते पर जाती नहीं !!
काजल सी जिंदगी उसकी बनी !
दिए में जैसे हो बाती नहीं !!
तड़पी वो बहुत जीने के लिए !
भूख के खातिर अब रोती नहीं !!
दहेज लेना पाप जानते सब !
बेटी उनके यहाँ जनती नहीं !!
क्यों नहीं डर भगवान का उन्हें !
वो किसी का भी पक्षपाती नहीं !!
~~ आलोक ~~

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -२४ प्रथम चरण
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कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
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समारोह अध्यक्ष सम्मानीय हितेश शर्मा जी को सादर समर्पित
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विधा - गीत
मापनी– टेक = 26
अंतरा – 26
टेक का तुकान्त – आनों नें
पहले अंतरे का तुकांत– आरों में
दूसरे अंतरे का तुकांत– हम
तीसरे अंतरे का तुकांत – अन
$$$$$--$$$$$$$$$$$$$$$$$-$$$$$
कस्तूरी की गंध सरीखे
कुछ अरमानों नें ।
बाँटा दुख ही जीवन को
सुख के सामानों नें ।
लुटी–पिटी सी साँझ
थकन तारी भिनसारों में
फिरा खुशी के दाम लगाता
दिन बाजारों में
ठगा रात की आँखों को
कुछ ख्वाब –सुहानों नें
बाँटा दुख ही जीवन को
सुख के सामानों नें ।
शून्य सिरजते रहे
परों में बाँध उड़ानें हम
भली सोंच का गला घोंट
हो गये सयाने हम
लूटा तप का मंदिर
सुविधा के सुल्तानों ने
बाँटा दुख ही जीवन को
सुख के सामानों नें ।
नपी–तुली मुस्कान लिये
घूमें व्यापारी मन
बाहर–बाहर मिलें गले
पर अन्दर रखें जलन
हिये हिंस्र पशु नख–दंती
पोषे इंसानों ने
बाँटा दुख ही जीवन को
सुख के सामानों नें ।
– कृष्ण नन्दन मौर्य.
154,मौर्य नगर ,पल्टन बाजार
प्रतापगढ़ (उ. प्र. )–२३०००१

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -२४ प्रथम चरण
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कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
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समारोह अध्यक्ष सम्मानीय हितेश शर्मा जी को सादर समर्पित
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विधा-गीत
मात्रा भार-मुखड़ा 27/16
पदान्त-आर
अन्तरा तुकान्त-आये।
अन्तरा भार -16/12
टेक - 16/11

रिमझिम रिमझिम बादल बरसे, बूँदों की झनकार ,
सखी तुम आ जाओ इस बार -2।
बागों में कोयल की बोली, मन को बहुत लुभाये,
पावस ऋतु का चातक मन ये रह रह प्यास बुझाये।
मन करता है उड़ती जाऊँ-2 इन्द्र धनुष के पार,
सखी तुम आ जाओ इस बार-2।
घड़ी परीक्षा की अब आयी मन मेरा घबराये,
घर पर डाट पड़े प्रतिदिन पर पढ़ना रास न आये।
जाने किस ने खींच दिये हैं-2 मन वीणा के तार,
सखी तुम आ जाओ इस बार-2।
जाने कब मैं हुई बाबरी समझ न मेरी आये,
मन में बसी सांवरी सूरत रह रह कर तरसाये।
जाने कैसा रोग लगा ये, मन में उठे पुकार,
सखी तुम आ जाओ इस बार-2।
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-विनोद बाह (आगरा)
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -24, प्रथम चरण
कार्यक्रम --शिल्‍प और शिल्‍पी
समारोह अध्यक्ष सम्मानीय हितेश शर्मा जी को सादर समर्पित
विधा ग़ज़ल
मापनी/बहर --1222 122 2 122
रदीफ़ -अब ज़िंदगी में
काफ़िया --आ
तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में
न हो हमसे खफा अब ज़िंदगी में
रहे तन्हा बिना तेरे सहारे
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में
बहुत रोये सनम तेरे लिये हम
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में
तड़प तुम यह हमारी देख लो अब
मिले जो इस दफा अब ज़िंदगी में
न कर शिकवा बहारों से सनम तू
नही वह बेवफा अब ज़िंदगी में
रेखा जोशी

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 24 - प्रथम चरण।
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
आदरणीय श्री Akhand Gahmari जी के समक्ष माँ सरस्वती को समर्पित निम्न वंदना का छंद प्रस्तुत कर रहा हूँ:
छंद - दुर्मिल सवैया
विधान - आठ सगण, अर्थात
112 112 112 112 112 112 112 112
अतिथि रचना
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महके मम लेखन अम्ब सदा शुचि छंद सुशब्द सजे लहके।
लहके तन का हर तंतु खिले मन पुष्प सुभाव भरे चहके।
चहके सुन सुन्दर काव्य मनोहर कर्ण सुधा अवनी गहके।
गहके अति मन्द सुरम्य समीर धरा मम लेखन से महके।।
- हितेश शर्मा "पथिक"

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -24, प्रथम चरण
कार्यक्रम --शिल्‍प और शिल्‍पी
कार्यक्रम अध्‍यक्ष --आदरणीय हितेश शर्मा जी को समक्ष .
विधा :ग़ज़ल
काफ़िया :आ
रदीफ़ :लो तुम
बहर:१२२२/१२२२/१२२२/१२२२
तुम्हारी हो चुकी हूँ मैं, मुझे अपना बना लो तुम
................. धड़कना चाहती हूँ मैं, मुझे दिल में बसा लो तुम...........
इशारा हो अगर तेरा, चुभन तेरी मिटा दूँ मै
................ बहुत अब रो चुकी हूं मै, कि सीने से लगा लो तुम...........
चमकती थी सितारों सी, महकती थी बहारों मे
............. कि टूटी शाख से कलियाँ, महल अपना सजालो तुम ..........
इबारत हूँ अधूरी सी, जरा मुझको निखारो ना
................ बिखरती जा रही हूँ मै, जरा मुझको सम्भालो तुम............
सुलगती हूँ तड़पती हूँ, भटकती हूँ मै रातो मे
................. शमा मै जल रही कब से, मुझे आकर बुझा लो तुम............
अज़ब है हाल अब दिल का, दिवानी हो गयी हूँ मै
.............. तुम्ही तुम हो तुम्ही तुम हो, दुआओं मे बसालो तुम............
कभी यूँही तड़प लो तुम, कभी मुझको सताओ ना
................ हज़ारो राह मिलने की, कि चाहत को जगा लो तुम.............
यही अरमान है मेरा, कि काँधे पर उठाओ ना
................... कफ़न मे सो रही हूँ मै, कि फूलो से सजा लो तुम.............
गज़ल मै कह रही दिल से, जरा सा गुनगुनाओ न
.........................जनाजा है दिवानी का, जरा आँसू बहा लो तुम! ........... DR.SHIPRA

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-24
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
माननीय हितेश शर्मा जी के सम्मान मेँ सादर प्रस्तुत एक घनाक्षरी
छन्द विधान-
घनाक्षरी एक वर्णिक छन्द है। प्रत्येक पंक्ति मेँ 16 और 15 वर्णोँ पर यति होती है। यह चार पंक्तियोँ मेँ पूर्ण होता है।
॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰
नेता अब करते हैँ अपनी ही स्वार्थ सिद्धि, जनता से नहीँ कुछ इन्हेँ सरोकार है।
लूटने-खसोटने मेँ लगीँ हुईँ सरकारेँ, लगता कि इनका तो यही कारोबार है।
हम तो बेरोजगार रात-दिन बार बार, डूबते हैँ पर नहीँ मिले पतवार है।
खुद को किनारे यदि कर लेँगे अगुवा ही, हमको बचाए कौन ये तो मझधार है।
घनाक्षरी- आकाश महेशपुरी
॰॰॰
पता-
वकील कुशवाहा 'आकाश महेशपुरी'
ग्राम- महेशपुर, पोस्ट- कुबेरस्थान, जनपद- कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
09919080399

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-24
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पीLaxmanprasad LadiwalaYesterday at 12:06 · Jaipur · Edited
दोहे – शिल्प विधान –24 24 मात्राओं की दो पंक्तियों में छंद में (विषम=१३ एवं सम = 11 मात्राए) तुकांत गुरु लघु (2,1),से लयात्मक हेतु उचित प्रवाह आवश्यक है |
आदनीय श्री हितेश शर्मा जी की प्रतिष्ठा में सुधि पाठकों के समक्ष प्रस्तुत -
ज्योतिर्मय होता रहे (दोहे)
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राखी धागा ही नहीं यह बहना का प्यार
भाई देता प्यार से, बहना को उपहार |
बहना हो कर्णावती, मिले हुमायूँ भ्रात
मुँहबोली बहना मिले,जात रहे ना पात |
राखी धागा प्रेम का, बहना देती मान,
आत्महीन भाई नहीं दे सकता सम्मान
बहना भाई से कहे, जले ह्रदय के द्वार
ज्योतिर्मय होता रहे अपना ये संसार |
प्यार समझकर बाँधना, राखी में सन्देश
नयन अश्क बरसा रहे, भाई तुम परदेस
-लक्ष्मण रामानुज लडीवाला


गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-24
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
Kamlesh Dwivedi
(शिल्प-प्रस्तुत गीत 32 मात्राओं का है.16 पर यति 16 पर विराम.मुखडा और बन्द सभी की मात्रायें समान हैं. तुकान्त हैं-पढना, गढना आदि.)
अध्यक्ष- श्री हितेश शर्मा जी को समर्पित
गीत-
**** आगे बढ़ना सीख रहा हूँ****
सीख चुका हूँ तन को पढ़ना मन को पढ़ना सीख रहा हूँ.
धीरे-धीरे कदम बढाकर आगे बढ़ना सीख रहा हूँ.
जैसा तन हो वैसा मन हो
ऐसा अक्सर कम होता है.
पर हरदम ऐसा ही होगा
यह तो मन का भ्रम होता है.
ऐसे भ्रम को काट-छांट कर मूरत गढ़ना सीख रहा हूँ.
धीरे-धीरे कदम बढाकर आगे बढ़ना सीख रहा हूँ.
औरों से लड़ना है आसां
खुद से लड़ना मुश्किल होता.
जो खुद से भी लड़ सकता हो
उसको ही सब हासिल होता.
औरों से तो बहुत लड़ा अब खुद से लड़ना सीख रहा हूँ.
धीरे-धीरे कदम बढाकर आगे बढ़ना सीख रहा हूँ.
सोच रहा हूँ चलते-चलते
कल से आज कहाँ पहुंचा हूँ.
कितनी छोटी-छोटी चोटी
चढ़कर आज यहाँ पंहुचा हूँ.
एवरेस्ट अब दीख रहा है उस पर चढ़ना सीख रहा हूँ.
धीरे-धीरे कदम बढाकर आगे बढ़ना सीख रहा हूँ.
डाॅ.कमलेश द्विवेदी
मो.09415474674
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -२४ प्रथम चरण
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कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
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समारोह अध्यक्ष सम्मानीय हितेश शर्मा जी को सादर समर्पित
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विधा --दोहा
शिल्प विधान --दोहा चार चरणों का मात्रिक छंद है ,
जिसके प्रथम व तृतीय चरण में १३-१३ तथा दूसरे व चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं .अंत में लघु होना आवश्यक है .
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(१) दोहा -नर --१५ गुरु एवं १८ लघु =३३ अक्षर
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तन्हाई जोगन भई , पिया नहीं हैं पास .
आंसू बन कर खिर गए ,आस और विश्वास .
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दोहा -यवकल --१३ गुरु एवं २२ लघु =३५ अक्षर
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( २ ) हिरदय सीप में पल गया ,मोती प्रेम पराग ,
चन्दन महके तन पिया ,जियरा दहके आग
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(३)दोहा -नर १५ गुरु एवं १८ लघु =३३ अक्षर
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बादल गरजे जोर से ,घिरी घटा घनघोर .
रास रचाने दामिनी ,चली गगन की ओऱ.
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(४)दोहा -पयोधर -१२ गुरु एवं २४ लघु =३६ अक्षर
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गिरधर नागर सांवरे ,छलियों के सरताज .
युगों -युगों से कर रहे ,सब के दिल पर राज .

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 24 शिल्प शिल्पी कार्यक्रम के अन्तर्गत!
विधा- गीत
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का तुकांत-आ लूँ। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:1-ईते 2-ओती 3-उलते जाते हैँ! मात्राभार- 16 समारोह अध्यक्ष- आदरणीय हितेश शर्मा जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर!
@ अतिथि रचना @
*******************
मुझको तुम उतने पल दे दो
जितने मेँ मन को समझा लूँ!
सारा जीवन बीत गया है
घोर हलाहल पीते पीते!
अपने से ही घृणा हो गयी
ऐसा जीवन जीते जीते!
एक बार कुछ ऐसा कह दो
मैँ अपने से प्यार जता लूँ!
मुझको तुम इतने पल दे दो
जितने मेँ मन को समझा लूँ!
सन्नाटे बन बनकर फैले
अब तो इन नयनो के मोती!
नीँद हुई आँखोँ की दुश्मन
दुश्मन आँखेँ पीर पिरोती!
तुम इतना सा सम्बल दे दो
युग से टूटी नीँद सजा लूँ!
मुझको तुम इतने पल दे दो
जितने मेँ मन को समझा लूँ!
प्राण इसी लाचारी मेँ ही
रोज रोज घुलते जाते हैँ!
दो टाँके ही सिल पाता हूँ
और चार खुलते जाते हैँ!
तुम केवल बस इंगित कर दो
अपने रूठे सपन मना लूँ!
मुझको तुम इतने पल दे दो
जितने मेँ मन को समझा लूँ!
रचना- धीरज श्रीवास्तव
मोबाइल नं.- 08858001681

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -24
शिल्प और शिल्पी
आदरणीय अध्यक्ष --हितेश शर्मा जी की सेवा में
प्रस्ततु

विधा - गीत ।
मुखडा और पूरक पंक्तियों का मात्राभार
सभी में समान -22
अंतरों का मात्राभार -28
मुखडा /पूरक पंक्तियों का तुकान्त-आर
अंतरों का तुकान्त -आरी , ऐया , उंगी
और अहकै ।
पंक्ति 'महीना आयौ साबन कौ ' की
सभी में आवृत्ति ।
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झूला आँगन में डरवाय दै भरतार
महीना आयौ सावन कौ ।
आसमान में घिरीं बदरिया
उमड घुमड कै कारी ,
भीनी भीनी झरैं फुहारें
कोयल कूकैं डारी ,
बाजै पामन में पायलिया घुँघरूदार
महीना आयौ सावन कौ ....।1।
मन में उठैं उमंग चलै
सीरी सीरी पुरवैया ,
याद बहुत आवै पीहर की
सुन ननदी के भैया ,
मोकूँ ला दीजो चुनरिया गोटेदार
महीना आयौ सावन कौ.........।2।
कर सोलह श्रंगार बलम मैं
झूला पै झूलुंगी ,
हौलै हौलै झोटा दीजो
सुध अपनी भूलुंगी ,
तगडी पहनुंगी सोने की ठप्पेदार
महीना आयौ सावन कौ.....।3।
बिदिया चमकै काजर दमकै
हाथन मेंहदी महकै ,
कँगना खनकै रे बाँहन में
पाँव महावर चहकै ,
बलमा झूलिंगे गलबहियाँ दोऊडार
महीना आयौ सावन कौ .....।4।
-'ज्योति '

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -24
शिल्‍प और शिल्‍पी
आदरणीय अध्‍यक्ष --हितेश शर्मा जी एवं समस्‍त गुरूजनों की सेवा में समीक्षा हेतु प्रस्‍ततु
विधा --गजल
मात्रा - 1222 1222 1222
काफिया -- आ
रदीफ --होता
कभी तो प्‍यार उसने भी किया होता
वफा के नाम पे धोखा दिया होता
तड़पती रूह को भी चैन आ जाता
कफ़न उसने हमारा गर सिया होता
शिकायत जिन्‍दगी से हम नहीं करते
दवा बन दर्द उसने जो लिया होता
न मैखाने कभी जाते भुलाने गम
हमारे अश्‍क उसने गर पिया होता
हमें तो जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता
अगर वो साथ दो पल भी जिया होता
अखंड गहमरी
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