गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 29
समारोह अध्यक्ष आदरणीय श्री करण सिंह परिहार जी के सन्मुख
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
बिधा - गजल,
बहर - 2122, 2122, 2122, 212
गालगागा,गालगागा,गालगागा,गालगा
काफिया- ए
रदीफ़- देखा करो
****************************************************
हम जले है रात दिन किस आह से देखा करो ।
ख़ाक करके रख दिया इक चाह ने देखा करो ।।
समारोह अध्यक्ष आदरणीय श्री करण सिंह परिहार जी के सन्मुख
कार्यक्रम - शिल्प और शिल्पी
बिधा - गजल,
बहर - 2122, 2122, 2122, 212
गालगागा,गालगागा,गालगागा,गालगा
काफिया- ए
रदीफ़- देखा करो
****************************************************
हम जले है रात दिन किस आह से देखा करो ।
ख़ाक करके रख दिया इक चाह ने देखा करो ।।
जो मिले हो अब हमे तो बात ये भी जान लों ।
खो न जाये हम कही इस राह में देखा करो ।।
चाँद से ये पूछ लो क्यों चांदनी को गम दिया ।
दूर करके रख दिया है, ताब से देखा करो ।।
जो फलक पे लिख दिया इक नाम हमने यार का ।
क्यों मचे है शोर फिर इस नाम पे देखा करो ।।
देखकर अब तुम हमे छुपने लगे हो ओट में ।
दिल हमारा लग गया फिर जाम से देखा करो ।।
कोशिशे कर ली बहुत ये दाग ना देखे कोई ।
पर हमे रुसवा किया वो आप थे देखा करो ।।
जब मिलो उनसे कभी तो अर्ज मेरी मान लो।
वो विनय का प्यार है आदाब से देखा करो।।
विनय बाली सिंह**********
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय Karan Sp जी को सादर समर्पित
=========================================
विधा - गज़ल
काफिया - आ
रदीफ - कुछ और है
मापनी - २१२२ / २१२२ / २१२२ / २१२
खो न जाये हम कही इस राह में देखा करो ।।
चाँद से ये पूछ लो क्यों चांदनी को गम दिया ।
दूर करके रख दिया है, ताब से देखा करो ।।
जो फलक पे लिख दिया इक नाम हमने यार का ।
क्यों मचे है शोर फिर इस नाम पे देखा करो ।।
देखकर अब तुम हमे छुपने लगे हो ओट में ।
दिल हमारा लग गया फिर जाम से देखा करो ।।
कोशिशे कर ली बहुत ये दाग ना देखे कोई ।
पर हमे रुसवा किया वो आप थे देखा करो ।।
जब मिलो उनसे कभी तो अर्ज मेरी मान लो।
वो विनय का प्यार है आदाब से देखा करो।।
विनय बाली सिंह**********
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय Karan Sp जी को सादर समर्पित
=========================================
विधा - गज़ल
काफिया - आ
रदीफ - कुछ और है
मापनी - २१२२ / २१२२ / २१२२ / २१२
<><><><><><><><><><><><><><><>
दिल कहे कुछ पर जुबां से बोलता कुछ और है |
हो गया है दिल दिवाना या हुआ कुछ और है ||
*****************************************
जी रहें या मर रहें हैं कुछ नहीं हमको पता |
चाहिये कुछ ओर पर ये माँगता कुछ और है ||
******************************************
हसरतें कुछ भी नहीं थी पर हमें सब कुछ मिला |
या खुदा है महरबां या माजरा कुछ और है ||
*******************************************
ये न पूछो इश्क हमपर क्या कयामत ढा रहा |
ये सजा है इश्क की या इंतिहा कुछ और है ||
******************************************
जी रहें थे जिंदगी हम जीत की उम्मीद में |
मंजिलें ही दूर थी या फासला कुछ और है ||
*****************************************
जिंदगी जिनकी निराली मौत भी होगी हसीं |
लग रहा हमको खुदा का फैसला कुछ और है ||
******************************************
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गमहरी समारोह- 29
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- फाइलुन फाइलुन मुफाईलुन (प्रत्येक मिसरे मेँ मात्रा पतन)
काफ़िया- आर
रदीफ़- पाया है
समारोह अध्यक्ष माननीय करन यस पी जी के सम्मान मेँ सादर प्रस्तुत-
..........
दिल कहे कुछ पर जुबां से बोलता कुछ और है |
हो गया है दिल दिवाना या हुआ कुछ और है ||
*****************************************
जी रहें या मर रहें हैं कुछ नहीं हमको पता |
चाहिये कुछ ओर पर ये माँगता कुछ और है ||
******************************************
हसरतें कुछ भी नहीं थी पर हमें सब कुछ मिला |
या खुदा है महरबां या माजरा कुछ और है ||
*******************************************
ये न पूछो इश्क हमपर क्या कयामत ढा रहा |
ये सजा है इश्क की या इंतिहा कुछ और है ||
******************************************
जी रहें थे जिंदगी हम जीत की उम्मीद में |
मंजिलें ही दूर थी या फासला कुछ और है ||
*****************************************
जिंदगी जिनकी निराली मौत भी होगी हसीं |
लग रहा हमको खुदा का फैसला कुछ और है ||
******************************************
~रमा वर्मा~
गोपाल राम गमहरी समारोह- 29
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- फाइलुन फाइलुन मुफाईलुन (प्रत्येक मिसरे मेँ मात्रा पतन)
काफ़िया- आर
रदीफ़- पाया है
समारोह अध्यक्ष माननीय करन यस पी जी के सम्मान मेँ सादर प्रस्तुत-
..........
जबसे तेरा ये प्यार पाया है
दिल ने असली करार पाया है
जाने कैसा सूरूर है छाया
जबसे तेरा दीदार पाया है
जिन्दगी जैसे खिल गई मेरी
जबसे बाहोँ का हार पाया है
जब भी रहता वो दूर नज़रोँ से
मैँनै खुद को बीमार पाया है
पहला कहते हैँ प्यार हम जिसको
बोलो कोई बिसार पाया है
जो था सपना वो आजकल देखो
मैने वो बार बार पाया है
दिल मेँ जबसे "आकाश" रहता वो
मैँने ग़म भी हजार पाया है
ग़ज़ल- आकाश महेशपुरी
पता-
वकील कुशवाहा उर्फ आकाश महेशपुरी
ग्रा.- महेशपुर
पो.- कुबेरस्थान
जि.- कुशीनगर
उत्तर प्रदेश
09919080399
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी
विधा-ग़ज़ल
बहर-22 22 22 2
रदीफ - पिता
काफिया- आर
****पिता****
माँ के हर श्रृंगार पिता।
बच्चों के संसार पिता।।
माँ आँगन की तुलसी है।
घर के वंदनवार पिता।।
घर की नीव सरीखी माँ।
घर की छत-दीवार पिता।।
माँ कर्त्तव्य बताती है।
देते है अधिकार पिता।।
बच्चों की पालक है माँ।
घर के पालनहार पिता।।
माँ सपने बुनती रहती।
करते हैं साकार पिता।।
आज विदा करके बेटी।
रोये पहली बार पिता।।
बच्चों की हर बाधा से।
लड़ने को तैयार पिता।।
बच्चे खुशियां पाएं तो।
कर दें जान निसार पिता।।
घर को जोड़े रखने में।
टूटे कितनी बार पिता।।
घर का भार उठाते थे।
अब हैं घर के भार पिता।।
बंटवारे ने बाँट दिए-
बूढ़ी माँ-लाचार पिता।।
----डॉ.कमलेश द्विवेदी
----मो.09415474674
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी जी को सादर समर्पित
दिल ने असली करार पाया है
जाने कैसा सूरूर है छाया
जबसे तेरा दीदार पाया है
जिन्दगी जैसे खिल गई मेरी
जबसे बाहोँ का हार पाया है
जब भी रहता वो दूर नज़रोँ से
मैँनै खुद को बीमार पाया है
पहला कहते हैँ प्यार हम जिसको
बोलो कोई बिसार पाया है
जो था सपना वो आजकल देखो
मैने वो बार बार पाया है
दिल मेँ जबसे "आकाश" रहता वो
मैँने ग़म भी हजार पाया है
ग़ज़ल- आकाश महेशपुरी
पता-
वकील कुशवाहा उर्फ आकाश महेशपुरी
ग्रा.- महेशपुर
पो.- कुबेरस्थान
जि.- कुशीनगर
उत्तर प्रदेश
09919080399
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी
विधा-ग़ज़ल
बहर-22 22 22 2
रदीफ - पिता
काफिया- आर
****पिता****
माँ के हर श्रृंगार पिता।
बच्चों के संसार पिता।।
माँ आँगन की तुलसी है।
घर के वंदनवार पिता।।
घर की नीव सरीखी माँ।
घर की छत-दीवार पिता।।
माँ कर्त्तव्य बताती है।
देते है अधिकार पिता।।
बच्चों की पालक है माँ।
घर के पालनहार पिता।।
माँ सपने बुनती रहती।
करते हैं साकार पिता।।
आज विदा करके बेटी।
रोये पहली बार पिता।।
बच्चों की हर बाधा से।
लड़ने को तैयार पिता।।
बच्चे खुशियां पाएं तो।
कर दें जान निसार पिता।।
घर को जोड़े रखने में।
टूटे कितनी बार पिता।।
घर का भार उठाते थे।
अब हैं घर के भार पिता।।
बंटवारे ने बाँट दिए-
बूढ़ी माँ-लाचार पिता।।
----डॉ.कमलेश द्विवेदी
----मो.09415474674
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी जी को सादर समर्पित
गीत रचना - मेरे लिए
************************
मुखड़े का तुकांत--लिए
अंतरा तुकांत क्रमश:--रही मैं , आमिनी, अंबर मे
मुखड़े का मात्रा भार ---२५ .
अंतरा मात्रा भार -----२६ .
----------------
फूल चम्पा के तुमने बिछाये मेरे लिए
प्रेम गीत तुमने गुनगुनाये मेरे लिए ।
तुम्हारे प्रेम की बारिश मे भीगी रही मैं
तुम्हारे मधुर आगोश मे सोयी रही मैं
प्रिय तुम ऐसा मधुमास लाये मेरे लिए । [1]
अविस्मृत है वो रुपहली मधुर यामिनी
तनिक स्पर्श से चमकती थी वो दामिनी
प्रिय तुम ऐसा परिहास लाये मेरे लिए । [2]
ज्यों दिवाकर सदा मुसकाते रहते अंबर मे
तुम्हारे प्रेम की रागिनियाँ धरती अंबर मे
प्रिय तुम ऐसा प्रेम उजास लाये मेरे लिए । [३]
फूल चम्पा के तुमने बिछाये मेरे लिए
प्रेम गीत तुमने गुनगुनाये मेरे लिए ॥...............अन्नपूर्णा बाजपेई ‘अंजु’
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
समारोह अध्यक्ष --आदरणीय करण सिंह परिहार को समरर्पित
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विधा ग़ज़ल --
बहर 1222 1222 1222 1222
रदीफ ---जाये
काफिया --आ
************************
मुखड़े का तुकांत--लिए
अंतरा तुकांत क्रमश:--रही मैं , आमिनी, अंबर मे
मुखड़े का मात्रा भार ---२५ .
अंतरा मात्रा भार -----२६ .
----------------
फूल चम्पा के तुमने बिछाये मेरे लिए
प्रेम गीत तुमने गुनगुनाये मेरे लिए ।
तुम्हारे प्रेम की बारिश मे भीगी रही मैं
तुम्हारे मधुर आगोश मे सोयी रही मैं
प्रिय तुम ऐसा मधुमास लाये मेरे लिए । [1]
अविस्मृत है वो रुपहली मधुर यामिनी
तनिक स्पर्श से चमकती थी वो दामिनी
प्रिय तुम ऐसा परिहास लाये मेरे लिए । [2]
ज्यों दिवाकर सदा मुसकाते रहते अंबर मे
तुम्हारे प्रेम की रागिनियाँ धरती अंबर मे
प्रिय तुम ऐसा प्रेम उजास लाये मेरे लिए । [३]
फूल चम्पा के तुमने बिछाये मेरे लिए
प्रेम गीत तुमने गुनगुनाये मेरे लिए ॥...............अन्नपूर्णा बाजपेई ‘अंजु’
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
समारोह अध्यक्ष --आदरणीय करण सिंह परिहार को समरर्पित
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विधा ग़ज़ल --
बहर 1222 1222 1222 1222
रदीफ ---जाये
काफिया --आ
हमारे दर्द को दुनियाँ तमाशो में न गा जाये
बजा ताली सभी झूमें हमारा दर्द भा जाये
न आये है किनारे पर अभी ठहरा समुन्दर है।
बड़ी खामोश लहरे हैं कहीं तूफाँ न आ जाये।।
सहेगें जुल्म अब कितना बड़ा जालिम हुआ हाकिम।
पड़ी थी लाश सड़को पे कफन वो बेच खा जाये।।
सभालो अब वतन अपना तबाही का दिखे मंजर
घरों में आज खुशियाँ है कहीं मातम न छा जाये
जला कर आस का दीपक न जाओ छोड़ कर यारो
कुचलने का हमारा सर न दुश्मन मौका पा जाये
अखंड गहमरी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
समारोह अध्यक्ष --आदरणीय करण सिंह परिहार को समरर्पित
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विद्या --गीतिका
बजा ताली सभी झूमें हमारा दर्द भा जाये
न आये है किनारे पर अभी ठहरा समुन्दर है।
बड़ी खामोश लहरे हैं कहीं तूफाँ न आ जाये।।
सहेगें जुल्म अब कितना बड़ा जालिम हुआ हाकिम।
पड़ी थी लाश सड़को पे कफन वो बेच खा जाये।।
सभालो अब वतन अपना तबाही का दिखे मंजर
घरों में आज खुशियाँ है कहीं मातम न छा जाये
जला कर आस का दीपक न जाओ छोड़ कर यारो
कुचलने का हमारा सर न दुश्मन मौका पा जाये
अखंड गहमरी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
समारोह अध्यक्ष --आदरणीय करण सिंह परिहार को समरर्पित
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विद्या --गीतिका
मिटटी सने बच्चे भूखे बदन अध् नंगा है
रोटी को हुए फुटपाथी मन चंगा है
पिता के सहारे के अरमान बदरंग हुए
माता की आँखों से बहती अश्रु गंगा है
राखी के टूटे हुए धागे बहन की टूटी आशा
अभाव की आंधी व्यथा का गोरख धंधा है
पेट के लिए घर छोडा दर -दर भटकते हुए
भूखे पेट सोय दुनिया बहु रंगा है
हाथ फैलाते दर पर रोटी के लिए
दे उसका भला हमारी रक्षक माँ गंगा है
शान्ति पुरोहित
गोपालराम गहमरी ,साहित्य समारोह -२९
कार्यक्रम अध्यक्ष --करण सिंह परिहार को समर्पित .
कार्यक्रम -शिल्प और शिल्पी '
विधा --गीत ----( स्वरचित )
मुखड़े का तुकांत-- ईत.
अंतरा तुकांत क्रमश:--ओती,आरा ,ऊरी.
मुखड़े का मात्रा भार ---२७ .
अंतरा मात्रा भार -----२६ .(१६-१० पर यति )
-------------------------------------------------------------------
प्रतिपल सोच रही हूँ जन्मे ,अमर प्रेम का गीत .
जिसको मिल जाये मोहन की, मुरली का संगीत .
बहुत कठिन अनुभूति प्रेम की ,
सहज नही होती .
बड़े जतन से पलता है ज्यों ,
सीपी में मोती .
प्रेमाराधन करूँ प्रेम से ,समझ प्रेम की रीत .
जिसको मिल जाये मोहन की ,मुरली का संगीत .
हिमगिरि पिघले तब बहती ज्यों ,
निर्मल जल धारा .
दर्द आँसुओं में ढलकर त्यों ,
गीत बने प्यारा .
गीत आत्म चिंतन -मंथन से ,निकला है नवनीत .
जिसको मिल जाए मोहन की ,मुरली का संगीत .
संभव नहीं प्रेम की कोई
परिभाषा पूरी .
प्रेम पराकाष्ठा दोनों ही ,
मिलन और दूरी .
किसकी लिख दे हार ' भारती ', किसकी लिखदे जीत .
जिसको मिल जाए मोहन की ,मुरली का संगीत .
*****************************************************
-------------------------भारती जैन ---------११-९ २०१४ -
-----------------------मोरेना( म. प्र. )
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-२९.
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी .
कार्यक्रम. प्रमुख सम्मानित करन सिंह परिहार जी के सम्मुख. प्रस्तुत
विधा-ग़जल
मापनी-२१२ २१२ २१२ २१२..
काफ़िया-इयाँ
रदीफ़- साथ थीं
* * * * *
डूबता मै गया, कश्तियाँ साथ थीं !
घर जलाते रहे, बस्तियाँ साथ थीं!
रोटी को हुए फुटपाथी मन चंगा है
पिता के सहारे के अरमान बदरंग हुए
माता की आँखों से बहती अश्रु गंगा है
राखी के टूटे हुए धागे बहन की टूटी आशा
अभाव की आंधी व्यथा का गोरख धंधा है
पेट के लिए घर छोडा दर -दर भटकते हुए
भूखे पेट सोय दुनिया बहु रंगा है
हाथ फैलाते दर पर रोटी के लिए
दे उसका भला हमारी रक्षक माँ गंगा है
शान्ति पुरोहित
गोपालराम गहमरी ,साहित्य समारोह -२९
कार्यक्रम अध्यक्ष --करण सिंह परिहार को समर्पित .
कार्यक्रम -शिल्प और शिल्पी '
विधा --गीत ----( स्वरचित )
मुखड़े का तुकांत-- ईत.
अंतरा तुकांत क्रमश:--ओती,आरा ,ऊरी.
मुखड़े का मात्रा भार ---२७ .
अंतरा मात्रा भार -----२६ .(१६-१० पर यति )
-------------------------------------------------------------------
प्रतिपल सोच रही हूँ जन्मे ,अमर प्रेम का गीत .
जिसको मिल जाये मोहन की, मुरली का संगीत .
बहुत कठिन अनुभूति प्रेम की ,
सहज नही होती .
बड़े जतन से पलता है ज्यों ,
सीपी में मोती .
प्रेमाराधन करूँ प्रेम से ,समझ प्रेम की रीत .
जिसको मिल जाये मोहन की ,मुरली का संगीत .
हिमगिरि पिघले तब बहती ज्यों ,
निर्मल जल धारा .
दर्द आँसुओं में ढलकर त्यों ,
गीत बने प्यारा .
गीत आत्म चिंतन -मंथन से ,निकला है नवनीत .
जिसको मिल जाए मोहन की ,मुरली का संगीत .
संभव नहीं प्रेम की कोई
परिभाषा पूरी .
प्रेम पराकाष्ठा दोनों ही ,
मिलन और दूरी .
किसकी लिख दे हार ' भारती ', किसकी लिखदे जीत .
जिसको मिल जाए मोहन की ,मुरली का संगीत .
*****************************************************
-------------------------भारती जैन ---------११-९ २०१४ -
-----------------------मोरेना( म. प्र. )
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह-२९.
प्रथम चरण -शिल्प और शिल्पी .
कार्यक्रम. प्रमुख सम्मानित करन सिंह परिहार जी के सम्मुख. प्रस्तुत
विधा-ग़जल
मापनी-२१२ २१२ २१२ २१२..
काफ़िया-इयाँ
रदीफ़- साथ थीं
* * * * *
डूबता मै गया, कश्तियाँ साथ थीं !
घर जलाते रहे, बस्तियाँ साथ थीं!
झोपड़ी कर रही थी,रहम की दुआ!
जब उजाड़ी गयी,हस्तियाँ साथ थीं!
एक दिन ज़िंदगी,ही कहर ढा गयी!
वो हवा जो चली,आँधियाँ साथ थीं!
जानता कुछ नही,आज नादान हूँ!
कापियाँ अधलिखी, तख्तियाँ साथ थीं!
देखता मै रहा,साँवली गोरियाँ!
हो गया था बड़ा,मस्तियाँ साथ थीं!
आदमी है मरा,साथ अरमान के!
ज़िंदगी भर वही,फब्तियाँ साथ थीं!
आरज़ू है तपन की,आज कल खुश रहें!
आखिरी मे हया,गल्तियाँ साथ थीं !!!
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित
विधा गीत
==============================================
प्राकर्तिक आपदाएं जब भी ज़मीं पर आती है....!
आदमी के अहं को तिनके सा बहा ले जाती हैं....!
ये जाति-पांति धर्म से भी ऊपर उठ जातीं हैं....!
सितम की ये दास्ताँ दिलों पर लिख जातीं हैं....!
प्रकर्ति जब भी हमें,अपना रोद्र रूप दिखाती है ...!
पैरों तले से हमारी,ज़मीन ही खिसक जातीं है....!
ये अमीरी-गरीबी पल भर में मिट जातीं है ....!
जब विपदा में ये भूख पेट में सिमट जातीं है ....
आपदाएं इंसान को जोड़ने की कला सिखाती हैं ...!
भेद-भाव भुला कर ये परस्पर सौहाद्र बढ़ाती हैं...!
क़तरा क़तरा बिखर रहा है,धरणी सम्हल न पाती है
जल थल अब एक हुए हैं,जन्नत,जहन्नुम बन जाती है
कब तक बांटोगे भारत माँ को,अब उसकी जलती छाती है
प्रकर्ति से खिलवाड़ न करना,"सतोष' वो नहीं सह पाती है...
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२९
कार्यक्रम -शिल्प और शिल्पी
विधा -हिंदी ग़ज़ल
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी
रदीफ़ =कितने दिन
लेखन विधा =गागा गागा गागा गागा (सम मात्रिक )
जब उजाड़ी गयी,हस्तियाँ साथ थीं!
एक दिन ज़िंदगी,ही कहर ढा गयी!
वो हवा जो चली,आँधियाँ साथ थीं!
जानता कुछ नही,आज नादान हूँ!
कापियाँ अधलिखी, तख्तियाँ साथ थीं!
देखता मै रहा,साँवली गोरियाँ!
हो गया था बड़ा,मस्तियाँ साथ थीं!
आदमी है मरा,साथ अरमान के!
ज़िंदगी भर वही,फब्तियाँ साथ थीं!
आरज़ू है तपन की,आज कल खुश रहें!
आखिरी मे हया,गल्तियाँ साथ थीं !!!
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित
विधा गीत
==============================================
प्राकर्तिक आपदाएं जब भी ज़मीं पर आती है....!
आदमी के अहं को तिनके सा बहा ले जाती हैं....!
ये जाति-पांति धर्म से भी ऊपर उठ जातीं हैं....!
सितम की ये दास्ताँ दिलों पर लिख जातीं हैं....!
प्रकर्ति जब भी हमें,अपना रोद्र रूप दिखाती है ...!
पैरों तले से हमारी,ज़मीन ही खिसक जातीं है....!
ये अमीरी-गरीबी पल भर में मिट जातीं है ....!
जब विपदा में ये भूख पेट में सिमट जातीं है ....
आपदाएं इंसान को जोड़ने की कला सिखाती हैं ...!
भेद-भाव भुला कर ये परस्पर सौहाद्र बढ़ाती हैं...!
क़तरा क़तरा बिखर रहा है,धरणी सम्हल न पाती है
जल थल अब एक हुए हैं,जन्नत,जहन्नुम बन जाती है
कब तक बांटोगे भारत माँ को,अब उसकी जलती छाती है
प्रकर्ति से खिलवाड़ न करना,"सतोष' वो नहीं सह पाती है...
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह =२९
कार्यक्रम -शिल्प और शिल्पी
विधा -हिंदी ग़ज़ल
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी
रदीफ़ =कितने दिन
लेखन विधा =गागा गागा गागा गागा (सम मात्रिक )
हे मानव इस जीवन का तो , आधार रहेगा कितने दिन
इस तन में चलतीं साँसों का ,फिर तार रहेंगा कितने दिन
धन- माल कमाया हैं तूनें ,संसार बसाया भी तूनें
सब खाली कर ही जायेंगें ,अधिकार रहेगा कितने दिन
तुम मटक -मटक कर चलतें हों ,किस मद में फूलें फिरते हो
मदहोश हुयें तुम घूम रहें ,यह वार रहेंगा कितने दिन
जब ज्ञान अधूरा तुम लेकर ,खुद ज्ञानी बहुत कहते हो
झूठी पोथी को तू पढ़कर ,गुलजार रहेगा कितने दिन
मात -पिता या घरनी होगी ,बहन सहित सुत होगा भाई
अपना कहने वालो का तो ,यह प्यार रहेगा कितने दिन
लख चौरासी जीवन लेकर ,तू भटक -भटक कर आया हैं
इस नाशवान दुनियाँ का तू ,आधार रहेगा कितने दिन
काल निरंजन की माया से,जब तीनों लोक पसारा हैं
महाकाल से छल तुम करतें ,स्वाविकार रहेगा कितने दिन
इतना खुद तो सोच सकों तो ,थी नाश हुयी रावण नगरी
दम्भ लियें यह घूम रहें हो ,हुंकार रहेगा कितने दिन
सुरेश कुमार उत्साही
९९१९७१०१०६६१
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- 2122 1212 22
काफिया- आ
रदीफ़- देगा
इस तन में चलतीं साँसों का ,फिर तार रहेंगा कितने दिन
धन- माल कमाया हैं तूनें ,संसार बसाया भी तूनें
सब खाली कर ही जायेंगें ,अधिकार रहेगा कितने दिन
तुम मटक -मटक कर चलतें हों ,किस मद में फूलें फिरते हो
मदहोश हुयें तुम घूम रहें ,यह वार रहेंगा कितने दिन
जब ज्ञान अधूरा तुम लेकर ,खुद ज्ञानी बहुत कहते हो
झूठी पोथी को तू पढ़कर ,गुलजार रहेगा कितने दिन
मात -पिता या घरनी होगी ,बहन सहित सुत होगा भाई
अपना कहने वालो का तो ,यह प्यार रहेगा कितने दिन
लख चौरासी जीवन लेकर ,तू भटक -भटक कर आया हैं
इस नाशवान दुनियाँ का तू ,आधार रहेगा कितने दिन
काल निरंजन की माया से,जब तीनों लोक पसारा हैं
महाकाल से छल तुम करतें ,स्वाविकार रहेगा कितने दिन
इतना खुद तो सोच सकों तो ,थी नाश हुयी रावण नगरी
दम्भ लियें यह घूम रहें हो ,हुंकार रहेगा कितने दिन
सुरेश कुमार उत्साही
९९१९७१०१०६६१
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- 2122 1212 22
काफिया- आ
रदीफ़- देगा
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित
इश्क को गर कोई हवा देगा
आग दरिया में भी लगा देगा
चांदनी भी हसद से देखेगी
अपना चिल्मन वो गर हटा देगा
जान देने की बात करता है
वो यक़ीनन मुझे दगा देगा
सब्र मत आजमा तू अब मेरा
बाँध टूटा तो सब मिटा देगा
नफरतें, बद्दुआ या दिल अपना
देखना है मुझे तू क्या देगा
कोई मुझ में हुआ है यूं 'पागल'
तेरी खातिर मुझे भुला देगा...
नितिन सिकरवार 'पागल'
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित ...
------------------------------------
विधा - ग़ज़ल
२१२२/१२१२/२२
फ़ायलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन
काफिया - आया
रदीफ़ - है
९६३४७६३०७६इश्क को गर कोई हवा देगा
आग दरिया में भी लगा देगा
चांदनी भी हसद से देखेगी
अपना चिल्मन वो गर हटा देगा
जान देने की बात करता है
वो यक़ीनन मुझे दगा देगा
सब्र मत आजमा तू अब मेरा
बाँध टूटा तो सब मिटा देगा
नफरतें, बद्दुआ या दिल अपना
देखना है मुझे तू क्या देगा
कोई मुझ में हुआ है यूं 'पागल'
तेरी खातिर मुझे भुला देगा...
नितिन सिकरवार 'पागल'
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित ...
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विधा - ग़ज़ल
२१२२/१२१२/२२
फ़ायलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन
काफिया - आया
रदीफ़ - है
जिंदगी ने बहुत सताया है !
खूब रोना हमें रूलाया है !!
हम कभी चैन से न रह पाये !
नाच हरदम हमें नचाया है !!
रो रहे है चला नहीं धंधा !
काम हमने नहीं जमाया है !!
सादगी से रहू भला कैसे !
जिस्त को दाव पर लगाया है !!
तोहफा भी कबूल करता में !
दाम हमने नहीं कमाया है !!
आज सब से नजर चुराते क्यों !
झूठ को साच पर मिलाया है !!
** आलोक **
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित
"गीतिका"
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~
मापनी 222 222 222 222 222
समांत-आन
पदांत- हमारी हिन्दी माँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
संस्कृति भारत की पहली पहचान हमारी हिन्दी माँ
मीठी भारत की मधु तान जुबान हमारी हिन्दी माँ
राष्ट्रसुभाषा हिन्दी भारत का अतिशय गौरव सबका
हर भारतवासी बोली अभिमान हमारी हिंन्दी माँ
जोड़कर सभी प्रांतो हिंन्दी माँ एकजुट सदा रखती
ज्ञान अमर ज्योति जलाती वरदान हमारी हिन्दी माँ
रक्षा सेवा सम्मान सुजान करे सब हिंन्दी माँ का
स्वार्थ सियासत से आज परेशान हमारी हिंन्दी माँ
छूकर हिंन्दी हर हिंदुस्तानी स्नेह दिलो बरसाती
आओ आज प्रणाम करे मान हमारी हिंन्दी माँ
पवन बत्तरा
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
कार्यक्रम अध्यक्ष **करण सिंह परिहार को समरर्पित , काफिया ---आर रदीफ --नए
एक ग़ज़ल -- बहर २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २
इस बहर में २२ मात्रा को ११२ , १२१ ,२११ कर सकने ही छूट रहती है
बस गेयता बाधित न को , इसका ध्यान रखा जाता है
------------------------------------------------------------------------------
बे समझे बूझे ले आये घर घर में त्यौहार नए
----------------------------------------------
22 22 22 22 22 22 22 2
लगे कमाने जब भी बच्चे बना लिए घर बार नए
मगर बुढ़ापे को क्या देंगे उस घर में अधिकार नए
खूब रोना हमें रूलाया है !!
हम कभी चैन से न रह पाये !
नाच हरदम हमें नचाया है !!
रो रहे है चला नहीं धंधा !
काम हमने नहीं जमाया है !!
सादगी से रहू भला कैसे !
जिस्त को दाव पर लगाया है !!
तोहफा भी कबूल करता में !
दाम हमने नहीं कमाया है !!
आज सब से नजर चुराते क्यों !
झूठ को साच पर मिलाया है !!
** आलोक **
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी को सादर समर्पित
"गीतिका"
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मापनी 222 222 222 222 222
समांत-आन
पदांत- हमारी हिन्दी माँ
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संस्कृति भारत की पहली पहचान हमारी हिन्दी माँ
मीठी भारत की मधु तान जुबान हमारी हिन्दी माँ
राष्ट्रसुभाषा हिन्दी भारत का अतिशय गौरव सबका
हर भारतवासी बोली अभिमान हमारी हिंन्दी माँ
जोड़कर सभी प्रांतो हिंन्दी माँ एकजुट सदा रखती
ज्ञान अमर ज्योति जलाती वरदान हमारी हिन्दी माँ
रक्षा सेवा सम्मान सुजान करे सब हिंन्दी माँ का
स्वार्थ सियासत से आज परेशान हमारी हिंन्दी माँ
छूकर हिंन्दी हर हिंदुस्तानी स्नेह दिलो बरसाती
आओ आज प्रणाम करे मान हमारी हिंन्दी माँ
पवन बत्तरा
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
कार्यक्रम अध्यक्ष **करण सिंह परिहार को समरर्पित , काफिया ---आर रदीफ --नए
एक ग़ज़ल -- बहर २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २
इस बहर में २२ मात्रा को ११२ , १२१ ,२११ कर सकने ही छूट रहती है
बस गेयता बाधित न को , इसका ध्यान रखा जाता है
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बे समझे बूझे ले आये घर घर में त्यौहार नए
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22 22 22 22 22 22 22 2
लगे कमाने जब भी बच्चे बना लिए घर बार नए
मगर बुढ़ापे को क्या देंगे उस घर में अधिकार नए
आयातित हो गयी सभ्यता पच्छिम उत्तर दच्छिन की
बे समझे बूझे ले आये घर घर में त्यौहार नए
हाय बाय के अब प्रेमी सब, नमस्कार पिछडापन है
परम्पराएं आज पुरानी खोज रहीं स्वीकार नए
पत्ते डाली ही काटे हैं , जड़ें वहीं की वहीं रहीं
इसी लिए तो रोज़ पनपते जाते हैं मक्कार नए
थोड़ा अहम तुम्हारा टूटे , थोड़ा सा पिघले मेरा
इस टूटे रिश्ते में खोजें आ फिर से अधिकार नए
केवल चोरी , बलत्कार या लूट पाट की धटनाएं
रोज़ यही सब धटना है जब, क्या लिख दें अखबार नए
-------------------------------------------------------------
गिरिराज भंडारी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी जी को सादर समर्पित
बे समझे बूझे ले आये घर घर में त्यौहार नए
हाय बाय के अब प्रेमी सब, नमस्कार पिछडापन है
परम्पराएं आज पुरानी खोज रहीं स्वीकार नए
पत्ते डाली ही काटे हैं , जड़ें वहीं की वहीं रहीं
इसी लिए तो रोज़ पनपते जाते हैं मक्कार नए
थोड़ा अहम तुम्हारा टूटे , थोड़ा सा पिघले मेरा
इस टूटे रिश्ते में खोजें आ फिर से अधिकार नए
केवल चोरी , बलत्कार या लूट पाट की धटनाएं
रोज़ यही सब धटना है जब, क्या लिख दें अखबार नए
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गिरिराज भंडारी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह --29
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित गीत/गजल/दोहा/छंद/3मुक्तक/3 कहमुकरी/
दिनॉंक--11 सितम्बर प्रात:10 बजे से 12 सितम्बर प्रात:10 बजे तक
अध्यक्ष ---आदरणीय करण एस पी जी जी को सादर समर्पित
विधा :ग़ज़ल
काफ़िया :आत
रदीफ़ :तुम्हारी
बहर: २२, २२, २२,२२
कुछ शब्द.........
मोहब्बत बहुत पाकीज़ा होती है ,इसमें मिला धोखा महबूब को तोड़ जरूर देता है पर उसके सच्चे प्यार को मिटा नहीं पाता, कुछ ऐसे ही खट्टे- मीठे जज्बातों को पिरोया है आप सब गुणीजनों के लिए.........अपनी ग़ज़ल मे .................
जीवन मे हर बात तुम्हारी
संजोई सौगात तुम्हारी ।।
बीती सुन्दर सपने जैसी
बाहो मे हर रात तुम्हारी।।
इश्क किया था तुमसे बेहद
पूछी थी कब जात तुम्हारी ।।
विषधर भी बन जाती मै,गर
चंदन होती गात तुम्हारी।।
कहते हो अब राह अलग है
क्या मै समझूँ बात तुम्हारी।।
आँगन ,दीवारें इस घर की
सह ना पायीं घात तुम्हारी ।।
टूटे सपने, बिखरा आँगन
रो देगी अब मात तुम्हारी।।
छोड़ेंगे अपने जब होगी
आँखों से बरसात तुम्हारी ।।
खुशिओं को तरसोगे इकदिन
"शह"मेरी वो "मात"तुम्हारी।।
कह पाओ तो माँ से कहना
ग़मगीन न हो रात तुम्हारी।।
जीती हूँ मैं तो अब प्रियतम
यामे हर बात तुम्हारी।।
"शिलपी " हूँ मै गढ़ना जानूँ
चुभती थी ये बात तुम्हारी।। ........DR. SHIPRA
काफ़िया :आत
रदीफ़ :तुम्हारी
बहर: २२, २२, २२,२२
कुछ शब्द.........
मोहब्बत बहुत पाकीज़ा होती है ,इसमें मिला धोखा महबूब को तोड़ जरूर देता है पर उसके सच्चे प्यार को मिटा नहीं पाता, कुछ ऐसे ही खट्टे- मीठे जज्बातों को पिरोया है आप सब गुणीजनों के लिए.........अपनी ग़ज़ल मे .................
जीवन मे हर बात तुम्हारी
संजोई सौगात तुम्हारी ।।
बीती सुन्दर सपने जैसी
बाहो मे हर रात तुम्हारी।।
इश्क किया था तुमसे बेहद
पूछी थी कब जात तुम्हारी ।।
विषधर भी बन जाती मै,गर
चंदन होती गात तुम्हारी।।
कहते हो अब राह अलग है
क्या मै समझूँ बात तुम्हारी।।
आँगन ,दीवारें इस घर की
सह ना पायीं घात तुम्हारी ।।
टूटे सपने, बिखरा आँगन
रो देगी अब मात तुम्हारी।।
छोड़ेंगे अपने जब होगी
आँखों से बरसात तुम्हारी ।।
खुशिओं को तरसोगे इकदिन
"शह"मेरी वो "मात"तुम्हारी।।
कह पाओ तो माँ से कहना
ग़मगीन न हो रात तुम्हारी।।
जीती हूँ मैं तो अब प्रियतम
यामे हर बात तुम्हारी।।
"शिलपी " हूँ मै गढ़ना जानूँ
चुभती थी ये बात तुम्हारी।। ........DR. SHIPRA
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