Sunday, 17 August 2014

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समा025 दिनांक 14 से 15 अगस्‍त तक शिल्‍प और शिल्‍पी अध्‍यक्ष महेश जैन ज्‍योति सारी रचना एक साथ

विजेता ---कमलेश दिवेदी 
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
सम्‍पूर्ण शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/मुक्‍तक/दोहा/चौपाई/छंन्‍द रचना
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित एक गीतिका
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गीतिका - परिचय
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(1) गीतिका ग़ज़ल जैसी अवश्य है किन्तु यह अनिवार्यत: ग़ज़ल ही नहीं है l
( 2) हर गज़ल गीतिका है किन्तु हर गीतिका गज़ल नही है l
(3) इसमें कम से कम पाँच युग्म अवश्य हों .पहले युग्म की दोनों पंक्तियाँ समांत पर और बाद के प्रत्येक युग्म की दूसरी पंक्ति का समांत प्रथम युग्म के समान्त जैसा ही होगा जबकि पहली पंक्ति अतुकांत होगी l प्रत्येक युग्म की अभिव्यक्ति स्वतंत्र होगी !
रचना
---------
कल तक तो तुमने खूब सलाम किया
अब इस मुकाम पे समझ नाकाम लिया ।
निष्ठुर रविकर हमेशा छुपता ही है ,
छुपने को फिर उसने आसमान लिया ।
मेरे हरियाये यौवन पर हर्षित थे
अब तो समझ बेकार समान लिया।
मैं भी खुश होता रहा अपनी धुन मे ,
यार अब पहचान हर इंसान लिया ।
शाखों पर अब पंछी भी नहीं आते ,
ये किसने मेरा काम तमाम किया । .................अन्नपूर्णा बाजपेई 'अंजु
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्प और शिल्पी
समस्त सम्मान्य विद्वजनों की सेवा
में समर्पित ।
प्रस्तुतिः दुर्मिल सवैया ।
शिल्पः आठ सगण ( IIS ) 112 की
निरंतर आवृति । यति 16-16पर ।
दूसरे यति का चरण पूरा होने के कारण
स्वतः पालन । 32मात्रिक छन्द ।
प्रत्येक चरण का तुकान्त - इसके
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* अतिथि रचना *
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हम छोड़ चले सब सौंप तुम्हें ,
तुम ही अब नाविक हो इसके ।
हमको कुछ भी अब सोच नहीं ,
तुमसे प्रहरी बल हों जिसके ।
परखो निरखो अपने बल को ,
नित ही कसके निजि को घिसके ।
महके यह देश महान सदाँ ,
इसकी न कली मुरझे सिसके ।
---------
महेश जैन 'ज्योति' ,
मथुरा ।
***
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२५
प्रथम चरण शिल्प और शिल्पी अध्‍यक्ष -- आदरणीय श्री महेश जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित.............................
ग़ज़ल.................................
क़ाफ़िया-आना
रदीफ-देता है ।
बहर--22,22,22,22,22,22,22
कौन परिन्दें को आ के ,आबो -दाना देता है ।।
शाख़े-शज़र पे रहने का ,ठौर-ठिकाना देता है ।।
बच्चों की अपनी मस्ती ,गूँज रही गलियारे में,
कंचा - कंचा खेल रहा ,कौन निशाना देता है ?
इश्क़ हुआ तो महफ़िल सी ,सारी दुनिया है सजती, ,
शम्मा जलती रहती है , सँग परवाना देता है ।।
शोर-शराबा भारी है ,आज अमीरे-बस्ती में,
आया कोई फ़कीर यहाँ ,दर्द दिवाना देता है ।।
.बाबुल के घर की गुड़िया,ढोती पीर परायी हूँ,
अम्मा का घर छूटा है, साथ घराना देता है ।।
शिल्पी"नदिया सच को समझे ,बहती धीरे-धीरे,
आँख़ों-आँख़ों लहर समंदर ज़ख़्म ज़माना देता है ।....DR.SHIPRA
आबो-दाना---दाना-पानी
शाख़े-शज़र---पेड़ की डालील
गोपालराम गहमरी साहित्यिक समारोह- 25
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- गीत
शिल्प- मुखडे की पँक्तियोँ का मात्राभार- 16/ 10-10
अंतरोँ की पँक्तियोँ का मात्राभार- 16/16
तुकान्त- मुखडे का तुकान्त-अना
अंतरोँ का तुकान्त
1-एके
2-आया
3-आवन
4-आरी

समारोह अध्यक्ष आदरणीय महेश जैन ज्योति जी को सादर समर्पित

प्यारे भाई बहन तुम्हारी,
रोती है अँगना- दुख देते सजना।
यादेँ सब पीहर की लेके,
माता के दिल मे गम देके।
आयी थी मै खुशियाँ पानेँ,
साजन के घर सपने लेके।
इस पापी छलिये घर की मै,
समझ सकी न रँगना- भूल गयी हँसना।
प्यारे..(1)
क्या सोँचा था क्या घर पाया,
पैसा लालच किया पराया।
सास- ससुर के दिल की छोडो,
पति ने भी मुझको तडपाया।
नन्द रोज है ताने देती,
क्या लायी अँगना - रूठे हैं सजना।
प्यारे..(2)
रक्षाबंधन पर्व जो पावन,
बीता खुशियाँ दे मनभावन।
राखी के इस प्रेम सूत से,
झूमा था हर घर मे सावन।
राखी की लज्जा हित भाई,
बेंचा घर अपना-सोँचा ना विरना।
प्यारे..(3)
देश जमीँ पर हाहाकारी ,
बढे दुष्ट खल अत्याचारी।
जगह जगह मे फैला मातम,
चीख रही चिथडोँ मे नारी।
आज दहेजोँ मेँ जलती हैं,
बेटी औ बहना-भ्रष्टित हर अँगना।
प्यारे..(4)

करन एस. पी.

श्री गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-25
दिनांक 14 अगस्त प़ात: 10 बजे से 15 अगस्त प़ात: 10 बजे तक ।
प़थम चरण शिल्प और शिल्पी
संपूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/ग़ज़ल/मुक्तक/छंद/दोहा/चौपाई
समारोह अध्यक्ष- सम्मान्य श्री महेश जैन ज्योति जी को सादर समर्पित-
विधा-गीत
मात्रा भार स्थायी - 18 / मात्रा भार अतरा-18
मापनी- स्थायी -2112 2221 1112
तुकांत विधान-स्थायी - ( अरी ) /अंतरा ,1-( अन) अंतरा 2- ( आस ) अंतरा 3- ( अन)
( अंतरा में कहीं कहीं मात्रा पतन की छूट ली है । सादर निवेदन )
गूँज रही वीणा की स्वर- लहरी ।
प़ाणों में टीस उठी फिर गहरी ।
उर की अनुभूतियो का अभिव्यंजन
कविता का हो जैसे मृदु स्पंदन
हौले से उठता ज्यों अवगुंठन
वैसा अनुराग सिक्त लहरों का आवर्तन
मनहर मलयानिल है मोद भरी
प़ाणों में टीस उठी फिर गहरी ।
सरिता के जल में कुछ ऐसा उल्लास
जीवन के प़ति जागे जैसे विश्वास
सरस स्वर की लय का हो सुंदर उद् भास
जलते अनुभाव प़खर लेते उच्छवास
होने लगे उच्छृंखल गीतों के प़हरी ।
प़ाणों में टीस उठी फिर गहरी ।
वृक्षों की छाया कुछ ऐसी सघन
डूबा तो उभरा नहीं तल्लीन मन
शिथिल प़कृति बंधन हैं होकर मगन
हार गई आज स्वंय मन की थकन
आशा-आशंका की गति लगे ठहरी ।
प़ाणों में टीस उठी फिर गहरी
कान्ति शुक्ला
Kamlesh Dwivedi
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
दिनांक- 14 अगस्‍त 2014 प्रात: 10 बजे से 15 अगस्‍त 2014 तक प्रात: 10 बजे तक
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
सम्‍पूर्ण शिल्‍प परिचय सहित गीत/गजल/मुक्‍तक/दोहा/चौपाई/छंन्‍द रचना
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति
विधा-गजल
काफ़िया-आने
रदीफ़- मैं चलता हूँ तू भी चल
बहर-2222 2222 2222 222
***** मैं चलता हूँ तू भी चल *****
चल अंधियारे से टकराने मैं चलता हूँ तू भी चल।
द्वारे-द्वारे दीप जलाने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
इस माटी से माँ का रिश्ता मेरा भी है तेरा भी।
इस माटी का क़र्ज़ चुकाने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
अनबन में जो बनवा दी थी हमने अपने आँगन में।
आज वही दीवार गिराने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
इक-इक मिलकर दो होते हैं लेकिन हम ग्यारह होंगे।
सबको यह एहसास कराने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
मंदिर में वो मस्जिद में वो गिरजा में गुरूद्वारे में।
आज सभी को शीश झुकाने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
टुकडो में तस्वीर वतन की आज दिखाई देती है।
एक नयी तस्वीर बनाने मैं चलता हूँ तू भी चल।।
डॉ.कमलेश द्विवेदी गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति के समक्ष सादर प्रस्तुत ।
विधा -दोहा
दोहा दो पदों का छंद है। प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं। हर पद दो चरणों में विभाजित रहता है। विषम (पहले, तीसरे) चरण में तेरह तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ग्यारह मात्राएँ होती हैं। विषय (पहले , तीसरे) चरणों का आरम्भ जगण (१ २ १ -एक शब्द में) से नहीं होना चाहिये और सम (दूसरे–चौथे) चरणों के अन्त में लघु होना चाहिये।
मेरा भारत -कुछ दोहे
-1-
आजादी का जश्न है , आई उनकी याद
जिनके चिर संघर्ष से ,देश हुआ आजाद।
-2-
यूं तो सबके खून का, एक रंग है लाल
अलग ज्वाल उस रक्त की, जिससे जली मशाल ।
-3-
जश्न मग्न है देश यह , चौकस खडा जवान
सीमा पर प्रहरी बना , सीना अपना तान ।
-4-
आओ इस शुभ पर्व पर , लें ऐसा संकल्प
त्यागें अपने स्वार्थ को , कर दें कायाकल्प॥
-5-
खून , डकैती , गुंडई , इज्जत की जो लूट
यह आजादी बंद हो , हों हम तभी अटूट ।
-6-
दहशतगर्दी देश को , कर न सके बरबाद
खून शहीदों का बहा, रहे सदा यह याद ।
-7-
प्यारे भारत का रहा , अनुपम वैभव वेश
शान्ति, अहिंसा, स्नेह का , दिया मधुर संदेश ।
-8-
थे अतीत के गर्भ में , रत्न कई अनमोल
वेद, शास्त्र का रख दिया, ज्ञान पिटारा खोल ।
-9-
झंडा फहरे शान से , हो सबको अभिमान
देश प्रेम के पर्व में , पुलकित हिंदुस्तान ।
-10-
शिक्षा पायें लोग सब, हाथ हाथ को काम
आजादी का तब मजा , अंतर मिटें तमाम ।
-ओंम प्रकाश नौटियाल
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
समारोह अध्‍यक्ष आदरणीय श्री
को समर्पित निम्न रचना आप सभी के समक्ष सादर प्रस्तुत करता हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - गीत
शिल्प परिचय -
१) मुखड़े व सभी पंक्तियों में २२ मात्रायें (२२२२ २२२२ २२२ का मात्राभार)
२) मुखड़े व पूरक पंक्तियों का तुकान्त "अन"। शेष का बंदानुसार।
रचना:
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
साँसों की यह मधुरिम सी सरगम तुमसे।
सूने दिल की हर धड़कन मद्धम तुमसे।
तुमसे ही होता है तन मन में कम्पन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
प्रीत तुम्हारी पावन गंगा की धारा।
साथ तुम्हारा बना भोर में इकतारा।
मधुमय बोल तुम्हारे लगते अलि गुंजन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
लक्ष्य तुम्हीं पथ भी तुम पंथप्रदर्शक तुम
हर उलझन का हल तुम और विमर्शक तुम।
तुम थकते कदमों को शीतल चंदनवन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
तुमसे सजते भाव हमारे छंदों में
तुम बसती हो लय बन गीतों बंदों में
तुमसे बजते राग रागिनी मनभावन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
पायल की छनछन कंगन की खनखन से
पुष्पवार करती तिरछी सी चितवन से
पाँव महावर रच तुम उतरी मन आँगन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
रेशम देह बसी कस्तूरी साँसों में
अति सम्मोहक प्रेम निमंत्रण आँखों में
दर्पण को शर्माता है प्रेमालिंगन।
तुमसे जीवन का हर पल है, तुम जीवन।।
- हितेश शर्मा "पथिक"
Sureshkumar Mishra
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२५
प्रथम चरण शिल्प और शिल्पी
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति।
विधा =गीत
लेखन विधा -२१२ २१२ २१२ २१२
तुकांत -अला जाएगा
निवेदन स्वारूप =एक मात्रा भार की छूट ली गयी है
नारियाँ देश की जाग जाए अगर
युग स्वयं ही बदलता चला जाएगा
जागरण गीत गाये अगर नारियाँ
फिर सभी दिल मचलता चला जाएगा
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शान तो सादगी में सदाचार की
नाम श्रम से सहज साध्य अधिकार की
पत्नियाँ सादगी साध पाये अगर
पति स्वयं ही बदलता चला जाएगा
नारियाँ देश की जाग जाए अगर
युग स्वयं ही बदलता चला जाएगा
========================
छोड़ दे नारियाँ यदि गलत रूढ़ियाँ
छोड़ दे अंध विशवास की बेड़ियां
नारियाँ दुष्प्रथाए मिटाये अगर
दम्भ का दम निकलता चला जाएगा
नारियाँ देश की जाग जाए अगर
युग स्वयं ही बदला चला जाएगा
=======================
धर्म का वास्तविक रूप हो सामने
धर्म गिरते हुए को लगे थॅामने
भक्ति की भावना को सजा ले अगर
ज्ञान का दीप जलता चला जाएगा
नारियाँ देश की जाग जाए अगर
युग स्वयं ही बदलता चला जाएगा
======================
यह धरा स्वर्ग सी फिर सवरने लगे
स्वर्ग की रूप सज्जा उभरने लगे
नारियाँ दिव्य चिंतन जगाये अगर
हर मनुज देव बनता चला जाएगा
नारियाँ देश की जाग जाए अगर
युग स्वयं ही बदलता चला जाएगा
=======================
सुरेश कुमार उत्साही
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 25
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
॰॰॰
आदरणीय महेश जैन ज्योति जी के सम्मान मेँ सादर प्रेषित-
॰॰॰
विधा- गीत
मापनी-22,22,22,22
तुकान्त- मुखड़ा व पूरक पंक्ति- आने
शेष- बन्दानुसार
॰॰॰
जीवन मेँ तुम आग लगाने
आये हो फिर गीत चुराने
॰॰॰
जी का ये जंजाल रखा है
रोग ग़मोँ के पाल रखा है
जब जब ये आँखे हैँ रोतीँ
जज़बातोँ के छनते मोती
उस मोती को मीत बनाया
एक सुरीला गीत बनाया
महफिल मेँ तुम लगे सुनाने-
आये हो फिर गीत चुराने
॰॰॰
बात कहेँगे विल्कुल सच्चे
कविता के हम जनते बच्चे
प्यार बहुत इनपर है आता
नर होकर भी हम हैँ माता
तुम हमको रंजूर करोगे
माँ बेटे को दूर करोगे
इतनी गहरी चोट लगाने-
आये हो फिर गीत चुराने
॰॰॰
सुख देँगी क्या चीजेँ दूजी
हम कवियोँ की कविता पूँजी
वही चुरा के ले जाओगे
जख़्म नये कुछ दे जाओगे
छीनोगे पहचान हमारी
संकट मेँ है जान हमारी
मर जायेँगे सोलह आने-
आये हो फिर गीत चुराने
॰॰॰
गीत- आकाश महेशपुरी

Chaudhary Nitin Sikarwar
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
--शिल्‍प परिचय--
विधा- ग़ज़ल
काफिया- अर
रदीफ़- चले
मापनी- 2212 1212 2212 12.
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित..
कोई इधर चले कि या कोई उधर चले
हम चल पड़े वहाँ जिधर अपना हुनर चले
मुफलिस के घर न पूछिए क्या क्या सवाल हैं
दो रोटी चार आदमी कब तक गुजर चले
राहे वफ़ा हमें यूं ही करती गयी तवाह,
क़दमों ने हमको रोका भी हम थे मगर चले
कल के हमारे यार भी शायर बड़े हुए
मुंह ऐंठ कर गुमां में इधर-ओ-उधर चले
'पागल' तेरे नसीब पर इलज़ाम थोप कर
तुझको तवाह कर तेरे क़ातिल किधर चले
नितिन सिकरवार 'पागल'
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
दिनांक- 14 अगस्‍त 2014 प्रात: 10 बजे से 15 अगस्‍त 2014 तक प्रात: 10 बजे तक
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
ग़ज़ल.बहर--22 22 22 22, काफिया --अरा
ख़्वाबों पे उसका पहरा है!
यादों का सागर गहरा है !!
चीखें वो फिर सुनता कैसे!
मुझको तो लगता बहरा है !!
आईने में भी देखा कर !
क्या ये तेरा ही चेहरा है !!
बातें उसनें कर दी ऐसी !
दिल में सन्नाटा ठहरा है !!
कतरा -कतरा जीता हूँ मैं!
मेरे अन्दर भी सहरा है !!
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राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति की सेवा में
विधा- गजल
काफिया - अब
रदीफ-परिचय-नहीं होता
बहर----1818, 1818
दर्द पहले से अब नहीं होता
मनमुताfबक तो सब नहीं होता
तुझसे fमलना हयात में था fलखा
यूं ही कुछ बे-सबब नहीं होता
ग़रचे होती न आबे जू बाहम
इतना मैं तशनालब नहीं होता
चंद ज़रदारों का हुआ वो तो
हम ग़रीबों का रब नहीं होता
उनके जलवे थे जांआफ़्रीं इतने
क्यूं कोई जां-ब-लब नहीं होता
fमलती तुझसे न आदते मैक़शी
fक़स्सा ये शाम-ओ-शब नहीं होता
तुम न करते अता इसे खुशियां
तो ये शहरे तरब नहीं होता।।
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श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 25
प्रथम चरण - शिल्प और शिल्पी।
विधा - गीत (नवगीत)
मुखड़े एवं पूरक पंक्तियोँ का स्थाई तुकांत- ईल। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:1-आस।2-आज।3-आज4-आल। मात्राभार-16-11 के क्रम मेँ। आदरणीय महेश जैन ज्योति जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर। @अतिथि रचना@
*******************
उसकी खुशियाँ उसके सपने
वक्त गया सब लील!
रामपाल अब नहीँ लगाता
है कुर्ते मेँ नील!
शहर दिखाये ले जाकर तो
दो हजार होँ पास!
संगी साथी कौन दे रहा
नहीँ किसी से आस!
ठोक रही बीमारी माँ की
छाती मेँ बस कील!
बिन पानी के मछली जैसे
तड़प रहा वह आज!
बिटिया अपनी व्याहे कैसे
और बचाये लाज!
संघर्षोँ मेँ सूख चली है
आँखोँ की भी झील!
कर्म भाग्य का नहीँ संतुलन
बनी गरीबी गाज!
देखे जो लाचारी इसकी
ताक लगाये बाज!
व्यंग्य कसे मुस्काये अक्सर
खाँस खाँस कर चील!
फिर भी हिम्मत क्योँ हारे वो
जीना है हर हाल!
पटरी पर ला देगा गाड़ी
आते आते साल!
रोज रोज आशाएँ दौड़ेँ
जाने कितने मील!
रचना- धीरज श्रीवास्तव
मो.08858001681

बलजीत fसंह 'मुंतज़िर
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
समारोह अध्‍यक्ष आदरणीय श्री अध्‍यक्ष महेश जैन ज्‍योति की सेवा में
को समर्पित निम्न रचना आप सभी के समक्ष सादर प्रस्तुत करता हूँ। कृपया स्नेहाशीष दें:
विधा - गीत
शिल्प परिचय -
१) मुखड़े व सभी पंक्तियों में २८ मात्रायें (१४ पर यति, १४ पर विराम)
२) मुखड़े व पूरक पंक्तियों का तुकान्त "आग"। शेष अंतरानुसार |
***** मन बाग-बाग होता है *******
तू जब-जब भी मुस्काये मन बाग-बाग होता है.
तन-वंशी में मधुवंती सा राग-राग होता है.
कैसे चित्रों की रेखा
के भीतर रंग भरें हम.
मन करता है हर सीमा
तोड़ें,जब प्यार करें हम.
तन में पावस गाता है मन आग-आग होता है.
तू जब-जब भी मुस्काये...
तेरी बातों से मेरी
हर इक रचना रच जाये.
मैं गीत-गजल जब गाऊँ
जग भी मेरे सँग गाये.
तन में जगे मधुमास और मन फाग-फाग होता है.
तू जब-जब भी मुस्काये....
प्रेम शब्द का मुझको अब
सच्चा उपयोग मिला है.
पुण्य किये कुछ होंगे जो
तुमसे संयोग मिला है,
तन संगम मन वृंदावन जीवन प्रयाग होता है.
तू जब-जब भी मुस्काये... ...
Alok Mittal
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२५
प्रथम चरण शिल्प और शिल्पी अध्‍यक्ष -- आदरणीय श्री महेश जैन ज्‍योति जी को सादर समर्पित एक गीत
विधा =गीत
लेखन विधा - 2 1 2 2 -2 1 2 2
तुकांत - ईत
समान्त - बन के
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होठ पे बस गीत बन के
साज का संगीत बन के !!
प्रेम का रस जब मिले तो
संग रहना मीत बन के !!
है अगन जब इन दिनों में
पास आना शीत बन के !!
नैन तरसे अब हमारे
तुम बसों अब प्रीत बन के !!
पग रखो अब जिंदगी में
रंग भर नवनीत बन के !!
~~ आलोक ~~
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
अध्यक्ष - आदरणीय Mahesh Jainjyoti जी को सादर समर्पित
विद्या- घनाक्षरी छन्द
शिल्प परिचय - घनाक्षरी छन्द मुक्तक दण्डक कोटि में माना जाता है। इसे कवित्त तथा मनहरण के नाम से भी जाना जाता है। इस छंद में चार चरण होते हैं , और हर चरण के अंत में तुकांत समान होता है इसमें ३१ वर्ण होते हैं, १६ और १५ पर यति होती है। प्रत्येक चरण के अन्त में गुरु होता है। ३१ वर्णों में प्रायः १६ और १५ पर यति परन्तु समस्त चरणों में ८ , ८ , ८ , ७ वर्णों के बाद यति का प्रयोग भी होता है, कभी-कभी शब्दों के बीच में भी यति पड़ती है तब ७ या ९ वर्णों पर यति प्रतीत होती है परन्तु लयानुसार यति का क्रम पहले जैसा ही रहता है। घनाक्षरी के सस्वर गायन से मेघ-गर्जन की सी अनुभूति होती है|
(स्वतंत्रता दिवश के शुभ अवसर पर ये रचना देश के वीर जवानों को समर्पित है )
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देश की पुकार पर, और हाहाकार पर
देश के ये वीर योधा , देश पे कुर्बान है
देश की खाके कसम, निभा रहें हैं रसम
देश ही सर्वोपरी है , और अभिमान है
देश मादरे वतन, एकता का है चमन
देश की सम्पन्नता ही,खास पहचान है
देश भक्त देश पर, चढ़ गये शूल पर
देश करने मुक्त वो, दे गये जान हैं ||1||
___________________________
देश के सिपाहियों में, हौसला भरपूर है
देश ही उनके लिये, आन बान शान है
देश के अनेक रंग मिल हुये सतरंग
देश पे अडिग रहें सदा ही ईमान है
देश न परतंत्र रहें, सदा स्वतंत्र रहे
देश के सीमा प्रहरी, देश के जवान हैं
देश के सरफरोश, भर बाजुओं में जोश
देश के दुश्मनों पर, टूटे ज्यूँ तूफ़ान है ||2||
~रमा वर्मा~ (१४-८-१४)

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह - 25
प्रथम चरण --शिल्‍प और शिल्‍पी
अध्‍यक्ष -- आदरणीय महेश जैन ज्‍योति की सेवा में
विधा- गजल
काफिया - आने
रदीफ-में
बहर 1222 1222 1222 1222
खुशी कोई नहीं लेकिन हजारो गम जमाने में
लगे हम है यहाँ फिर भी चि‍रागो को जलाने में
पड़े है खून से लथपथ हजारों वीर सरहद पर
नहीं चलते कदम दो हम कभी उनको उठाने में
लुटा है देश मेरा ये वतन के ही लुटेरो से
न जाने क्‍या हमें डर है सजा इनको दिलानें में
शहीदों के लहू से हाथ अपने रंग क्यों डाले
झुकी आँखे न तेरी राज दुश्‍मन को बताने में
सुनो आवाज दिल की अब चली आयो न रूठो तुम
कही पागल न हो जाये सनम तुझको मनाने में
अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर
श्री गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 25
प्रथम चरण - शिल्प और शिल्पी।
विधा - गीत , देशभक्ति भाव, अपहृति अलंकार, प्रत्येक पंक्ति का मात्रा भार = 20.
तू चंदन उपवन ,
तू किसलय प्यार का ,
तुझको मेरा नमन ,
शत शत है नमन ..... ( अपनी ही रचना से )
इस मधुश्रुत ,हृदयग्राही गुनगुनाहट को अधरों में सजोये : अपने चंदन सुरभित देश के लिये अथाह प्रेम एवं अनुराग के भाव हृदय में अक्षुण्ण बनाये हुये राष्ट्र के स्वतंत्रतादिवस के 67वें वर्षगांठ के पुनीत अवसर पर अपने समस्त स्वजनों , फेसबूक मित्रों , उनके परिवार जनों , किंवहुना समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं ढेर सारी शुभकामनायें ।
एक घर चाहिये :
( सम्पति में देश में व्याप्त बिगड़े परिवेश : सर्वत्र खून खराबी , लूट खसोट , व्यभिचार और सम्प्रदायिक हिंसा और उद्रेक : नारियों एवं सुकुमार बालाओं का यौन शोषण , दहेज उत्पीड़न , बलात्कार या गैंगरेप : समाज में दिन प्रति बढ़ती जा रही अराजकता , व्यथा तथा क्लेश :: हृदय को व्यथित कर देने के लिये पर्याप्त है : मन अत्यधिक विक्षोभ में रहता है , क्या देश की इसी विकृत रूप की कल्पना गांधी , सुभाष , तिलक एवं देश पर जान कुर्बान कर देने वाले भगत सिंह , सुखदेव, अशफाक़ जैसे अनेकानेक अमर शहीदों ने की थी । अंतस की इन्ही अंतर्द्वंद की अनुभूतियों के बीच , मन में भाव उठते है , आखिर कैसा वतन हमें चाहिये । और मुख से निकल उठता है ...... )
हमें हसंता हुआ एक चमन चाहिये ,
खिलखिलाता हुआ यह वतन चाहिये ,
गुनगुनाता हुआ हरेक डगर चाहिये ,
गीत गाता हुआ हरेक शहर चाहिये ।
हिन्दु, मुस्लिम, सिख औ’ ईसाई जहाँ ,
आपस में कभी भी टकरायें नहीं ,
मिल जुल कर रहें और इबादत करें
मिल कर मुल्क की ये सब हिफाज़त करें ।
जहाँ चम्पा भी हो और चमेली भी हो ,
रजनीगंधा भी हो और बेला भी हो,
जहाँ हो गुलाब की सुन्दर पंखुड़ियाँ
और रंग बिरंगी प्यारी तितलियाँ ।
हमें चहकता हुआ ये गुलशन चाहिये ,
खिलखिलाता हुआ ही ये वतन चाहिये .....
घर अपना जला या दूसरे का जला ,
आशियाने मोहब्बत एक जला दोस्तों ।
रक्त अपना बहा, दूसरे का हो बहा ,
किसी मानव का रक्त है बहा दोस्तों ।
न हिन्दु मरें और नहीं मुस्लमाँ मरे ,
सारे के सारे हैं ये महज इंसा मरें ।
नफरत की खड़ी कर के इमारत कोई ,
न हमें मंदिर चाहिये , न मस्ज़िद चाहिये ।
जहाँ चैनो सुकून से रह पायें सभी ,
हमें मात्र ऐसा अदद एक घर चाहिये ।
खिलखिलाता हुआ ही ये वतन चाहिये ....
जहाँ न कोई किसी पर भी वार करे ,
वृथा कभी बिन कारण नर संहार करे ,
जिसमें राम हों और रहीम भी हों ,
कृष्ण भी हों, साथ ही करीम भी हों ,
छिपी हो जिसमें बस प्रीत की चाशनी ,
हमें ऐसा ही मृदुल एक भजन चाहिये ।
प्रेम ज्योति की अनुपम आभा दिल में लिये
देश के लिये पहले हृदय में नमन चाहिये ।
खिलखिलाता हुआ ही ये वतन चाहिये ....

. ____________
: सतीश वर्मा

श्री गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह~25
प्रथम चरण शिल्प और शिल्पी
विधा ~गीत
मुखडे एवं पूरक पंक्तियों का स्थाई तुकान्त~अरो
मुखडे एवं पूरक पंक्तियों का मात्रा भार~16~14
प्रत्येक अन्तरे का तुकान्त क्रमश:
1.आनी है
2.अडा था
3.आरा
पूरक पंक्तियों का मात्रा भार~16~14 के क्रम में
सम्मान्य श्री महेश जैन ज्योति जी को
सादर समर्पित~
हे!भारत के वीर सपूतों!तन मन में हूंकार भरो!
आजादी के वर्षगाँठ पर,नव उमंग उत्साह भरो!
आजादी जो मिली आज है,विख्यात हिन्द जुबानी है!
वीर सपूतों की कुर्बानी,हिन्द की अमिट निशानी है!
क्रान्तिकारियों के साहस से,वतन हिन्द आजाद हुआ!
आजादी का जश्न मनाओ,वीरों का यश गान करो!
हे! भारत के वीर सपूतों....
बेरहम दरिन्दों के चंगुल में,चमन हमारा उजडा था!
गुलामी के जंजीरों में,अमन हमारा जकडा था!
पाँव में बेडी जंजीरों के,रुके नही कदम वीरों के!
त्याग तपस्या और कुर्बानी, रणवीरों की याद करो!
हे!भारत के वीर सपूतों....
अखिल विश्व में सबसे न्यारा, लहराये तिरंगा प्यारा!
रणगाथा गौरव गरिमा का,अतुल्य भारत देश हमारा!
विजय तिरंगा लहराता है,दुश्मन का दिल घबराता है!
विजय दिवस के महापर्व पर,नव भारत निर्माण करो!
हे! भारत के..

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