समारोह अध्यक्ष सम्माननीय श्री कमलेश द्विवेदी जी के समक्ष
एक अदना सी कोशिश
विधा : ग़ज़ल
बह्र : मोतदारिक मुसम्मन सालिम
अरकान : फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
ग़ज़ल :
तुमने महसूस की क्या कभी तीरगी ?,
चांदनी से भी लगती भली तीरगी .
समझो है वक़्त खुद से मुलाक़ात का,
जब भी लगने लगे ज़िन्दगी तीरगी,
ख़ौफ़ कुछ इस तरह ग़म का तारी हुआ,
चांदनी भी कहे तीरगी- तीरगी.
ख़्वाब के जुगनुओं का ही था हौसला,
बिखरी बिखरी सी मुझको लगी तीरगी.
क़द्र वो रौशनी की भी समझेगा क्या,
जिसने देखी नहीं है अभी तीरगी.
उठ के रोशन वो जब भी गया बज़्म से,
खुद ब खुद महफ़िलों में ढली तीरगी.
'Roshan'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- 1222,1222,122
रदीफ़- है
काफिया- अड़ा
दिनाँक~ 21 अगस्त प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात:10 बजे तक~
कारीक्रम~ शिल्प और शिल्पी~ गीत /गजल/ मुक्तक/ छंद/दोहा / चौपाई आदि शिल्प परिचय के साथ~
अध्यक्ष आदरणीय हास्यकवि Kamlesh Dwivedi जी के सम्मुख सादर समर्पित~
विधा~ गीत
शिल्प परिचय~ मुखडे एवं पूरक पंक्तियों का स्थाई तुकान्त~ आरा है
प्रत्येक अन्तरें का तुकान्त~ 1.आदे 2.अन कर रहे
अन्तरें एवं पूरक पंक्तियों का मात्रा भार~16~14एवं16~16 के क्रम में ।
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- गीत
शिल्प विधान- गीत की सभी पँक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
तुकान्त-
मुखडे का तुकान्त- आर मिला।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- अराता था।
2- आहोँ में।
3- अन मेँ।
ँँँ
समारोह अध्यक्ष सम्मान्य आदरणीय श्री कमलेश द्विवेदी जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
द्वेष जलन की गहन गुफाओं, पर मै धँसता चला गया,
पर सद्भाविक ज्योति मार्ग का, कहीँ न मुझको द्वार मिला।
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी,अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समरर्पित
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तुमने महसूस की क्या कभी तीरगी ?,
चांदनी से भी लगती भली तीरगी .
समझो है वक़्त खुद से मुलाक़ात का,
जब भी लगने लगे ज़िन्दगी तीरगी,
ख़ौफ़ कुछ इस तरह ग़म का तारी हुआ,
चांदनी भी कहे तीरगी- तीरगी.
ख़्वाब के जुगनुओं का ही था हौसला,
बिखरी बिखरी सी मुझको लगी तीरगी.
क़द्र वो रौशनी की भी समझेगा क्या,
जिसने देखी नहीं है अभी तीरगी.
उठ के रोशन वो जब भी गया बज़्म से,
खुद ब खुद महफ़िलों में ढली तीरगी.
'Roshan'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
मापनी- 1222,1222,122
रदीफ़- है
काफिया- अड़ा
आद. श्री Kamlesh Dwivedi
जी की प्रतिष्ठा में
****************
सफर तन्हा बहुत रस्ता बड़ा है
मेरी किस्मत में भी फाका पड़ा है
सुखनची, चोर और गुमराह बातें
सुखन की राह में क्या क्या खड़ा है
जब अपनों ने मेरी कीमत लगाई
लगा यूं मेरे घर डाका पड़ा है
बता दे क्यों तेरी हर बात मानूं
क्या तेरी बात में हीरा जड़ा है
न टूटे दिल भी और हो इश्क उनसे
ये कैसी जिद पे तू 'पागल' अड़ा है
नितिन सिकरवार 'पागल' ...
श्री गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह~26जी की प्रतिष्ठा में
****************
सफर तन्हा बहुत रस्ता बड़ा है
मेरी किस्मत में भी फाका पड़ा है
सुखनची, चोर और गुमराह बातें
सुखन की राह में क्या क्या खड़ा है
जब अपनों ने मेरी कीमत लगाई
लगा यूं मेरे घर डाका पड़ा है
बता दे क्यों तेरी हर बात मानूं
क्या तेरी बात में हीरा जड़ा है
न टूटे दिल भी और हो इश्क उनसे
ये कैसी जिद पे तू 'पागल' अड़ा है
नितिन सिकरवार 'पागल' ...
दिनाँक~ 21 अगस्त प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात:10 बजे तक~
कारीक्रम~ शिल्प और शिल्पी~ गीत /गजल/ मुक्तक/ छंद/दोहा / चौपाई आदि शिल्प परिचय के साथ~
अध्यक्ष आदरणीय हास्यकवि Kamlesh Dwivedi जी के सम्मुख सादर समर्पित~
विधा~ गीत
शिल्प परिचय~ मुखडे एवं पूरक पंक्तियों का स्थाई तुकान्त~ आरा है
प्रत्येक अन्तरें का तुकान्त~ 1.आदे 2.अन कर रहे
अन्तरें एवं पूरक पंक्तियों का मात्रा भार~16~14एवं16~16 के क्रम में ।
भारत के शक्ति क्षमता को, जिसने भी ललकारा है!
सदियों का इतिहास रहा है,रण में विजय हमारा है!
दुश्मन के नापाक इरादें,दगाबाज के झूठे वादें!
सरहद पर आतंकी साजे, भाई का जो खून बहा दें!
छल कपट कूटनीतिक रण में,कायरता शिश उठाया है!
मातृभूमि वीरों के सम्मुख , क्या औकात तुम्हारा है?
भारत के शक्ति......
अब तक हम जो सहन कर रहें,मानवता का जतन कर रहें!
भाई ~चारे के बन्धन को,हर पल हम तो नमन कर रहें!
सैन्यधीरता को स्वीकारो, कायरता से ना यूँ ललकारो!
रणबाँकुरों के चंगुल में,वरना पतन तुम्हारा है!
भारत के शक्ति.......
रण में विजय हमारा है!
जय हिन्द! जय भारत॥
कुन्दन
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 26सदियों का इतिहास रहा है,रण में विजय हमारा है!
दुश्मन के नापाक इरादें,दगाबाज के झूठे वादें!
सरहद पर आतंकी साजे, भाई का जो खून बहा दें!
छल कपट कूटनीतिक रण में,कायरता शिश उठाया है!
मातृभूमि वीरों के सम्मुख , क्या औकात तुम्हारा है?
भारत के शक्ति......
अब तक हम जो सहन कर रहें,मानवता का जतन कर रहें!
भाई ~चारे के बन्धन को,हर पल हम तो नमन कर रहें!
सैन्यधीरता को स्वीकारो, कायरता से ना यूँ ललकारो!
रणबाँकुरों के चंगुल में,वरना पतन तुम्हारा है!
भारत के शक्ति.......
रण में विजय हमारा है!
जय हिन्द! जय भारत॥
कुन्दन
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- गीत
शिल्प विधान- गीत की सभी पँक्तियोँ का मात्राभार- 16/14
तुकान्त-
मुखडे का तुकान्त- आर मिला।
अंतरोँ का तुकान्त-
1- अराता था।
2- आहोँ में।
3- अन मेँ।
ँँँ
समारोह अध्यक्ष सम्मान्य आदरणीय श्री कमलेश द्विवेदी जी को सादर समर्पित।
ँँँँ
द्वेष जलन की गहन गुफाओं, पर मै धँसता चला गया,
पर सद्भाविक ज्योति मार्ग का, कहीँ न मुझको द्वार मिला।
पत्थर के टुकडोँ को जब मै, आपस मे टकराता था।
चिन्गारी की क्षणिक ज्योति को ,पाकर मन इतराता था।
सोँचा सृजित करूँगा अब मै,जीवन के आधार कई,
पर मानव चीखोँ का हरदम, कफन लिप्त अंगार मिला।
स्याह...(1)
उलझा हूँ पाखंड दंभ मेँ, भर आक्रोश निगाहोँ मेँ।
मानव धर्म समाज नारि प्रति, भरी ऊष्णता बाहोँ मेँ।
तंत्र मंत्र औ जादू टोना, अंग भभूती धार लिया,
पर जीवन मेँ कहीँ न मुझको, शांति सृजित संसार मिला।
स्याह..(2)
गिरगिट रँग सम राष्ट्र सभ्यता, परिवर्तित हर आँगन मेँ।
नव युवकों नेँ धूम मचाया, हनी सिंह के गायन मेँ।
भोँड डांस ने मिटा दिया है, राग रागिनी नृत्य सभी,
पर नव तन में कहीं न मुझको, इसके प्रति दुत्कार मिला।
स्याह..(3)
ँँ
करन एस. पी.
चिन्गारी की क्षणिक ज्योति को ,पाकर मन इतराता था।
सोँचा सृजित करूँगा अब मै,जीवन के आधार कई,
पर मानव चीखोँ का हरदम, कफन लिप्त अंगार मिला।
स्याह...(1)
उलझा हूँ पाखंड दंभ मेँ, भर आक्रोश निगाहोँ मेँ।
मानव धर्म समाज नारि प्रति, भरी ऊष्णता बाहोँ मेँ।
तंत्र मंत्र औ जादू टोना, अंग भभूती धार लिया,
पर जीवन मेँ कहीँ न मुझको, शांति सृजित संसार मिला।
स्याह..(2)
गिरगिट रँग सम राष्ट्र सभ्यता, परिवर्तित हर आँगन मेँ।
नव युवकों नेँ धूम मचाया, हनी सिंह के गायन मेँ।
भोँड डांस ने मिटा दिया है, राग रागिनी नृत्य सभी,
पर नव तन में कहीं न मुझको, इसके प्रति दुत्कार मिला।
स्याह..(3)
ँँ
करन एस. पी.
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी,अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समरर्पित
------------------------------
मात्रा - 2122 2122 2122 212
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया - अत
रदीफ़ - आपकी
हम बतायें तो बतायें क्या नजाकत आपकी !
मुस्कुराहट तो लगे जैसे कयामत आपकी !!
यार तू इकरार कर मेरी मुहब्बत का अभी !
जान ले लेगी किसी दिन ये शराफत आपकी !!
आपका तो रूठना हमको गवारा है नहीं !
मार डालेगी हमें इक दिन शरारत आपकी !!
बात पे तो बात निकलेगी हमेशा ही यहाँ !
लोग अब सब जानते है ये ख़जालत आपकी !!
फैसला भी आज कर के ये बता दो अब हमें !
क्यूँ छुपा कर यूँ रखी है ये मुहब्बत आपकी !!
गलतियाँ होती रही फिर शोर इतना क्यों भला !
गैर से अच्छी नहीं नाजुक शिकायत आपकी !!
~~ आलोक ~~
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया - अत
रदीफ़ - आपकी
हम बतायें तो बतायें क्या नजाकत आपकी !
मुस्कुराहट तो लगे जैसे कयामत आपकी !!
यार तू इकरार कर मेरी मुहब्बत का अभी !
जान ले लेगी किसी दिन ये शराफत आपकी !!
आपका तो रूठना हमको गवारा है नहीं !
मार डालेगी हमें इक दिन शरारत आपकी !!
बात पे तो बात निकलेगी हमेशा ही यहाँ !
लोग अब सब जानते है ये ख़जालत आपकी !!
फैसला भी आज कर के ये बता दो अब हमें !
क्यूँ छुपा कर यूँ रखी है ये मुहब्बत आपकी !!
गलतियाँ होती रही फिर शोर इतना क्यों भला !
गैर से अच्छी नहीं नाजुक शिकायत आपकी !!
~~ आलोक ~~
कवि विश्वनाथ तिवारी
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह 26
समरोह अध्यक्ष आदरणीय श्री कमलेश द्विवेदी जी के समक्ष।
विधा - गीत
मुखड़े का तुकांत - "आ दो"
मुखड़े का मात्रभार- प्रत्येक पंक्ति में 14 मात्राएँ।
बंध की प्रत्येक पंक्ति में 14 मात्राएँ।
बंध की पंक्तियों के तुकांत क्रमशः आते , गा, मैं।।
कुल 3 बंध।।
समरोह अध्यक्ष आदरणीय श्री कमलेश द्विवेदी जी के समक्ष।
विधा - गीत
मुखड़े का तुकांत - "आ दो"
मुखड़े का मात्रभार- प्रत्येक पंक्ति में 14 मात्राएँ।
बंध की प्रत्येक पंक्ति में 14 मात्राएँ।
बंध की पंक्तियों के तुकांत क्रमशः आते , गा, मैं।।
कुल 3 बंध।।
गीत
----------------
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
द्वार की सांकल बजा दो
मौन है मन का घरौन्दा
गीत तुम कोई सुना दो।
(1)
स्वर मेरे गीतों के तुमको
गुनगुना कर हैं बुलाते।
और यादों के पपीहे
संग एकल स्वर में गाते।।
शांत नीरव वन सघन है
आओ और पायल बजा दो।।
(2)
यह अलख आजन्म आकुल
प्राण में भर कर चलूँगा।
पग तुम्हारे जब शिथिल हो
उस जगह तुमको मिलूँगा।।
मैं विहग भू पर गिरा हूँ
तुम मुझे नभ से मिला दो।।
(3)
गंध बन सुरभित पवन की
केश में लिपटू चलू मैं।
या अधर मकरंद पीने
को भ्रमर कोई बनू मैं।।
वेदना के तार छेड़ो
और मीठी धुन सुना दो ।।
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी.
----------------
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
द्वार की सांकल बजा दो
मौन है मन का घरौन्दा
गीत तुम कोई सुना दो।
(1)
स्वर मेरे गीतों के तुमको
गुनगुना कर हैं बुलाते।
और यादों के पपीहे
संग एकल स्वर में गाते।।
शांत नीरव वन सघन है
आओ और पायल बजा दो।।
(2)
यह अलख आजन्म आकुल
प्राण में भर कर चलूँगा।
पग तुम्हारे जब शिथिल हो
उस जगह तुमको मिलूँगा।।
मैं विहग भू पर गिरा हूँ
तुम मुझे नभ से मिला दो।।
(3)
गंध बन सुरभित पवन की
केश में लिपटू चलू मैं।
या अधर मकरंद पीने
को भ्रमर कोई बनू मैं।।
वेदना के तार छेड़ो
और मीठी धुन सुना दो ।।
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी.
हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को सादर समर्पित:
विधा --गजल
काफिया- आला
रदीफ--है
बहर 1222 1222 1222 1222
अदावत तीरगी जैसी , मुहब्बत ही उजाला है ,
मिटा लो नफरतों को, प्यार भी होता शिवाला है ,
गरीबों को ख़ुदाया भूख से अब तो बचा ले तू ,
अमीरों को हमेशा छीनना आता निवाला है .
यहाँ हरसू रही फैली , महक तेरी वफ़ाओं की ,
दिये दिल के जले ख़ूँ से , हवाओं ने सँभाला है.
ख़ुशी उनको मिले. घरबार हम यूँ छोड़ के निकले ,
मगर दुनिया यही समझी , हमें घर से निकाला है .
कसम हमने वफा की ,जिंदगी देकर निभाई थी ,
मगर ये नाम उसने बेवफा कह के उछाला है ,
न मांगी रौशनी हमने , न अँधेरा मुक़ाबिल था ,
मुकद्दर की सियाही से , मिलन अपना निराला है .
कभी चाहत हमें मजबूर जो कर दे निभाने को ,
मगर रस्में जहाँ की , अब 'अना' इक पाठशाला है .
अनीता मेहता 'अना'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
बहर- बहर-ए-हज़ज़ मुसम्मन सालिम
अरकान- 1222,1222,1222,1222
रदीफ़- उसको
काफिया- आ
आद. श्री Kamlesh Dwivedi
जी की प्रतिष्ठा में
*************************
यही है इश्क़ का हासिल रहूँ देता वफ़ा उसको
कि जिसने दिल दुखाया है तो क्या दूँ मैं दुआ उसको
विधा --गजल
काफिया- आला
रदीफ--है
बहर 1222 1222 1222 1222
अदावत तीरगी जैसी , मुहब्बत ही उजाला है ,
मिटा लो नफरतों को, प्यार भी होता शिवाला है ,
गरीबों को ख़ुदाया भूख से अब तो बचा ले तू ,
अमीरों को हमेशा छीनना आता निवाला है .
यहाँ हरसू रही फैली , महक तेरी वफ़ाओं की ,
दिये दिल के जले ख़ूँ से , हवाओं ने सँभाला है.
ख़ुशी उनको मिले. घरबार हम यूँ छोड़ के निकले ,
मगर दुनिया यही समझी , हमें घर से निकाला है .
कसम हमने वफा की ,जिंदगी देकर निभाई थी ,
मगर ये नाम उसने बेवफा कह के उछाला है ,
न मांगी रौशनी हमने , न अँधेरा मुक़ाबिल था ,
मुकद्दर की सियाही से , मिलन अपना निराला है .
कभी चाहत हमें मजबूर जो कर दे निभाने को ,
मगर रस्में जहाँ की , अब 'अना' इक पाठशाला है .
अनीता मेहता 'अना'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
बहर- बहर-ए-हज़ज़ मुसम्मन सालिम
अरकान- 1222,1222,1222,1222
रदीफ़- उसको
काफिया- आ
आद. श्री Kamlesh Dwivedi
जी की प्रतिष्ठा में
*************************
यही है इश्क़ का हासिल रहूँ देता वफ़ा उसको
कि जिसने दिल दुखाया है तो क्या दूँ मैं दुआ उसको
मोहब्बत में सियासत में इबादत में अदावत में
सदा वो है मेरा साया तो क्या दूँ मैं सज़ा उसको
हजारों ख्वाहिशें चुपचाप आँखों से छलकती थीं
सिवा इक तीरगी के बोलिए बस क्या दिया उसको
मोहब्बत का दिया रौशन करो तो याद ये रखना
न लग जाये बुरे इस दौर की ज़ालिम हवा उसको
भले ही चाहतों की डोर गैरों के हवाले है
मगर ये पाक दिल तो मानता है हमनवा उसको
-पुष्पेन्द्र यादव
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी,अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समरर्पित
विधा --गजल
सदा वो है मेरा साया तो क्या दूँ मैं सज़ा उसको
हजारों ख्वाहिशें चुपचाप आँखों से छलकती थीं
सिवा इक तीरगी के बोलिए बस क्या दिया उसको
मोहब्बत का दिया रौशन करो तो याद ये रखना
न लग जाये बुरे इस दौर की ज़ालिम हवा उसको
भले ही चाहतों की डोर गैरों के हवाले है
मगर ये पाक दिल तो मानता है हमनवा उसको
-पुष्पेन्द्र यादव
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
दिनांक 21 अगस्त 2014 प्रात: 10 बजे से 22 अगस्त प्रात: 10 बजे तक
शिल्प और शिल्पी,अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समरर्पित
विधा --गजल
काफिया--ओड
रदीफ--कर
बहर 1222 1222 1222 12
न रहना हो चले जाओ बतन ये छोड़ कर
बहाये खून तुम कितना बमो को फोड़ कर
कहानी तुम सफाई की सुनाये हो बहुत
न रहना है हमें अब हाथ अपना तोड़ कर
तमाशा तुम बना कर रख दिये हो जान के
चले जा इस वतन से तुम अभी मुह मोड़ कर
किया गुमराह तुमने है युवा को क्यो बता
मिलाया साथ जिसको हाथ अपना जोड़ कर
न बालक है करे हम माफ शैतानी सुनो
दफन कर देगे उसको कब्र उसकी खोद कर
अखंड गहमरी
आज के शिल्प और शिल्पी कार्यक्रम में आपके द्वारा दिये गये स्नेह-सम्मान के प्रति ह्रदय से आभारी हूँ-
आप सभी ने दिया है मुझको नेह अपार.
इसकी खातिर आपका बहुत-बहुत आभार.
आज आप सबके लिये अतिथि रचनाकार के रूप में मेरी एक हास्य रचना-
*****ईश्वर को मैसेज*****
बदल गई है लाइफ कितनी
बदल गई स्टाइल
इक बच्चे ने पैदा होते
ही माँगा मोबाइल
सिस्टर बोली-बोलो बेटे
मोबाइल क्यों लोगे
छोटे हो तुम उसे खिलौने
जैसा ही खेलोगे
बच्चा बोला-छोटा हूँ पर
समझो नहीं नया हूँ
ईश्वर को मैसेज करना है
सकुशल पहुँच गया हूँ
इसीलिये जल्दी से कोई
मोबाइल दिलवा दो
वरना इन्टरनेट कैफे का
मुझको पता बता दो
वहाँ नहीं करनी है चैटिंग
ना ही खेल करूँगा
यहाँ कुशल से पहुँच गया हूँ
ये ईमेल करूँगा.
----------
डाॅ.कमलेश द्विवेदी
मो.09415474674
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
गीत/गजल/मुक्तक/दोहा/छंन्द/ चौपाई /कहमुकरी सम्पूर्ण शिल्प परिचय सहित रचना
अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समर्पित
िदनांक 22 अगस्त
कायर्क्रम -िशल्प और िशल्पी
िवधा-ग़ज़ल
बहर- 22 212 22 22 112 21
रदीफ़- नहीं
का िफ़याः प्यास
समारोह अध्यक्ष आदरणीय कमेश िद्ववेदी जी को सादर समर िपत
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रदीफ--कर
बहर 1222 1222 1222 12
न रहना हो चले जाओ बतन ये छोड़ कर
बहाये खून तुम कितना बमो को फोड़ कर
कहानी तुम सफाई की सुनाये हो बहुत
न रहना है हमें अब हाथ अपना तोड़ कर
तमाशा तुम बना कर रख दिये हो जान के
चले जा इस वतन से तुम अभी मुह मोड़ कर
किया गुमराह तुमने है युवा को क्यो बता
मिलाया साथ जिसको हाथ अपना जोड़ कर
न बालक है करे हम माफ शैतानी सुनो
दफन कर देगे उसको कब्र उसकी खोद कर
अखंड गहमरी
आज के शिल्प और शिल्पी कार्यक्रम में आपके द्वारा दिये गये स्नेह-सम्मान के प्रति ह्रदय से आभारी हूँ-
आप सभी ने दिया है मुझको नेह अपार.
इसकी खातिर आपका बहुत-बहुत आभार.
आज आप सबके लिये अतिथि रचनाकार के रूप में मेरी एक हास्य रचना-
*****ईश्वर को मैसेज*****
बदल गई है लाइफ कितनी
बदल गई स्टाइल
इक बच्चे ने पैदा होते
ही माँगा मोबाइल
सिस्टर बोली-बोलो बेटे
मोबाइल क्यों लोगे
छोटे हो तुम उसे खिलौने
जैसा ही खेलोगे
बच्चा बोला-छोटा हूँ पर
समझो नहीं नया हूँ
ईश्वर को मैसेज करना है
सकुशल पहुँच गया हूँ
इसीलिये जल्दी से कोई
मोबाइल दिलवा दो
वरना इन्टरनेट कैफे का
मुझको पता बता दो
वहाँ नहीं करनी है चैटिंग
ना ही खेल करूँगा
यहाँ कुशल से पहुँच गया हूँ
ये ईमेल करूँगा.
----------
डाॅ.कमलेश द्विवेदी
मो.09415474674
गाोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह -26
कार्यक्रम --शिल्प और शिल्पी
गीत/गजल/मुक्तक/दोहा/छंन्द/
अध्यक्ष ---हास्य कवि आदरणीय कमलेश द्विवेदी जी को समर्पित
एक घनाक्षरी छंद
शिल्प :- यह मात्रिक छंद नहीं है अपितु वर्णिक छंद है । इसमे आठ पद और चार चरण होते है । और प्रथम पद मे 16 द्वितीय मे 15 वर्ण होते है । इसी प्रकार प्रत्येक चरण पूरा होता है ।
छंद देखें :-
---------------
रूप मन भावन है मंद मंद मुस्काए ,
नन्हें नन्हें पाँव लिए दौड़ी चली आती है ।
बार बार सहलाती अपने कपोल वह ,
छोटी छोटी गोल गोल आंखे मटकाती है ।
अम्मा पहना के जब पायल सँवारती है,
दौड़ती तो झनक झनक झनझनाती है ।
दादा - दादी , नाना - नानी कायल हुये है सब ,
ठुमक ठुमक कर खूब इतराती है ॥ .....................अन्नपूर्ण ा बाजपेई 'अंजु'
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -२६
------------------------------ -------------
शिल्प और शिल्पी ,-अध्यक्ष -हास्य कवि आ. श्री कमलेश द्धिवेदी जी को समर्पित
------------------------------ ------------------------------ ----------------------------
विधा ---गीत ,मात्रा भार -२६
------------------------------ --------
छम -छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
मुक्तावलियों सी आकर धरती पर बिखर गई
रिमझिम करती मंद फुहारें ,
पायल सी बजतीं .
दिखीं घटाएं आसमान में ,
अलका सी सजतीं .
सौंधी -सौंधी गंध सभी ,साँसों में उतर गई
छम-छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
दादुर, मोर,पपीहा बोलें ,
हर इक मन महके .
नन्ही चिड़िया फुदक -फुदक कर ,
खिड़की पर चहके .
दम-दम करती हुई दामिनी ,छत से गुजर गई .
छम -छम करती आई बारिश किस्मत सँवर गई .
तपन हुई सब दूर धरा की ,
हरियाली छाई .
जन-जन के मन आस जगी अब ,
खुशहाली आई .
मरुथल सारे मधुवन हो गए ,दृष्टि जिधर गई .
छम-छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
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----------------------भारती जैन ------------------
२१-८-२०१४ ------------------------------ ---------------
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
बहर- 2122 / 2122 / 2122
रदीफ़- है
काफिया- अना
समारोह अध्यक्ष आदरणीय Kamlesh Dwivedi जी को सादर समर्पित
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गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 26 *शिल्प और शिल्पी*
विधा- गीत
मुखड़े एवं स्थाई पूरक पंक्तियोँ का तुंकात -आस। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-आल 2-अंग 3-आत 4-ऊब। मात्राभार-16 - 11 के क्रम मेँ। सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि श्री कमलेश द्विवेदी जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत।
@अतिथि रचना@
गोपालराम गहमरी सा िहत्य समारोह-26शिल्प :- यह मात्रिक छंद नहीं है अपितु वर्णिक छंद है । इसमे आठ पद और चार चरण होते है । और प्रथम पद मे 16 द्वितीय मे 15 वर्ण होते है । इसी प्रकार प्रत्येक चरण पूरा होता है ।
छंद देखें :-
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रूप मन भावन है मंद मंद मुस्काए ,
नन्हें नन्हें पाँव लिए दौड़ी चली आती है ।
बार बार सहलाती अपने कपोल वह ,
छोटी छोटी गोल गोल आंखे मटकाती है ।
अम्मा पहना के जब पायल सँवारती है,
दौड़ती तो झनक झनक झनझनाती है ।
दादा - दादी , नाना - नानी कायल हुये है सब ,
ठुमक ठुमक कर खूब इतराती है ॥ .....................अन्नपूर्ण
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह -२६
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शिल्प और शिल्पी ,-अध्यक्ष -हास्य कवि आ. श्री कमलेश द्धिवेदी जी को समर्पित
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विधा ---गीत ,मात्रा भार -२६
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छम -छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
मुक्तावलियों सी आकर धरती पर बिखर गई
रिमझिम करती मंद फुहारें ,
पायल सी बजतीं .
दिखीं घटाएं आसमान में ,
अलका सी सजतीं .
सौंधी -सौंधी गंध सभी ,साँसों में उतर गई
छम-छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
दादुर, मोर,पपीहा बोलें ,
हर इक मन महके .
नन्ही चिड़िया फुदक -फुदक कर ,
खिड़की पर चहके .
दम-दम करती हुई दामिनी ,छत से गुजर गई .
छम -छम करती आई बारिश किस्मत सँवर गई .
तपन हुई सब दूर धरा की ,
हरियाली छाई .
जन-जन के मन आस जगी अब ,
खुशहाली आई .
मरुथल सारे मधुवन हो गए ,दृष्टि जिधर गई .
छम-छम करती आई बारिश ,किस्मत सँवर गई .
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----------------------भारती जैन ------------------
२१-८-२०१४ ------------------------------
गोपालराम गहमरी साहित्य समारोह-26
कार्यक्रम- शिल्प और शिल्पी
विधा- ग़ज़ल
बहर- 2122 / 2122 / 2122
रदीफ़- है
काफिया- अना
समारोह अध्यक्ष आदरणीय Kamlesh Dwivedi जी को सादर समर्पित
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चाँद की पलकों तले भी तम घना है
चांदनी का दिल मगर फिर भी फना है
दर्द आँखों में लिये अंबर बिचारा
सोचता है तीरगी में डूबना है
जब रवि घूंघट किये जा छिप गया तो
रौशनी का दिल हुआ कुछ अनमना है
इक अँधेरा था बसा दिल में कही पर
रौशनी का घर वहीँ पर ही बना है
है तलब तेरी मुहब्बत की मुझे पर
आँख में बाकी मिरे अब भी अना है
स्याह तनहा रात का आलम हुआ अब
अक्श तेरा उस सियाही में सना है
भूल कर भी ये कभी मत सोचना तुम
तीरगी ही तीरगी को झेलना है
फिर सुबह होगी 'रमा' इक रौशनी की
तब मिटेगा तम यही संभावना है ………..रमा वर्मा
कुण्डलिया छंद
विधान -एक दोहा व एक रोला के संयोग से निर्मित कुंडलिया “छः चरणों से युक्त छंद है जिसके प्रत्येक चरण में चौबीस मात्राएँ होती हैं |कुंडलिया छंद में दूसरे चरण का उत्तरार्ध तीसरे चरण का पूर्वार्ध होता है|जिस शब्द या शब्द-समूह से यह प्रारंभ होता है उसी शब्द या शब्द-समूह से इसका समापन भी किया जाता है |
साधे जो संकल्प मन, समझों वही महान
संस्कार जब नहीं रहे समझे क्या अपमान
समझे क्या अपमान कर्म है जिनके उल्टें
बात करे आदर्श,--- समय आते वह पल्टें
करे ईश में आस,-- वही दिल से अवराधे
जावे चाहे प्राण, वचन अपना वह साधे ||
(2)
धर्मों में भी मच रही कैसी खूब धमाल
संकल्पों के नाम पर लूट रहे है माल
लूट रहे है माल सभी घर अपने भरते
जो देते उपदेश जुर्म फिर क्योकर करते
समझे कर्म प्रधान उसी का मन कर्मों में
रखे सदा सद्भाव सीख ये सब धर्मों में ||
चांदनी का दिल मगर फिर भी फना है
दर्द आँखों में लिये अंबर बिचारा
सोचता है तीरगी में डूबना है
जब रवि घूंघट किये जा छिप गया तो
रौशनी का दिल हुआ कुछ अनमना है
इक अँधेरा था बसा दिल में कही पर
रौशनी का घर वहीँ पर ही बना है
है तलब तेरी मुहब्बत की मुझे पर
आँख में बाकी मिरे अब भी अना है
स्याह तनहा रात का आलम हुआ अब
अक्श तेरा उस सियाही में सना है
भूल कर भी ये कभी मत सोचना तुम
तीरगी ही तीरगी को झेलना है
फिर सुबह होगी 'रमा' इक रौशनी की
तब मिटेगा तम यही संभावना है ………..रमा वर्मा
कुण्डलिया छंद
विधान -एक दोहा व एक रोला के संयोग से निर्मित कुंडलिया “छः चरणों से युक्त छंद है जिसके प्रत्येक चरण में चौबीस मात्राएँ होती हैं |कुंडलिया छंद में दूसरे चरण का उत्तरार्ध तीसरे चरण का पूर्वार्ध होता है|जिस शब्द या शब्द-समूह से यह प्रारंभ होता है उसी शब्द या शब्द-समूह से इसका समापन भी किया जाता है |
साधे जो संकल्प मन, समझों वही महान
संस्कार जब नहीं रहे समझे क्या अपमान
समझे क्या अपमान कर्म है जिनके उल्टें
बात करे आदर्श,--- समय आते वह पल्टें
करे ईश में आस,-- वही दिल से अवराधे
जावे चाहे प्राण, वचन अपना वह साधे ||
(2)
धर्मों में भी मच रही कैसी खूब धमाल
संकल्पों के नाम पर लूट रहे है माल
लूट रहे है माल सभी घर अपने भरते
जो देते उपदेश जुर्म फिर क्योकर करते
समझे कर्म प्रधान उसी का मन कर्मों में
रखे सदा सद्भाव सीख ये सब धर्मों में ||
-लक्ष्मण रामानुज लडीवाला
गोपाल राम गहमरी साहित्य समारोह - 26 *शिल्प और शिल्पी*
विधा- गीत
मुखड़े एवं स्थाई पूरक पंक्तियोँ का तुंकात -आस। प्रत्येक अंतरे का तुकांत क्रमश:-1-आल 2-अंग 3-आत 4-ऊब। मात्राभार-16 - 11 के क्रम मेँ। सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि श्री कमलेश द्विवेदी जी की प्रतिष्ठा मेँ सादर प्रस्तुत।
@अतिथि रचना@
जब जब घर आता मैँ अपने
दिखता बहुत उदास!
चौखट करने लगती मेरी
सुधियोँ से परिहास!
नीम निहारे मुझे एकटक
पूछे कई सवाल!
क्योँकर मेरी याद न आती
इतने इतने साल!
आये हो तो मत जाना अब
तुमसे है अरदास!
देख मुझे बूढ़ी दीवारेँ
हो जाती हैँ दंग!
राख दौड़कर पुरखोँ की भी
लग जाती है अंग!
कुर्सी चलकर बाबू जी की
आ जाती है पास!
अलमारी की सभी किताबेँ
करने लगती बात!
अम्मा की सब मीठी बातेँ
कह जाती है रात!
बाबा दादी और बुआ का
होता है आभास!
बारादरी रसोई आँगन
बतियाते सब खूब!
और बताते कैसे निकली
फर्श फोड़कर दूब!
बैठ रुआँसा कहे ओ'सारा
यहीँ करो सब वास!
रचना - धीरज श्रीवास्तव
मात्रा पतन को इस (') निशान से दर्शाया गया है।
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 26
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- मुक्तक
1
तुकांत -जब
समान्त अनशन , उलझन ,दुश्मन
बहर 22 22 22 2
करना होगा अनशन जब
बात बने जो उलझन जब
राहें छोड़े ना हम सच
तोड़े घर को दुश्मन जब
पवन बत्तरा
२
तुकांत -है
समान्त - आना
बहर- 212 2212 22212 22
ज़िन्दगी में जीतकर सब कुछ हार जाना है
लौटकर फिर किसी ने कोई न आना है
भूलना ना मातृ पितृ को तुम ज़िन्दगी जो दे
मातृ पितृ चरणो मिले दुनिया का खज़ाना है
पवन बत्तरा
3
तुकांत क्यों हो
समान्त -नंगा
बहर-22212 22222 22
मेरे देश में दंगे पर दंगा क्यों हो
मजहब में सियासत से फिर पंगा क्यों हो
हो बिल साम्प्रदायिक दंगा फिर ना होता
दुश्मन चाहता हर कोई चंगा क्यों हो
पवन बत्तरा
दिखता बहुत उदास!
चौखट करने लगती मेरी
सुधियोँ से परिहास!
नीम निहारे मुझे एकटक
पूछे कई सवाल!
क्योँकर मेरी याद न आती
इतने इतने साल!
आये हो तो मत जाना अब
तुमसे है अरदास!
देख मुझे बूढ़ी दीवारेँ
हो जाती हैँ दंग!
राख दौड़कर पुरखोँ की भी
लग जाती है अंग!
कुर्सी चलकर बाबू जी की
आ जाती है पास!
अलमारी की सभी किताबेँ
करने लगती बात!
अम्मा की सब मीठी बातेँ
कह जाती है रात!
बाबा दादी और बुआ का
होता है आभास!
बारादरी रसोई आँगन
बतियाते सब खूब!
और बताते कैसे निकली
फर्श फोड़कर दूब!
बैठ रुआँसा कहे ओ'सारा
यहीँ करो सब वास!
रचना - धीरज श्रीवास्तव
मात्रा पतन को इस (') निशान से दर्शाया गया है।
गोपाल राम गहमरी साहित्यिक समारोह- 26
प्रथम चरण- शिल्प और शिल्पी
विधा- मुक्तक
1
तुकांत -जब
समान्त अनशन , उलझन ,दुश्मन
बहर 22 22 22 2
करना होगा अनशन जब
बात बने जो उलझन जब
राहें छोड़े ना हम सच
तोड़े घर को दुश्मन जब
पवन बत्तरा
२
तुकांत -है
समान्त - आना
बहर- 212 2212 22212 22
ज़िन्दगी में जीतकर सब कुछ हार जाना है
लौटकर फिर किसी ने कोई न आना है
भूलना ना मातृ पितृ को तुम ज़िन्दगी जो दे
मातृ पितृ चरणो मिले दुनिया का खज़ाना है
पवन बत्तरा
3
तुकांत क्यों हो
समान्त -नंगा
बहर-22212 22222 22
मेरे देश में दंगे पर दंगा क्यों हो
मजहब में सियासत से फिर पंगा क्यों हो
हो बिल साम्प्रदायिक दंगा फिर ना होता
दुश्मन चाहता हर कोई चंगा क्यों हो
पवन बत्तरा
िदनांक 22 अगस्त
कायर्क्रम -िशल्प और िशल्पी
िवधा-ग़ज़ल
बहर- 22 212 22 22 112 21
रदीफ़- नहीं
का िफ़याः प्यास
समारोह अध्यक्ष आदरणीय कमेश िद्ववेदी जी को सादर समर िपत
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सुलगती रेत में पानी की अब तलाश नहीं
मगर ये कब कहा मैंने के मुझे प्यास नहीं
वो fजस अदा से मुझे बारहा पुकारे गए
लगा था मुझसा कोई जैसे अब उनके पास नहीं
मुझे ख़बर है मेरी जुस्तजू सलामत है
मैं इन fदनों की कड़ी धूप से उदास नहीं
बस एक इतनी वज़ह है मेरे न पीने की
शराब है वही साक़ी मगर fगलास नहीं
मैं अपने fदल के मुताfबक उसे न ढाल सका
वो संग भी है मगर मैं तो बुततराश नहीं
ज़ुबां पे नाले हैं चाहत के fदल के fदल में रंज मगर
हसीन शोख़ fनगाहों में इल्तमास नहीं
तुम्हारी चाह में ऐसा भी दौर गुज़रा है
कहीं न चैन fमला और कहीं भी साँस नहीं
सभी तो हैं मेरे ख़्वाबो ख़यालों से बरहम
ये और बात ख़फ़ा मुझसे fदल शनास नहीं
तुम्हारे नाम की शम्मे नहीं जली जब तक
था fज़ंदगी में सवेरा मगर उजास नहीं
सभी के सामने ज़ाfहर हैं मेरे रंजो अलम
मेरी ख़मोश तमन्ना पे अब fलबास नहीं।।
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बलजीत fसंह ;मुंतfज़र'
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शब्दार्थ--- बारहा-बार-बार
जुस्तजू- तलाश संग-पत्थर बुततराश-मूरfतकार नाले- फ़fरयाद
इल्तमास- प्रार्थना बरहम- नाराज़ fदलशनास- fदल से बातें करने वाला
रंजोअलम-दुख-दर्द
मगर ये कब कहा मैंने के मुझे प्यास नहीं
वो fजस अदा से मुझे बारहा पुकारे गए
लगा था मुझसा कोई जैसे अब उनके पास नहीं
मुझे ख़बर है मेरी जुस्तजू सलामत है
मैं इन fदनों की कड़ी धूप से उदास नहीं
बस एक इतनी वज़ह है मेरे न पीने की
शराब है वही साक़ी मगर fगलास नहीं
मैं अपने fदल के मुताfबक उसे न ढाल सका
वो संग भी है मगर मैं तो बुततराश नहीं
ज़ुबां पे नाले हैं चाहत के fदल के fदल में रंज मगर
हसीन शोख़ fनगाहों में इल्तमास नहीं
तुम्हारी चाह में ऐसा भी दौर गुज़रा है
कहीं न चैन fमला और कहीं भी साँस नहीं
सभी तो हैं मेरे ख़्वाबो ख़यालों से बरहम
ये और बात ख़फ़ा मुझसे fदल शनास नहीं
तुम्हारे नाम की शम्मे नहीं जली जब तक
था fज़ंदगी में सवेरा मगर उजास नहीं
सभी के सामने ज़ाfहर हैं मेरे रंजो अलम
मेरी ख़मोश तमन्ना पे अब fलबास नहीं।।
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बलजीत fसंह ;मुंतfज़र'
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शब्दार्थ--- बारहा-बार-बार
जुस्तजू- तलाश संग-पत्थर बुततराश-मूरfतकार नाले- फ़fरयाद
इल्तमास- प्रार्थना बरहम- नाराज़ fदलशनास- fदल से बातें करने वाला
रंजोअलम-दुख-दर्द
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