Monday, 1 September 2014

समारोह 27 दिनांक 28 अगस्‍त शिल्‍प और शिल्‍पी अध्‍यक्ष श्री डी0के0 नागची रौशन जी विजेता रजनीश तपन जी

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह ~27
प्रथम चरण~शिल्प और शिल्पी
विधा~गीत
मुखड़े तथा प्रत्येक पंक्ति का मात्रा भार~16 16
मुखड़े तथा अन्तरोँ का तुकांत ~आम न पूछो।
अध्यक्ष आदरणीय नागइच रोशन जी के सम्मान मे सादर प्रस्तुत
॰॰॰
रहने दो गुमनाम, न पूछो।
यारो!मेरा नाम न पूछो।
काम मिले तो नाम बताऊँ।
रहने दो बेनाम न पूछो।
1-दौलत का जब नशा चढ़ेगा।
हर रिश्ते का भाव बढ़ेगा।
लेकिन मै अनमोल मुहब्बत ।
यारोँ मेरा दाम न पूछो।
रहने दो...
क्यूँ अपने अंदाज बदल दूँ।
कल तो कल था आज बदल दूँ।
बदल गयी जब रूह हमारी,
क्या होगा अंजाम न पूछो।
रहने दो...
फेँक रहा है रोटी कोई।
डूँढ रहा है रोटी कोई।
खुद पर रोती औरत देखो।
बदली है आवाम न पूछो।
रहने दो....
मत पूछो अब जात हमारी।
जीत तुम्हारी ,मात हमारी ।
उड़ न जाये सुबह की लाली।
डरी डरी है शाम न पूछो।
रहने दो गुमनाम....


गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 27
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- कुण्डलिनी छन्द
शिल्प- यह चार चरणोँ वाला बिषम मात्रिक छन्द है, इसके प्रथम दो चरणोँ की पंक्तियोँ का मात्राभार- 13/11 तथा दूसरे चरण की पंक्तियोँ का मात्राभार- 11/13 होता है।यह एक दोहा तथा अर्धरोला के योग से बनता है,दोहा का अंतिम पद अनिवार्यतः अर्धरोला का प्रथम पद होता है।
तुकान्त-
1-भाव/आती
2-ओर/रूपी
3-अंग/नैया
ँँँ
समारोह अध्यक्ष सम्मान्य आदरणीय Dk Nagich Roshan सर जी को सादर समर्पित
ँँँँ
1-
पापी पर्वत सम बढे, लिए क्रूरता भाव।
राई भर भी ना बढा, पुण्य प्रेम सद्भाव।।
पुण्य प्रेम सद्भाव, धरा आँसू टपकाती।
छुपा हृदय मेँ घाव, गीत नीरव का गाती।।
2-
आज प्रलय विस्मित लिए, बढा तिमिर चहुँ ओर।
द्वेष बाण उर बेधकर, खुद करता है शोर।।
खुद करता है शोर, अश्रु कण पाहन रूपी।
पीकर झूमेँ लोग , हलाहल मदिरा रूपी।।
3-
भाव मृदुल से रहित तन, ज्ञान रहित सत्संग।
दोनों ही जब मिल गये, सृजित हुआ हुडदंग।।
सृजित हुआ हुडदंग, भँवर बिच जीवन नैया।
रखकर प्रेम स्वभाव, उबारो कलुषित नैया।।
ँँँँ
करन सिंह परिहार
पिण्डारन- बाँदा (उ.प्र.)

गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 27
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्ष सम्मान्य @Dk Nagaich Roshan जी के सम्मान मेँ सादर प्रेषित
विधा : ग़ज़ल
मात्रा भार : २ १ २ २ १ २ २ १ २ २ १ २
काफ़िया : आना .
रदीफ़ : यहाँ .
अब बचा है किसे, क्या सुनाना यहाँ ,
साज़ बिन ही छिड़ा जब तराना यहाँ .
आज हासिल नहीं , लफ्ज़ दो प्यार के ,
लुट गया है , वफ़ा का खजाना यहाँ.
आग दिल में लगी आंसुओं से मेरे ,
दिल बनाया किसी ने निशाना यहाँ .
आज हसरत नहीं है , मेरी दीद की ,
अक्स भी अब हुआ है पुराना यहाँ .
साजिशों को करूं किस तरह बेअसर .
हँस रहा आज मुझपे ज़माना यहाँ .
सूखता हूँ शज़र ,टूटता हूँ बशर ,
किस तरह वो करेगा ठिकाना यहाँ ,
हर किसी ने दिया ठोकरों से उड़ा ,
अब 'अना ' लग रहा हूँ , बेगाना यहाँ ,
अनीता मेहता 'अना'
गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -27
प्रथम चरण - शिल्‍प और शिल्‍पी
विधा - गज़ल
बहर - १२२२ / १२२२ / १२२२ / १२२२
काफिया - आम
रदीफ - हो जाये
अध्यक्ष आदरणीय Dk Nagaich Roshan जी को सादर समर्पित एक प्रयास
मिले है आज हम दोनो हसीं इक शाम हो जाये
कसम तुम तोड़ दो उसकी चलो इक जाम हो जाये
पड़ा सूखा मरे भ्‍ूाखो नहीं कोई हमें पूछे
कही ऐसा न हो यारो कि कल्‍लेआम हो जाये
नहीं रखते कभ्‍ाी धीरज किसी भी काम में यारो
बचा लो नाम तुम मेरा न वो बदनाम हो जाये
तुम्‍हारे प्‍यार में जानम मरेगें डूब कर सुन लो
मरा पागल दिवाना है न चरचा आम हो जाये
मिलेगा अब नहीं जीवन मिला इक बार जो तुमको
करो कुछ काम अब ऐसा तुम्‍हारा नाम हो जाये

गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -27
प्रथम चरण - शिल्‍प और शिल्‍पी
विधा - गज़ल
बहर - १२२२ / १२२२ / १२२२ / १२२२
काफिया - आऊँ
रदीफ - मैं
अध्यक्ष आदरणीय Dk Nagaich Roshan जी को सादर समर्पित एक प्रयास
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सुहानी रात का आलम दिया दिल का जलाऊं मैं
सितारों को चुराऊं चाँद को अपना बनाऊँ मैं
सुरों को ढाल कर खुद में भरूं मैं प्यार से दामन
ग़ज़ल में साज भरकर बस उसे ही गुनगुनाऊँ मैं
कभी जागूं कभी सोऊं, अजब है हाल अब दिल का
दिवाना हो गया है दिल यही सबको बताऊँ मैं
ख़ुशी मिलती नहीं है मांगने से है पता हमको
गमों से प्यार करलूं और फिर रिश्ता निभाऊँ मैं
हजारों राह मिल जाए अगर उम्मीद दिल में हो
किरण उम्मीद की ऐसी निगाहों में जगाऊँ मैं
यही अरमान है मेरा ख़ुशी बनकर बिखर जाऊं
रमा ये ख्वाब की बातें कहो किसको सुनाऊँ मैं
~रमा वर्मा~ (२८-६-१४)
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह- 27
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
समारोह अध्यक्ष सम्मान्य Nagaich Roshan जी के सम्मान मेँ सादर प्रेषित एक ग़ज़ल-
बहर- मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन.
(कहीँ कहीँ मात्रा पतन का लाभ लिया है)
काफ़िया- आन
रदीफ़- के आगे

अगर इतरा रहे हो तुम जो अपनी शान के आगे
चलेगी एक तेरी क्या समय बलवान के आगे

ये माना आसमाँ का भी तूँ सीना चीर सकता है
मगर तूँ जा नहीँ सकता कभी शमशान के आगे

ग़मोँ के आँधियोँ मेँ भी खुशी के सिलसिले देखो
कि ग़म टिकता कहाँ कोई तेरी मुस्कान के आगे

हमारा यार होता तो सभी दुखड़े सुना देता
मगर अच्छा नहीँ लगता किसी अनजान के आगे

अगर वो जा चुका है तो महज रोना है हाथोँ मेँ
तुम्हारा वश चलेगा क्या कभी भगवान के आगे

जड़ेँ 'आकाश' होतीँ हैँ तभी ये फूल खिलते हैँ
मगर वो भूल जाता है जरा पहचान के आगे

ग़ज़ल- आकाश महेशपुरी


गोपाल राम गहमरी साहित्‍य समारोह -27
प्रथम चरण - शिल्‍प और शिल्‍पी
विधा - गज़ल
212 212 212 212
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
काफिया - आऊ
रदीफ़ - ये मुमकिन नहीं
अध्यक्ष आदरणीय Dk Nagaich Roshan जी को सादर समर्पित एक प्रयास
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प्रीत दिल में जगाऊ ये मुमकिन नहीं
औ समझ भी न पाऊ ये मुमकिन नहीं !!
मन कही भी न मेरा लगे अब सखी !
किस तरह दिल लगाऊ ये मुमकिन नहीं !!
जिंदगी यूँ बदलती रही क्या कहू !
पर तुझे सब सुनाऊ ये मुमकिन नहीं !!
हर तरफ प्यार के फूल ही फूल है !
कैसे चाहत छिपाऊ ये मुमकिन नहीं !!
जो न था कुछ वही बन गया जिंदगी !
प्यार सबको बताऊ ये मुमकिन नहीं !!
** आलोक **

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